Sumit ka Parichay

सुमित मानधना ‘गौरव’ की कविताएं | Sumit Mandhana Poetry

इस खत को कब से संभाल कर रखा था। आज आपका विश्व पत्र लेखन विषय मिलने के बाद यह खत आपके मंच पर साझा रहा हूँ ..

हम सभी के चहेते, कवियों के प्रणेता और बहुत ही सुप्रसिद्ध कवि एवं एक्टर शैलेश लोढ़ा जी की बहुत ही फेमस कविता है, सच-सच बताओ ना यार मिस करते हो कि नहीं। बस तो इन्हीं पंक्तियों को ध्यान में रखकर मैंने अपने जीवन के 15 साल के कुछ खास लम्हों को शामिल किया है।

“सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं”

शादी से पहले तुमसे घंटों बातें करना,
दिनभर तुम्हारे फोन अटेंड करना।
तुम्हारा मुझे सहेलियों से मिलाना।
तुम्हारा मम्मी से मुझे झूठ-मूठ डराना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

शादी के बाद टू व्हीलर पर घूमने जाना,
अचानक से ही बारिश का आ जाना।
रेनकोट होते हुए भी मेरा ना पहनना,
तुम्हारे संग खुद भीग जाना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं..

वह तुम्हारी सैंडल का टूट जाना,
मेरा भी शूज उतार लेना। तुम्हारे संग नंगे पैर चलना,
तुम्हारे दर्द को मेरा महसूस करना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

वह मेरा तुम्हें टू व्हीलर सिखाना,
पीछे-पीछे दौड़ कर चलते जाना।
तुम्हें तनिक चोट न लगने देना,
गिरने से पहले ही तुम्हें थाम लेना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

तुम्हारा स्कूल से थक कर घर आना,
गरमा गरम खाना तुम्हारे लिए बनाना।
अपने हाथों से तुम्हें निवाले खिलाना,
प्यार से बैठाकर तुम्हारा हाथ सहलाना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

संडे को तुम्हें घुमाने ले जाना, तुम्हें मनपसंद शॉपिंग कराना।
कभी मूवी कभी रेस्टोरेंट ले जाना,
तुम्हारे संग में समय बिताना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं..

वह बच्चों को खूब प्यार करना,
परवरिश में तुम्हारी पूरी मदद करना।
बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेलना,
तुम्हारे घर काम में हाथ बंटाना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

तुम्हारी पढ़ाई के लिए मेरा
लोन उठाना,
शादी के बाद भी तुम्हें मास्टर डिग्री दिलाना।
तुम्हारे भविष्य के लिए मेरा जुदाई सहना,
एक साल अपने बीवी बच्चे से दूर रहना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

यूट्यूब पर मेरा रेसिपी सीखना,
तुम्हारे लिए नई-नई डिशेस बनाना।
बच्चों को रोज नये पकवान खिलाना,
सब की सारी इच्छाएं पूरी करना।।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं यार मिस करती हो कि नहीं…

हमारी दसवीं सालगिरह पर मेरा सरप्राइज देना, गिफ्ट बुके मिठाई संग बिन कहे स्कूल में आना।
प्रिंसिपल को सब कुछ थमाकर चुपचाप लौट जाना,
घर पर विश करते हुए तुम्हें प्यारी सी कविता सुनाना। ।
सच-सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

15 वर्ष तक तुम्हारा मेरा साथ निभाना,
दोनों बच्चों संग हँसी खुशी जीवन बिताना।
तुम सभी की तमाम ख्वाहिशें पूरी करना,
परिवार के लिए ही मेरा जीवन समर्पित करना।
सच सच बताओ ना यार मिस करती हो कि नहीं…

अपने हुनर को मेरा दिल में ही दबाना,
अपनी हॉबी शौक का त्याग करना।
तुम्हारी हर बात में मेरा हाँ मैं हाँ मिलाना,
तुम्हारे परिवार के कहे अनुसार ही मेरा चलना।
सच-सच बताना यार मिस करती हो कि नहीं…

