इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है
‘इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है’ हे इन्सान तू अकेला ही आता है,तथा अकेला जहाँ से चला जाता है।तू यहाँ सदैव कुछ खोता व पाता है,नित तेरे-मेरे में उलझता जाता है। हे इन्सान तू स्वयं का भाग्य-विधाता है,साँसों की चलती रहती है कहानी।मिलते तथा बिछड़ते हैं इस पथ में,तू छोड़ जाता है अपनी निशानी। केवल … Continue reading इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है
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