ओ निर्मोही | Kavita o nirmohi

ओ निर्मोही

( O nirmohi )

 

  1. ओ निर्मोही

ओ निर्मोही चले गए क्यों, छोड मुझें परदेश।
तपता मन ये तुम्हें बुलाए, लौट के आजा देश।
तुम बिन जीना नही विदेशिया,पढ लेना संदेश।
माटी मानुष तुम्हे बुलाए, छोड के आ परदेश।

 

2. चटोरी नयन 

चटोरी नयन हो गयी, पिया मिलन की आस में।
निहारत हर पल तुमको, तडप रही है प्यास सें।
दरश को प्यासी अखियाँ,भूख प्यास सब भूल गयी।
चटोरी नयन हो गयी, श्याम दरश के आस में।

 

3. फक़्त इक दर्द

फक़्त इक दर्द हैं जो, दिल से जाता ही नही है।
मोहब्बत है जो उसको,तो बुलाता क्यो नही है।
झलकता प्यार आँखों से, जताता पर नही है।
फक़्त इक दर्द है कि वो, बताता क्यों नही है।

 

4. सहता संतति

सहता संतति की बातों को, बुढा मन लाचार।
याद करो तुम भी उस पल को, पिता पुत्र के द्वार।
जैसी करनी वैसी भरनी, अब कैसा संताप।
समय चक्र में फंसे हुए सब, जुडा हुआ हर तार।

 

5. मुक्त मन

मुक्त मन का मैं पथिक हूँ, ना मुझे स्वीकार बन्धन।
घिस रहा अनुभव शिला पर, ऐसे जैसे रक्त चन्दन।
पथ यहाँ कंटक भरे पर, ना झुका और न गिरा मैं,
कर्म के पथ पर चला मैं, बन गया हूँ जैसे कुन्दन।

 

6. सम्भव हो तो

सम्भव हो तो कह देना तुम, मुझसे मन की बात।
तो शायद कह दूँ मै तुमसे, अपने भी ज़ज्बात।
पहले आप के चक्कर में,कही बीत ना जाए रात।
हिम्मत बाँध के ही कह दो पर,कह तो दो हर बात।

 

7. खुली आँख

खुली आँख से सब देखा पर, बन्द पलक सें बस तुमको।
भीड़ बहुत है आस पास पर, दिल में मेरे बस तुम हो।

 

8. शैनै शैने बढे चलो

परम्परा का लिए पताका, शैनै शैने बढे चलो।
तेरे साथ ही धर्म चलेगा, धर्म पताका लिए चलो।
आत्महवन से दिव्य कुण्ड में, पहली आहूति तो दो,
राष्ट्र देव की सकल परिधि में,पुष्प अर्चना किए चलो।

 

9. रश्मि रवि की 

रश्मि रवि की कम ना होगी,आभा पूर्ण प्रकाश लिए।
दमकेगा मुख मण्डल ऐसे, जैसे शशि ललाट दमके।
पलक गिए ना तुझे देख , ऐश्वर्य मयी चेहरा तेरा,
बडे़ बड़ों का धर्म बदल दे,अद्भुत यौवन संग तू निकले।

 

10. संसय का बाजार

साफ हुई तस्वीर कहाँ, धुधंला ही धुधंला दिखा मुझे।
संसय का बाजार गर्म था,साफ ना कुछ भी दिखा मुझे।
शुरूवात या अंत कहे हम, कुछ भी समझ न आया है,
अन्तर्मन में द्वंद मचा क्यों, बात समझ ना आया मुझे।

 

11. मशहूर हो गए हम

मशहूर हो गए हम, बदनाम जो हुए हैं।
क्या क्या सहा न दिल ने, सर ए आम जो हुए हैं।
फंक्तियाँ कसी किसी ने तो, इल्जाम भी दिया हैं,
बेबस खडे हुंकार थे बस, राम रह गए हैं।

 

12. मुझे रस्ते का पत्थर मत समझों

मुझे रस्ते का पत्थर मत समझों, जो ठोकर मार के चल दोगें।
मेरे अस्तित्व की नींव हिला करके, कुछ भी कहकर चल दोगें।
मै नकमस्तक हूँ तुझपे दिल से जाँ से, प्रीत अगर पावन है तेरा,
मुझे इतना कमजोर ना समझों की, विश्वास को मेरे छल दोगे।

 

13. दुखी मन

दुखी मन क्यों उलझा है उसमें, जिसकों तुझसें प्यार नही है।
पलट कर देख और भी है दुनिया में, बस वो ही संसार न नही है।
जितना उलझेगा तू उसमें, उतना वो तुझे उलझायेगी,
अब छोड भी दे उन गलियों को, जिनका आधार नही है।

 

14. जीवन पथ 

जीवन पथ कें दोराहें पर, खडा बेचारा सोच रहा।
किस पथ जाए वो संसय में, पडा बेचारा सोच रहा।
जिसकों उसकों अपना माना,उसके मन में और कोई,
इस दुविधा में व्याकुल है मन,खडा बेचारा सोच रहा।

 

15. सदा तुम

तन से दूर रहो पर मन के, पास सदा तुम रहना।
साथ रहे हम नही रहे पर,फोन से बात तुम करना।
कुछ दिन की ही दूरी है ये, फिर हम साथ रहेगे,
अच्छे दिन को याद करो,हरदम ही खुश तुम रहना।

 

16. पर्वत पर्वत 

पर्वत पर्वत शिखर श्रृंखला, मेघ दिखे घनघोर घटा।
अवनि को अम्बर ने देखा,प्रेम मिलन की प्रथम छंटा।
आएगी ऋतु बार बार पर, प्रियतम बोलो कब आओगे,
कल कल छल छल निर्मल जल,सागर मे मिलती खोल जटा।

 

17. भावना भड़क रही है

मोहक से मुखडे की लाली, रवि रश्मि सी दमक रही है।
काजल की पतली सी रेखा,मन के गाँठ को खोल रही है।
सिमटी सी सकुचाई आँखे, प्रेम प्रज्जवलित करती है,
रति सी उन्नत रूप देख मेरी, भावना भड़क रही है।

 

✍?

कवि :  शेर सिंह हुंकार

देवरिया ( उत्तर प्रदेश )

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