मनभावन ( Manbhawan ) मनभावन प्रतिबिम्ब तुम्हारे ,जब सुधि में उतराये हैं ।पाँव तले कंटक भी हों यदि हम खुलकर मुस्काये हैं ।। क्या दिन थे वे जो कटते थे लुकाछिपी के खेलों मेंबन आती थी अनायास जब मिल जाते थे मेलों मेंचूड़ी ,कंगन ,बिंदिया, गजरा देख-देख हर्षाये हैं ।।मनभावन ————— बागों में हर दिवस … Continue reading मनभावन | Manbhawan
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