कभी रुको जरा | Kabhi Ruko Zara

कभी रुको जरा ( Kabhi ruko zara )   जिंदगी दौड़ती, भागती कहती है रुको थमो जरा पलट के तुम  देखो जरा पद चापो को सुनो जरा  फिर बचपन में आओ जरा  दरख़्त दरवाजे, खिड़कियां  सीढिओ को पहचानो जरा एक दिन बचपन जी लो जरा खिलखिलाहटों को सुनो जरा लगता है जैसे सब मिल गया … Continue reading कभी रुको जरा | Kabhi Ruko Zara