Nirlaj Berojgari

निर्लज्ज बेरोज़गारी | Nirlaj Berojgari

निर्लज्ज बेरोज़गारी

( Nirlaj Berojgari )

 

खाली पड़ी ज़ैब से सपने भी खाली आते है,
बेकारी की गाली खाते को, अपने भी गाली दे जाते हैं।

सारे रिश्ते-नाते बेगाने से मुँह तकते रहते,
गुनाहगार की तरह, ‘रोज़गार का प्रश्नचिह्न’ लगाते हैं।

अपने ही घर में परिवार का कलंक कहलाकर,
माँ-बाप के टुकड़ों पर पलने वाले ‘नाकारा’ कहलाते हैं।

निर्लज्जता भी गली-मोहल्ले में हँसी उड़ाती,
बातों ही बातों में ‘रोज़गार की खिल्ली’ बन जाते हैं।

दृढ़-निश्चय का प्रण लेकर कितना उछले कोई ?
रोज़गार भी ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ जितने पाते हैं।

नाम बदलकर सरकारें आती-जाती रहती,
रोज़गार के वादे होते; लेकिन, वादे कौन निभाते हैं ?

बेकारी का सारा दोष, बेरोज़गार पे लादा जाता,
रोज़गार से तुलना कर-कर उसको दोषी ठहराते हैं।

उसकी मजबूरी को सुनने वाला कोई होता नहीं,
उत्तर में उसको ही सारे मिलकर अपराधी बताते हैं।

सरकारों की नाकामी युवाओं पर थोपी जाती,
अपने ही घर में युवा घर का बोझ बनकर रह जाते हैं।

अवसर दे सरकारें रोज़गार के बेहतर सबको,
देश के युवा इस ‘बेकारी की गाली’ से अब मुक्ति चाहते हैं।

 

अनिल कुमार केसरी,
भारतीय राजस्थानी

यह भी पढ़ें :-

कवि हूँ कविता में जिन्दा रहता हूँ | Kavi Hoon

Similar Posts

  • पुरुष | Purush par kavita

    पुरुष ( Purush )    जगत में पुरुष पौरुष धरकर पुरुषार्थ दिखलाते शुभ कर्मों से अपने दम पे नाम रोशन कर जाते   निज वचनों पे अटल रहे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम देह दान कर गए दधीचि भारी तप किया निष्काम   औरों की खातिर जीते जो दया करुणा सागर है प्रेम भरी बहती सरिता भावों…

  • ये प्यारे प्यारे बच्चे | pyare bache

    ये प्यारे प्यारे बच्चे ये तोतली बोल के बच्चे, मन के अनमोल बच्चे, नवतन के प्यारे बच्चे , सुन्दर सलोने बच्चे, कारेनयन के तारे बच्चे, नियति के सच्चे बच्चे, स्वराष्ट्र के रतन बच्चे, पितृ- मातृ के अच्छे बच्चे, इनका खिला चेहरा देख के, शर्मा जाते हैं फूल देखो  ये प्यारे- प्यारे बच्चे जाते हैं स्कूल…

  • लहू से ये दुनिया कब तक नहाये | Lahoo se

    लहू से ये दुनिया कब तक नहाये ? ( Lahoo se ye duniya kab tak nahaye )   नज़्म    बारूद को मैं बुझाने चला हूँ, चराग़-ए-मोहब्बत जलाने चला हूँ। दुनिया है फानी, दो पल की साँसें, बिछा दी है लोगों ने लोगों की लाशें। रोती फिजा को हँसाने चला हूँ, चराग़-ए-मोहब्बत जलाने चला हूँ, बारूद…

  • लक्ष्मण रेखा | Laxman rekha kavita

    लक्ष्मण रेखा ( Laxman rekha ) परिधि कों पार नही करना हे माता,वचन हमें दे दो। कोई भी कारण हो जाए,निरादर इसका मत करना। परिधि को पार नही करना….. ये माया का अरण्य है, जिसमें दानव रचे बसे है। कही भी कुछ भी कर सकते है,ये दानव दुष्ट बडे है। ये छल से रूप मोहिनी…

  • नग्नता | Nagnata

    नग्नता ( Nagnata )    नग्नता का विरोध तो सभी करते हैं किंतु, अपने ही घर से उभरती नग्नता को रोक नही पाते मां और बाबूजी के स्थान पर मॉम और डैड सुनने से स्वाभिमान गौरवान्वित होता है….. यहां आओ बेटा ,बैठ जाओ खड़े हो जाओ की जगह कम कम , सिट हियर, या स्टैंड…

  • लघुदीप | Kavita Laghudeep

    लघुदीप ( Laghudeep ) सघन तिमिर में तिरोहित कर देती है कक्ष में नन्हीं-सी लौ लघुदीप की। टहनी में आबद्ध प्रसुन बिखर जाते है धरा पर सान्ध्य बेला तक पर असीम तक विस्तार पाती है– उसकी गंध। रहता है गगन में चन्द्र पर, ज्योत्सना ले आती है उसे इला के नेहासिक्त अंचल तक बाँध उसके…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *