‘कुल की रीति’ का दार्शनिक आलोक
‘तुलसी’ कबहुँ न त्यागिए, अपने कुल की रीति।लायक ही सों कीजिए, ब्याह, बैर अरु प्रीति॥ संदर्भ :— यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की नीति पर आधारित रचना “रामचरितमानस” का नहीं है, बल्कि यह “विनय पत्रिका” या उनकी किसी अन्य स्वतंत्र नीति-काव्य रचना से भी नहीं लिया गया माना जाता। बल्कि यह दोहा तुलसीदास जी के नाम … Continue reading ‘कुल की रीति’ का दार्शनिक आलोक
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