“यह ज़िन्दगी” ( Yah zindagi ) भटक कर ना जाने कहीं दमी रह गई चलकर भी यह ज़िन्दगी थमी रह गई। कहा तो बहुत मगर सुना नहीं गया जाने शब्दों में मेरे कहाँ कमी रह गई। उसकी ख्वाहिशों की बात करते सब मेरे जज्बातों में तो बस नमी रह गई। जहाँ चलते रहे बेबाक … Continue reading यह ज़िन्दगी | Ghazal Zindagi
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