खोज रहे मकरंद कवित्त (मनहरन घनाक्षरी) कैसा ये अजीब रोग,कैसे मतिमारे लोग।दुष्ट मांसाहार भोग,ढूंढ़ रहे गैया में। मुस्कुरा के मंद-मंद,गढ़ रहे व्यर्थ छंद।खोज रहे मकरंद,ग़ैर की लुगैया में। रहा नहीं दया-धर्म,बेच खाई हया-शर्म।डूबने के हेतु कर्म,पोखरी तलैया में। आफ़तों से खेल रहे,मुसीबतें झेल रहे।ख़ुद को धकेल रहे,शनि जी की ढैया में। देशपाल सिंह राघव ‘वाचाल’गुरुग्राम … Continue reading खोज रहे मकरंद
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