खोज रहे मकरंद

खोज रहे मकरंद

खोज रहे मकरंद

कवित्त (मनहरन घनाक्षरी)

कैसा ये अजीब रोग,
कैसे मतिमारे लोग।
दुष्ट मांसाहार भोग,
ढूंढ़ रहे गैया में।

मुस्कुरा के मंद-मंद,
गढ़ रहे व्यर्थ छंद।
खोज रहे मकरंद,
ग़ैर की लुगैया में।

रहा नहीं दया-धर्म,
बेच खाई हया-शर्म।
डूबने के हेतु कर्म,
पोखरी तलैया में।

आफ़तों से खेल रहे,
मुसीबतें झेल रहे।
ख़ुद को धकेल रहे,
शनि जी की ढैया में।

देशपाल सिंह राघव ‘वाचाल’
गुरुग्राम महानगर
हरियाणा

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • भगत सिंह परघनाक्षरी

    भगत सिंह पर घनाक्षरी भरी तरुणाई मे वो, देश की लड़ाई मे वो,फाँसी के फंदे मे झूले, पुण्यात्मा महान हैं। वीर वो कहाते हैं जो, जां देश पे लुटाते हैं,ऐसे ही प्यारे भगत, सिंह वो महान हैं। भारत की शान हैं वो, हमारी आन वान हैं,गाता गुणगान सारा, भारत महान है। हैं शहीद वो कहाते,…

  • होली | मनहरण घनाक्षरी | Holi ke chhand

    होली ( Holi )   गोरा गोरा गाल गोरी, राधा रंग ले आओ जी, आओ खेलें संग होली, रंग बरसाइये।   फूलों की होली भावन, मत रंग लगाओ जी, रंगीलो फागुन आयो, मस्ती भर गाइये।   हंसी-खुशी मस्ती छाई, होली आज मनाओ जी, झूम झूम नाचो गाओ, त्योहार मनाइये।   ले पिचकारी रंग की, मोहन…

  • गजानंद | Chhand Gajanand

    गजानंद ( Gajanand )   मनहरण घनाक्षरी   गजानंद गौरी सुत, गणपति गणराज। विघ्नहर्ता पीर हरे, गणेश मनाइए।   आय पधारो देव हे, एकदंत विनायक। रिद्धि-सिद्धि संग प्रभु, लंबोदर आइए।   प्रथम पूज्य देव हे, संकटमोचन नाथ। यश कीर्ति वैभव दे, निशदिन ध्याइये।   सुख समृद्धि प्रदाता, श्री गणेश महाराज। मूषक वाहन सोहे, मोदक चढ़ाइए।…

  • फूलों की कली | Phoolon ki kali | Chhand

    फूलों की कली ( Phoolon ki kali ) मनहरण घनाक्षरी   महक गई वादियां, महका चमन सारा। फूलों की कलियां खिली, मधुर चली बहार।   मधुबन में बहारें, झौंका मस्त पवन का। कलियों ने महकाया, लो आने लगी बहार।   विविध भांति पुष्पो ने, सुगंधित कलियों ने। मदमस्त किया समां, सुहानी लगी बयार।   महकते…

  • जग से निराला लगे,

    जग से निराला लगे रूप घनाक्षरीमनमीत-8,8,8,8चरणांत -21 जग से निराला लगे,सबसे ही प्यारा लगे,छेड़े जब प्रेम धुन,वह राग मनमीत । मुख आभा लगे ऐसी,पूनम के चाॅ॑द जैसी,मुख शोभित लालिमा,ज्यों रजनी चाॅ॑दप्रीत । दीप उजियार करे,घर की है शोभा बढ़े,दमक रहे जुगनू,ऐसे लगे नैन जीत । अजब सी लीला देखो,प्रेम रस जरा चखो,कहे फिर सारा जग,है…

  • समय रुकता नहीं | Samay rukta nahi | Chhand

    समय रुकता नहीं ( Samay rukta nahi ) मनहरण घनाक्षरी   वक्त निकला जा रहा, समय रुकता नहीं। कालचक्र की गति को, जरा पहचानिए।   शनै शनै बीत रहा, हाथों से निकले रेत। पल पल हर घड़ी, समय को जानिए।   काल की नियति जानो, ठहरता नहीं वक्त। समय को बलवान, जीवन में मानिये।  …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *