मुल्क के सुमन | Poem Mulk ke Suman

मुल्क के सुमन

( Mulk ke suman )

 

हम मुल्क के मासूम सुमन
हम धरती माता के धन

हम कोमल है पर सबल है
धुर्ब जैसे सदैब अटल

गगन उगलता आग हो
छिड़ा मरण का राग हो

लहू का अपना फाग हो
हम वही अनुराग है

क्या कर सकेगा दौरे जमां हमारा
मिट जायेंगें खुद ही हर वक़्त जहाँ के हाथों

जो चाहते हैं मिटाना नामोनिशान हमारा
हम फिर भी वही बाग़ हैं जहाँ से गुलशन बिखरती है

हमें सभी से ममता होगी
नै हमारी छमता होगी

🍀

कवि : आलोक रंजन
कैमूर (बिहार)

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