Kavita main desh nahi bikne dunga
Kavita main desh nahi bikne dunga

मैं देश नहीं बिकने दूंगा

( Rana ka tibra bhala )

 

तीरों पे चाहे तीर चले तोप चले या कोई तलवार
मैं नैन नहीं चलने दूंगा मैं देश नहीं बिकने दूंगा

 

गद्दारों को मार भगाओ अमन चैन शांति लाओ
राष्ट्रभक्ति भाव फैलाओ दीनों को गले लगाओ

 

जहर उगलती जो हवाएं वो बयार नहीं बहने दूंगा
राष्ट्रद्रोह चलने वालों को एक पल नहीं रहने दूंगा

 

फन फैलाए बैठे द्रोही हरदम नहीं टिकने दूंगा
शीश कट जाए भले ही मैं देश नहीं बिकने दूंगा

 

अलख जगाता राष्ट्रप्रेम की वंदे मातरम गाता हूं
भारत मां के चरणों में नित झुक शीश नवाता हूं

 

चेतना की मशाल जला अंधकार मिटाया करता हूं
घट घट में नित देशप्रेम के भाव जगाया करता हूं

 

जहरीले कांटों को राहों में कभी नहीं दिखने दूंगा
भारत मां का लाल दीवाना देश नहीं बिकने दूंगा

 

देशप्रेम मतवाला हूं मैं प्रलयंकारी ज्वाला हूं
सारी दुनिया हिल जाए राणा का भाला हूं

 

मैं दुश्मन के मंसूबे कभी पूरे नहीं होने दूंगा
जनता को हरगिज खून के आंसू नहीं रोने दूंगा

 

देशभक्ति का जज्बा जन मन से नहीं डिगने दूंगा
आन बान शान वतन की देश नहीं बिकने दूंगा

 

 ?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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