तरबियत ( Tarabiyat ) सौ बार टूटता है सौ बार जोड़ता है, बहुत मेहनत से कुम्हार एक बर्तन बना पाता है, मानो तो इंसान भी गीली मिट्टी होता है, हर ऐब से पाकीज़ा शफ़्फ़ाफ दिली होता है, सबसे पहले माँ की गोदी में जाता पहला स्कुल वो वहाँ पाता है लफ़्ज़ों को समझना नहीं … Continue reading तरबियत | Hindi Poem Tarabiyat
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