सच बोलने की सजा

तो संतश्री कुछ नाखुश से थे.. शायद कुछ खफा खफा से भी.. दूध के लिए पशुओ पर होने वाले अत्यचार को ले कर मुझे उन से कुछ मार्गदर्शन लेना था.. हिंसा अहिंसा को ले कर कुछ धार्मिक चर्चाएं करनी थी.. कुछ शास्त्रों के संदर्भ होने थे जो कि मानव की अनजाने में होने वाली अनैतिकता को समर्थन करते थे मगर मामला यहा जरा दूजा ही बन गया.. वे कतई राजी नही थे मुझ से बात करने के लिए.. न जाने मुझे क्यो ऐसा लग रहा था कि वे पूर्वाग्रह से ग्रसित थे.. शायद कोई नकारात्मक छवि मेरी उनके मन मे उकेर दी गई थी।

शायद उन्हें ज्ञात था कि देर सबेर मैं उन से मुक पशुओ पर होने वाले अत्यचार ओर बलात्कार को ले कर मिलूंगा.. उनका नजरिया जानने की कोशिस करूंगा.. वर्ना इतना रूखा ओर शुष्क व्यवहार उनका कभी नही था.. पहले भी कई अलग अलग विषयो को ले कर मैं उन से चर्चा कर चुका हूं और उन्होंने बड़े ही उत्साह से उस के जवाब भी दिए थे.. मगर आज हालात दूजे थे.. अंदाज उनके यही थे कि मैं वहां से निकल लू.. उन्होंने कहा भी की निकलो यहा से।

चूंकि आज पूरी दुनिया यह जान चुकी हैं कि दूध की जड़े पशुओ के कत्ल पर खत्म होती है ओर यथा संभव लोगबाग कोशिस भी कर रहे है कि दूध से अब उनका नाता टूटना चाहिए.. सभी विवेकी लोग यही चाहते हैं कि पशुओ के कत्ल, उनका बलात्कार ओर उनके शिशुओं को माँ से दूर करने के गुनाहों में भागीदार न बने और वे धीरे धीरे कोशिस कर रहे हैं की दूध से दूर हो जाये।

कुछ लोग सप्ताह में एक बार पूर्णतः पशु उत्पाद से दूर का नियम लेते हैं और कुछ जैसे उनकी अनुकूलता बने वैसा.. मैने भी दूध से दूरी बनाई थी मगर चाय का चस्का बड़ा भारी पड़ रहा था.. मैं दूध की चाय पिता और मन ही मन स्वयं को कोसता की मैं यह क्या कर रहा हु.. ओर फिर चाय ने रंग बदला.. अब मैं चाय तो पिता हु मगर अंग्रेजी के रौब में उसे ब्लैक टी कहता हूं.. तो दुनिया जाग चुकी है.. सत्य को पहचान चुकी है.. मगर कुछ लोगो की अंध धार्मिकता इस कार्य मे रोड़ा अटकाती है।

खासकर सनातनी समुदाय जो कि घास पर भी चलने में घोर पाप का अहसास करता है उस के कुछ बंदे पशुओ पर के इस अत्यचार गलत नही समझते हैं बल्कि धार्मिक किताबो से इसे जस्टिफाई करने की कोशिस करते हैं और उसका सब से बड़ा उदाहरण है जैन तीर्थंकरों का गोरस से बनी खीर का आहार ग्रहण करना।

आज तक मैं भी यही समझता था कि तीर्थंकरों ने दूध से बनी खीर खायी है मगर जब सत्य को परखने की नजर कुछ तीव्र हुई तो फिर यह बात मुझे जरा भी रास नही आई कि परम दयालु प्रकृति का जीव जो कि तीर्थंकर बनने की प्रक्रिया में है कैसे एक अनाचार, अत्यचार को अपनी सहमति प्रदान करेगा.. इस विषय पर मैने बहुत खोजबीन की ओर यह सिद्ध करने में कामयाब रहा कि गोरस का मतलब मात्र गाय का दूध ही नही होता।

इस के अन्यत्र भी अर्थ है जो कि बहुत ही भव्य और गरिमायुक्त है.. जो कि तीर्थंकर प्रकृति के जीव को शोभते भी है.. इस विषय मे मेरा एक विस्तृत आलेख भी उपलब्ध है.. सत्य के अन्वेषी ईमानदारी के साथ उस पर मनन करेंगे तो वे मुझ से अवश्य सहमत होंगे।

मूक पशुओ पर दूध के लिए होने वाले अत्यचारो को ले कर कई लोगों की सलाह होती थी कि मुझे संतश्री से इस बाबत हकीकत जाननी चाहिए.. मैं प्रत्यक्ष दिख रही हिंसा के लिए किसी चर्चा के लिए तैयार नही था क्योकि सामने साफ साफ दिख रहा है कि हमारे जुल्मों से त्रस्त मूक जीव अपना पूरा स्वाभाविक जीवन जी ही नही पा रहे हैं।

दूध बंद होते ही मनुष्यो द्वारा उनका कत्ल किया जा रहा है.. फिर भी अवसर आया तो सोचा महाराज जी से इस बाबत मार्गदर्शन ले ही लिया जाए.. नमस्कार कर संतश्री से मैने आग्रह किया ,” महाराज जी.. अभी अखबारों में खबर आई थी कि शिकार करने के लिए बनी हजारो साल पुरानी एक दीवार मिली है मगर भगवान महावीर स्वामी तो मात्र अढ़ाई हजार साल पहले हो कर गये है।

उनके राजपाट, उनके महलों के कोई अवशेष नजर नही आते इसकीं क्या वजह है..?” महाराज जी ने कहा ” काल परिवर्तन में नष्ट हो जाते हैं.” मैने आगे जानना चाहा कि भगवान महावीर स्वामी के परिवार के लोग क्या अभी मौजूद होंगे तो वे थोड़ा शुष्क स्वर में बोले जाओ तुम ढूंढो.. फिर मैंने पूछा की ” मूक पशुओ पर होने वाली हिंसा और अत्यचार को ले कर शास्त्र क्या कहते हैं और कोंन से वे शास्त्र है मुझे उनके बारे में बताये, मुझे वे पढ़ने है.”

जवाब में महाराजी ने कहा ” पहले जो शास्त्र दिये हैं उनको पढ़ो ओर फिर कुछ पूछो.” संतश्री मुझ से बात करने में इच्छुक नही दिख रहे थे.. फिर भी मैने कहा महाराज जी पशुओ पर बहुत जुल्म हो रहे हैं तो वे मेरी बात काट कर बोले कपट के साथ बात करोगे तो कुछ बात नही होंगीं.. संतश्री के श्रीमुख से कपट शब्द सुन मैं चौक गया.. कपट की बात कहा से आ गयी बीच मे..?

ओर मैं तो मूक जीवो के अधिकार के लिए बोल रहा था.. इस मे भला मेरा क्या साध्य सज रहा था जो कि मैं कपट करता.. मैं अपने विचारों पर ओर अधिक पुष्ट हुआ कि किसी ने महाराज जी के ह्दय में मेरी गलत छवि बहुत गहरे तक अंकित कर दी है.. मैने कहा मगर मूक जीवो को जबरन बांधना तो गलत है न तो मुनिश्री ने बड़ी अजीब बात कही कि जेल मेरे प्रवचन तुम करवा रहे थे तो पहले उस जेलर को पूछो की उस ने लोगो को क्यो जेल में बंद कर के रखा है..? तो मैने कहा वे अपराधी है तो सजा मिलनी ही है न..!

संतश्री बोले ” मूक पशुओ को सताने की सजा से ज्यादा सजा संत को सताने से मिलती है.. मेरे पल्ले कुछ नही पड़ा.. महाराज साफ साफ मुझे कह रहे थे कि मैं उन्हें सता रहा हु.. मेरे पल्ले कुछ नही पड़ा क्योकि मैं संतश्री से मार्गदर्शन लेने गया था न कि उन्हें सताने.. मैं साधु संतों का अंधभक्त हु.. उनकी चर्या मुझे बहुत प्रभावित करती है.. सभी संतो से मेरे सम्बंध गरिमा पूर्ण स्नेह वाले ही है आजतक.. इन से भी.. मगर ये सोच रहे थे कि मैं उन्हें सताने आया हु.. क्यो सताउंगा मैं किसी संत को।

संत तो प्रभु अवतार के प्रतिबिंब है.. जियो ओर जीने दो की ध्वजा के वाहक है.. दया, करुणा की मूर्ति है.. उन्हें सताने मात्र का भाव घोर पाप का बंध करने वाला है.. कोई उन्हें सताए तो सताने वाले को सबक सिखाने के माद्दा मैं अपने भीतर रखता हूं.. तो साधु का यह व्यवहार मुझे खिन्न कर गया.. ओर कुछ बोलूं उस के पहले ही वे फिर शुष्क रूखे स्वर में बोले निकलो अब यहा से.. मैं नमस्कार कर उठ गया।

मेरी वजह से संत को कर्मो का बंध हो यह मुझे स्वीकार नही था.. संत गलत नही थे.. उन्हें किसी ने मेरी अहिंसा की परिभाषा को गलत अंदाज में बता दिया था.. विवेक पर निर्भर धर्म की मीमांसा.. मेरी मीमांसा को गलत अर्थों में उनके पास परोसा गया था वर्ना यह तो कभी नही होता कि मैं अहिंसा, जीव दया और मूक प्राणियों के लिए आवाज उठाऊ ओर वे मेरे मिशन को अपना साथ न दे।

बरहाल बड़ी उम्मीदों से गया था उनके पास.. कई लोगो का आग्रह था कि पहले मैं महाराज को बताऊं की कैसे अनजाने में हम सब लोग दूध के स्वाद में अंधे हो कर अप्रत्यक्ष रूप से घोर हिंसा से जुड़े हुए हैं.. आप सब संतश्री का नाम जानने को आतुर हो रहे हो मगर माफ कीजिए.. दया धर्म की कुछ जिम्मेदारीया मुझ पर भी है।

मैं ऐसा कुछ नही कर सकता कि मेरे संत को कोई मेरा नाम ले कर इस बाबत सवाल खड़े करे.. हजारो लाखो साल से दुनिया अनजाने में होने वाले अपने इस अपराध अंजान है ओर इस अपराध का बोध कराने के लिए सब से कारगर कोई उपाय है तो वह है हमारा साधु समाज.. साधु की वाणी आमजनों को हर भली बुरी बात का अहसास कराती है.. साधु समाज मोक्ष का मार्ग बताती है।

ओर यदि साधु समाज ने यह महसूस कर लिया की आज तक मनुष्यों के हाथों दूध की प्राप्ति के लिए घोर हिंसा अनजाने में होती आयी है और उन्होंने यह धार लिया की अब इस हिंसा को रोकना है तो यह हो सकता है.. हिंसा की यह परम्परा ढह सकती है.. मैं इसीलिए साधु महाराज के पास गया था.. मैं उत्साह से लबालब भरा था मगर मामला जरा यहां कुछ दूजा ही हो गया।

हिंसक व्रती को समझने की बजाय महाराज रुस्क शुष्क हो गए और चलो निकलो यहां से यह बोल गए.. उनका यह कथन उनकी चर्या से विपरीत था.. शंकाओ के निदान को वे लालायित रहते हैं मगर आज वे बचाव की मुद्रा में थे.. मुझ से बोलना नही चाहते थे.. मेरी साफगोई उनकी बैचनी की वजह थी और यही बैचेनी उनके स्वर को तल्ख कर गई.. नही बोलना था जो जुबाँ वह बोल गयी।

चलो निकलो उनका कहना मुझे बाद में खुशी भी दे गया क्योंकि शायद सफेद दूध का रक्तिला सच उनके ह्दय में कौंध गया हो वे शायद जान गए हो कि रसोई से उठती घी से बने पकवानों की सुंगन्ध दरअसल किसी पंचेन्द्रिय जीव की आह ही है.. मैं नही रुका वहां.. चलो निकलो के आदेश का पालन किया।

अपने सफर की ओर बढ़ चला.. जानता था कि मेरा सफर तो घर पर खत्म हो जायेगा मगर संत के मन के द्वंद का तूफान नही रुकेगा.. ओर यह आशा भी बलवती है कि यह तूफान अहिंसा को नए पायदान पर खड़ा कर दे.. अनेक अनेक धन्यवाद.

रमेश तोरावत जैन
अकोला
मोब 9028371436

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