डॉ. चंद्रेश कुमार छ्तलानी की कविताएं | Dr. Chandresh Kumar Chhatlani Poetry

जेब में रिश्तों कोवो सिक्कों-सा जेब में रखता था,सोचता – यही सही जगह है,ज़रूरत पड़ी तो निकाल लो, वरना पड़े रहें यहीं। और आया एक वक़्त,किस्मत ने जेब उधेड़ दी।जो कुछ भी था,सारा निकल कर गिर गया –सड़क पर।रुपए तो राहगीरों ने समेट लिए,मगर रिश्ते…दूसरों की ठोकरों के धूल-धक्कड़ में,बिखरते रहे,किसी ने न उठाए। उसने … Continue reading डॉ. चंद्रेश कुमार छ्तलानी की कविताएं | Dr. Chandresh Kumar Chhatlani Poetry