बन सको तो बनो
बन सको तो बनो

बन सको तो बनो

( Ban sako to bano )

 

बन सको तो बनो चांद आकाश के,
सूर्य के हेतु प्रिय मत बनो तुम ग्रहण।

 

प्रभु ने निर्मल हृदय सिर्फ तुमको दिया,
दे के कंचन सी काया भुवन दे दिया।
और कहा नेह अंबुधि जगत सार है,
प्रेम के रस में भीगा ये संसार है।
द्वेष से क्यूं लगाते जहां में अगन।
बन सको तो बनो चांद आकाश के,
सूर्य के हेतु प्रिय मत बनो तुम ग्रहण।

 

पुष्प से रंग जीवन में सबके भरो,
दुःख में जन जन के घावों का मरहम बनो,
सूर्य से तुल्यता का ले आशीष तुम,
आए जग में हरो जीव की पीर तुम।
उनके उपहास में तुम रहो न मगन।
बन सको तो बनो चांद आकाश के,
सूर्य के हेतु प्रिय मत बनो तुम ग्रहण।

 

फूल फूल चमन झर गए एक दिन,
प्रात का सूर्य छिपने चला है गगन,
श्रेष्ठ जग में वही कर्म करता रहे,
स्वयं की सांस में आस भरता रहे।
स्वार्थ के कार्य में तुम रहो न मगन।
बन सको तो बनो चांद आकाश के,
सूर्य के हेतु प्रिय मत बनो तुम ग्रहण।

🍀

रचना – सीमा मिश्रा ( शिक्षिका व कवयित्री )
स्वतंत्र लेखिका व स्तंभकार
उ.प्रा. वि.काजीखेड़ा, खजुहा, फतेहपुर

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