इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है

इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है

‘इन्सान तेरे-मेरे में उलझ जाता है’

हे इन्सान तू अकेला ही आता है,
तथा अकेला जहाँ से चला जाता है।
तू यहाँ सदैव कुछ खोता व पाता है,
नित तेरे-मेरे में उलझता जाता है।

हे इन्सान तू स्वयं का भाग्य-विधाता है,
साँसों की चलती रहती है कहानी।
मिलते तथा बिछड़ते हैं इस पथ में,
तू छोड़ जाता है अपनी निशानी।

केवल वक़्त ही अपना साथी होता है,
जीवन का अर्थ केवल आना–जाना है।
वक़्त का एक-एक क्षण अनमोल है।
ये वक़्त खो दें तो पछताते जाना है।

हे इन्सान ग़र तू अच्छे कर्म करेगा,
तो मरने के बाद भी ज़िन्दा ही रहेगा।
स्वयं के लिए जिया तो क्या जिया?
इन्सान वही जो औरों के लिए जीता रहेगा।

सूर्यदीप

( कवि, साहित्यकार व शिक्षित समाज-सुधारक, समाजसेवी, मानवतावादी, प्रखर चिन्तक, दार्शनिक )

नवोदय लोक चेतना कल्याण’समिति – बागपत

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