निर्लज्ज बेरोज़गारी | Nirlaj Berojgari

निर्लज्ज बेरोज़गारी ( Nirlaj Berojgari )   खाली पड़ी ज़ैब से सपने भी खाली आते है, बेकारी की गाली खाते को, अपने भी गाली दे जाते हैं। सारे रिश्ते-नाते बेगाने से मुँह तकते रहते, गुनाहगार की तरह, ‘रोज़गार का प्रश्नचिह्न’ लगाते हैं। अपने ही घर में परिवार का कलंक कहलाकर, माँ-बाप के टुकड़ों पर पलने … Continue reading निर्लज्ज बेरोज़गारी | Nirlaj Berojgari