Poem boond bachaye

बूँद बचाये | Poem boond bachaye

बूँद बचाये

( Boond bachaye )

 

बूँद बूँद से सागर भरता
बूँद बूँद से गागर
हम बूँद बचाएंगे तो भर जायेगा चापाकल
बर्षा का जल तो अमृत है होता
पर सब कोई उसे है खाता
बोल रही कब से ये हमारी जमीन है
जल नहीं पेयजल की बड़ी कमी है
अब सब जन इस बात को ले जान
बर्षा जल बचाएंगे सब के दिल का हो अरमान
आने वाले बच्चे हैं आने वाली पीढ़ी है
टूट रहा है धीरे धीरे अभी तैयार सीढ़ी है

🍀

कवि : आलोक रंजन
कैमूर (बिहार)

यह भी पढ़ें :-

युवाओं के लिए बेहद चर्चा का विषय रहा बेहद मोहब्बत | Book review

Similar Posts

  • वजह | Kavita wajah

    वजह ( Wajah )   बेवजह परेशान हो रहे खूब बढ़ गई महंगाई। इसी वजह से घूस बढ़ रही बढ़ रही है तन्हाई।   मजदूरी की रेट बढ़ गई झूठा रोना रोते क्यों। कहो वजह सड़कों पे जा धरनो में सोते क्यों।   हर चीजों के दाम बढ़े तो वेतन बढ़ा हुआ पाया। आमदनी अनुकूल…

  • स्मृति शेष | Kavita Smriti Shesh

    स्मृति शेष ( Smriti Shesh ) हे धरा के पंथी नमन तुम्हें हे धरा के पंथी नमन तुम्हें घर छूटा मिला गगन तुम्हें। तुम चले गए हमें छोड़कर कहे थे रहेंगे रिश्ते जोड़कर। तय था जो होना हो गया हे पंथी तुम नींद में सो गया। चिर शांति मिले अमन तुम्हें हे धरा के पंथी…

  • चूड़ियां | Chudiyan | Kavita

    चूड़ियां ( Chudiyan )   रंग बिरंगी हरी लाल खन खन करती चूड़ियां नारी का अनुपम श्रृंगार सुंदर-सुंदर चूड़ियां   आकर्षण बढ़ाती चूड़ी पिया मन लुभाती चूड़ी नारी सौंदर्य में चार चांद जड़ देती है चूड़ियां   गोल गोल लाल लाल सुंदरता बेमिसाल हाथों की शोभा बढ़ाती हरी हरी चूड़ियां   रत्न जड़ित कंगना मीनाकारी…

  • गौर किया कर | Kavita Gaur Kiya Kar

    गौर किया कर ( Gaur Kiya Kar ) जुमला है ये कठिन मगर कर, सोच समझ अपनाया कर, किसी को हानि न पहुचे वो कर, खुद को भी हर्षाया कर, जोड़ के अपने दोनो कर, सदा बड़ों का आदर कर, कहा गया जो सदा ही कर, प्रभु सम्मुख शीश झुकाया कर, मत औरों की निंदा…

  • बचा लो सृष्टि भगवान | Bachalo Srishti Bhagwan

    बचा लो सृष्टि भगवान! ( Bachalo srishti bhagwan )    अनर्थ व्यापक हो रहे हैं धरती धरा पर दुष्ट आततायी बढ़ रहे हैं धरती धरा पर बढ़ रहे हैं जुल्म यहाँ पर निर्धन बेबस हैं लाचार जाने कैसे देखकर चुप है? जगत के तारनहार! अत्याचार बढ़ा है हद से मची लूट है चहुंओर दबंगई हत्या…

  • मृत्यु का भोज | Mrityu bhoj par kavita

    मृत्यु का भोज ( Mrityu ka bhoj )    मानों बात आज नव युवक लोग, बन्द कर दो यह मृत्यु का भोज। चला रहें है इसको ये पुराने लोग, आज तुम सभी पढ़े-लिखे लोग।।   जीवित पिता  को एक रोटी नही, मृत्यु पर जिमाते आप लोग कई। अपना समय तुम सभी भूल गये, खिलाते थें…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *