प्रेम की न कोई भाषा होती है,न परिभाषा,न सीमाएँ उसे सीमित करती हैं , न दूरियाँ उसे ओझल करती है, वह दूरी जीवन और मृत्यु भी क्यों न हो! “पूर्णमिदम् ” के बाद सरोज कौशिक का यह उपन्यास ” पूर्णमदः”; अलग-अलग होते हुए भी ये दोंनो उपन्यास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।वह अध्यात्म के आलोक … Continue reading पूर्णमदः के फ्लैप पर
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