खोज रहे मकरंद

खोज रहे मकरंद

खोज रहे मकरंद

कवित्त (मनहरन घनाक्षरी)

कैसा ये अजीब रोग,
कैसे मतिमारे लोग।
दुष्ट मांसाहार भोग,
ढूंढ़ रहे गैया में।

मुस्कुरा के मंद-मंद,
गढ़ रहे व्यर्थ छंद।
खोज रहे मकरंद,
ग़ैर की लुगैया में।

रहा नहीं दया-धर्म,
बेच खाई हया-शर्म।
डूबने के हेतु कर्म,
पोखरी तलैया में।

आफ़तों से खेल रहे,
मुसीबतें झेल रहे।
ख़ुद को धकेल रहे,
शनि जी की ढैया में।

देशपाल सिंह राघव ‘वाचाल’
गुरुग्राम महानगर
हरियाणा

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