शह और मात ( Sheh aur maat ) चाहत को रखो झील की तरह मंथर गति से हि इसे बहने दो लहरों का वेग तो बस धोख़ा है कदमों को जमीं पर ही रहने दो नजारे हि देते हैं दिखाई परिंदों को बसेरा मगर वहाँ कहीं नहीं मिलता लौटकर आना होता है उन्हे वहीं … Continue reading शह और मात | Sheh aur Maat
Copy and paste this URL into your WordPress site to embed
Copy and paste this code into your site to embed