ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम

ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम ( पूर्णिका ) ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम चर्चा फिर भी फूल की।इसी बात पर और कंटीली काया हुई बबूल की। जुड़ने वाले हाथ कटे हैं झुकने वाला सिर गिरवीऐसा लगता है मैंने मंदिर में आकर भूल की। रोज़ खुली रामायण पढ़ते पढ़ते जाते छोड़ पिताबड़े प्रेम से हवा बिछा … Continue reading ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम