‘कुल की रीति’ का दार्शनिक आलोक

‘तुलसी’ कबहुँ न त्यागिए, अपने कुल की रीति।
लायक ही सों कीजिए, ब्याह, बैर अरु प्रीति॥

संदर्भ :— यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की नीति पर आधारित रचना “रामचरितमानस” का नहीं है, बल्कि यह “विनय पत्रिका” या उनकी किसी अन्य स्वतंत्र नीति-काव्य रचना से भी नहीं लिया गया माना जाता। बल्कि यह दोहा तुलसीदास जी के नाम से प्रचलित जनश्रुत दोहों में से एक है, जो तुलसीदास की नीति दृष्टि और विचारधारा को प्रकट करता है, किंतु इसकी प्रामाणिक रचनात्मक पुष्टि किसी प्रमुख ग्रंथ (जैसे रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, हनुमान बाहुक आदि) से नहीं होती।

संत-कवि तुलसीदास न केवल भक्तिकाव्य के शिरोमणि हैं, अपितु भारतीय समाज के नैतिक संरक्षक और जीवन-दर्शन के मर्मज्ञ व्याख्याता भी हैं। उनके काव्य की विशेषता यह है कि वह जनमानस की बोलचाल की भाषा में गूढ़ तत्वों और शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठा करते हैं। प्रस्तुत दोहा भी उनकी उस लोकनीतिक दृष्टि का प्रतीक है जिसमें उन्होंने मानव जीवन के तीन आधारभूत संबंधों—विवाह, विरोध और प्रेम—को विवेकपूर्ण अनुशासन से जोड़ते हुए जीवन की दिशा निर्धारण की चेतना दी है।

‘कुल की रीति’ का अर्थ केवल पारिवारिक परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक जड़ों, सामाजिक मर्यादाओं और आत्मगौरवपूर्ण जीवनचर्या की ओर संकेत करता है।
तुलसीदास जी का यह कथन वस्तुतः एक सांस्कृतिक घोषणापत्र है, जिसमें वे स्पष्ट करते हैं कि संस्कारहीन स्वतंत्रता वस्तुतः अराजकता का रूप ले लेती है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में जब व्यक्ति आधुनिकता के नाम पर अपनी जड़ों से कटकर पश्चिमी चकाचौंध का अनुकरण करता है, तब यह दोहा एक दृढ़ स्मरण कराता है—

“आधुनिकता वह नहीं जो जड़ों को काट दे,
बल्कि वह है जो जड़ों में नये फूल खिलाए।”

“लायक ही सों कीजिए ब्याह” – यह पंक्ति आज के समाज में विशेष महत्व रखती है, जहाँ विवाह आकर्षण, दवाब या विद्रोह के परिणाम स्वरूप संपन्न होते हैं। तुलसीदास के अनुसार विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, अपितु जीवन के दीर्घकालिक सहयात्रा का यथार्थ परीक्षण है।

विवाह का चयन यदि समान विचार, समान संवेदना, और समान उद्देश्य के आधार पर किया जाए, तो वह केवल दांपत्य नहीं रहता, बल्कि एक सांस्कृतिक संतुलन की जीवित प्रतिमा बनता है।

“बैर लायक से कीजिए” — इस वाक्य में विरोध की नैतिकता निहित है।
आज का युग अंध विरोध और प्रतिक्रियात्मक आक्रोश से भरा पड़ा है। व्यक्ति न विचार करता है, न परिणाम की चिंता करता है; वह केवल असहमति को विद्वेष का जामा पहनाकर झगड़े को आत्मसम्मान का पर्याय मान बैठा है।

परंतु तुलसी कहते हैं कि बैर करना हो तो उससे कीजिए जो योग्य है — अर्थात, ऐसा विरोध जो सत्य, नीति और न्याय की भूमि पर आधारित हो, वही सम्मानित प्रतिरोध है। अन्यथा, अविवेकपूर्ण शत्रुता आत्मविनाश का निमंत्रण है।

प्रेम, आज के संदर्भ में, अक्सर आवेग, असंतुलित भावुकता अथवा विरोध के औचित्य में किया गया एक निर्णय बनता जा रहा है। किन्तु तुलसीदास जी इस संबंध में भी एक सशक्त नैतिक आग्रह रखते हैं — कि प्रेम भी योग्यता और समानता पर आधारित होना चाहिए। यह प्रेम केवल दैहिक या भावनात्मक नहीं, बल्कि विचारों की समरसता, जीवन के प्रति दृष्टिकोण की साम्यता और मूल्यों की संगति से पोषित होना चाहिए। प्रेम में यदि स्थायित्व चाहिए, तो वह हृदय और मस्तिष्क दोनों की सम्मति से ही संभव है।

तुलसी का यह दोहा केवल नीति नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दृष्टि की त्रिकालबाधित चेतना है। यह मूल्य-निर्णय की कसौटी प्रदान करता है। आज जब व्यक्ति—

आधुनिकता की खुमारी में परंपरा को त्याज्य मानता है,

रिश्तों को उपभोग और असंतोष के तराजू में तौलता है,

और विरोध को आत्मसंतोष का साधन बना लेता है,

तब यह दोहा “धैर्य, विवेक और मर्यादा” की चिरस्थायी मशाल थमा देता है।

तुलसीदास का यह दोहा हमें आत्मपरीक्षण की ओर प्रेरित करता है।
यह सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण निर्णय — चाहे वह प्रेम हो, विवाह हो या विरोध — कभी भी केवल भावना से नहीं, अपितु बुद्धि, मर्यादा और सांस्कृतिक चेतना से ही लिए जाने चाहिए।

“संस्कारहीन स्वतंत्रता, अंधकार है।
विवेकपूर्ण परंपरा, प्रकाश है।
और दोनों का संतुलन – यही जीवन का संगीत है।”

“यदि जीवन एक वीणा है,
तो उसकी तीन प्रमुख तानें हैं —
प्रेम, विरोध और संयोग।
तुलसीदास हमें सिखाते हैं —
कि इन तानों को यदि विवेक के सुरों में बाँधा जाए,
तो जीवन की हर ध्वनि मधुर बन जाती है।”

अमरेश सिंह भदौरिया
प्रवक्ता हिंदी
त्रिवेणी काशी इ० कॉ० बिहार, उन्नाव

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