तुम्हारे घर वालों को सम्मान देना,
उनके लिए हमेशा कुछ ना कुछ ले जाना।
सास ससुर को माँ-बाप का दर्जा देना,
साला साली पर भी भरपूर प्यार लुटाना।
सच-सच बताना यार मिस करती हो कि नहीं…

अरेंज मैरिज में विवाह के बंधन में बंध जान,
ईश्वर को साक्षी मान हमसफर स्वीकार करना।
तुम्हारा हाथ छुड़ाकर यूँ दूर चले जाना,
फिर कागज के चंद टुकड़ों पर तलाक लिखकर देना।
सच-सच बताना यार मिस करती हो कि नहीं…

सुनो जाना तुम्हारा तो नहीं पता लेकिन मैं
हर पल हर लम्हा हर क्षण तुम्हें और बच्चों को मिस करता हूँ
तुम सभी को याद करके बहुत रोता हूँ बिलखता हूँ।
फिर भी चेहरे पर मुस्कान लिए लोगों को हरदम हँसाता हूँ,
अपने गम को दिल के किसी कोने में दबा के रखता हूँ।
अंतिम पंक्तियां तुम्हारे लिए कहना चाहूँगा..

छोड़ कर महबूब चला गया
जब की मेरी कोई खता नही,
कैसे भेजूं पैगाम मैं उसको
खत है लेकिन पता नहीं!

“मैं और मेरी माँ”


कल मेरी माँ ने मुझसे किया एक सवाल,
जन्मदिन का तोहफा क्या चाहिए मेरे लाल।

मैंने कहा माँ मेरे संग में है महाकाल,
मुझे नहीं है किसी बात का मलाल।

बस इतनी चाह मेरी तुझे बहू मिल जाए,
संग में अपने प्यारे प्यारे बेटा बेटी लाए।

बच्चे अगर छोटे हो तो तू गोद में खिलाये,
अगर बड़े हो तो काम में तेरा हाथ बंटाए।

इतनी सी है ख़्वाहिश मेरी चाह बस इतनी,
हमसफर के संग कटे बची ज़िंदगी जितनी।

माँ बोली माता-पिता के आशीष सदा संतान पर रहते हैं,
लेकिन तलाक के बाद अच्छे हमसफर मुश्किल से मिलते हैं।

माँ-बाप की दुआ बेटा कभी खाली नहीं जाती है,
मांगते हैं बच्चे जो भी उनसे वो उन्हें मिल जाती है।

फिर भी आशीर्वाद है मन चाहा जीवन साथी तुझे मिले,
तेरी मुरझाई हुई ज़िंदगी बेटा एक बार फिर से खिले।

जैसे तू लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरता है,
वैसे ही वह तेरे बेरंग जीवन में सारे रंग भरे।

अपने क्षतिग्रस्त पिता और मेरी बीमारी से भी तू हारा है,
इन बूढ़ी आँखों का बेटा फिर भी तू ही सहारा है।

मैं जानती हूँ बिना हमसफर ज़िंदगी पहाड़ सी लगती है,
हमारे चले जाने के बाद तेरा क्या होगा चिंता मुझे सताती है।

आज की है माँ दोबारा ऐसी बात ना करना,
आप दोनों के बिना मुझे नहीं इस जग में रहना।

समाज और रिश्तेदार ही नहीं यहाँ सब एक दूसरे को काटते हैं,
किसी का भी हाथ बढ़ाने कोई भी आगे नहीं आते हैं।

बीवी बच्चों का साथ छूटने पर तूने मुझे फिर से अपनाया है,
कुदरत को शायद यही मंजूर था सालों बाद उसने हमें मिलाया है।

अगर कोई नहीं मिली तो जीवन तेरे संग ही मिटाना है,
तू अकेली मत जाना माँ मुझे भी तेरे संग आना है।

