ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम

ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम

ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम ( पूर्णिका )

ग़ुज़र रहा फूलों का मौसम चर्चा फिर भी फूल की।
इसी बात पर और कंटीली काया हुई बबूल की।

जुड़ने वाले हाथ कटे हैं झुकने वाला सिर गिरवी
ऐसा लगता है मैंने मंदिर में आकर भूल की।

रोज़ खुली रामायण पढ़ते पढ़ते जाते छोड़ पिता
बड़े प्रेम से हवा बिछा देती है परतें धूल की।

राजतिलक की रस्म उसीसे होगी ये मालूम न था
वरना राख जुटा कर रखता स्वाहा हुए उसूल की।

संसदीय गलियारे सुरक्षित रखिए ग्रंथागारों में
अख़बारों को क्या रखें इनमें बातें सब फ़िज़ूल की।

फिर बंदूकें जीतीं,जीते झूठे वायदे और नक़ाब
गॉंधी जी के तीन बंदरों ने फिर हार क़बूल की।

बूढ़ी ऑंखें रो देंगी इस महफ़िल में ये मत बोलो
किसने अपनी क़ीमत किस से किस तरह वसूल की।

विनोद कश्यप,

चण्डीगढ़

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