सोचा था वंश मेरा भी सालों साल आगे बढ़ेगा,
सुमित मानधना गौरव नाम दुनिया में एक दिन चमकेगा।

लेकिन जो ईश्वर को स्वीकार होता संसार में वही होता है,
उसकी इच्छा के विरुद्ध एक पत्ता भी नहीं हिलता है।

—0—

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी वालों ने जब अपने 6000 कर्मचारियों को छंटनी के नाम पर नौकरी से निकाल दिया तब मुझे अपनी एक रचना याद आ गयी..
(जब परिवार में कमाने वाला एक हो और खाने वाले चार हो और ऐसे में अगर छोटी सी मिली हुई नौकरी भी छूट जाए तो उस पर उसके परिवार वालों पर क्या बीतती है, उसी पर यह कविता बनाई है। मेरी यह रचना आपके दिल को छू जाएगी।)

“तदबीर”


रह गई सब तदबीर धरी की धरी,
अचानक ही जब छूट गई नौकरी!

बड़े सुनहरे सपने लेकर आया था नए शहर,
पल में चकनाचूर हो गए गया सब कुछ बिखर।

बहना के ज़ल्दी से पीले करूँगा हाथ,
माँ बाबूजी को लेकर रखूँगा अपने साथ।

छोटे भाई को अच्छी स्कूल में पढ़ाऊँगा,
पढ़ा लिखा कर उसे मैं इंजीनियर बनाऊँगा।

यूँ समझो मैं पहुंच गया था किसी शिखर पर ,
पर यह क्या धड़ाम से गिरा सीधा ज़मीं पर!

कर्मचारियों की कटौती में मेरी कटौती हो गई,
स्थायी नौकरी में से अचानक छुट्टी हो गई।

अब फिर रहा मायूस सड़कों पर मारा मारा,
फिर काम मिल जाए दे दो कोई नौकरी दोबारा।

माँ-बाप और भाई बहन बैठे हैं आस लगाए,
फिर से उन्हें मेरा मनी ऑर्डर मिल जाए।

“हैप्पी मदर्स डे”

एक दिन के लिए मदर्स डे मनाते हैं,
माँ के साथ भी कुछ लोग छल करते हैं।

पूछते भी नहीं है जिन्हे साल भर,
आज के दिन माँ को पूजते हैं।

ऐसे तो करते नही है बात भी उनसे,
आज के दिन वीडियो बनाते हैं।

छूते भी नहीं है जिन चरणों को वो,
सिर्फ फोटो के लिए माँ के पैर दबाते है।

खबर नहीं रखते
माँ की फटी पुरानी साड़ी की,
माँ को अच्छे कपड़े पहनने के लिए कहते हैं।

जिन बच्चों को माँ करती थी तैयार,
वही माँ को तैयार होने की नसीहत देते हैं।

कुछ तो बेटे बहू होते हैं ऐसे भी,
1 दिन के लिए माँ को वृद्धाश्रम से लाते हैं।

कुछ तो इनमें होते हैं इतने बेशर्म ,
वृद्धाश्रम में जाकर फोटो खिंचवाते हैं।

जो कदर नहीं करते हैं अपने माँ-बाप की,
बाद में वो इतनी बुरी तरह से पछताएंगे।

रो रो के हो जाएगा उनका हाल बुरा ,
जब बेटे बहू उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आएंगे।

विधि का विधान है यह जो टाला नहीं जाता है,
जो बोता है जैसे बीज वैसे ही फल पाता है।

देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

पढ़ाई छूट जाए तो बीवी की पढ़ाई पूरी कराता है,
पढ़ाई के दौरान लंबी जुदाई भी वो सहता है।
उसके पंखों को मिलें उड़ान यही वह चाहता है,
बीवी को नौकरी मिलने पर फूला नहीं समाता है।
देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

बीवी के नौकरी करने पर ऐतराज नहीं जताता है,
महीने में एक बार होटल में खाना भी खिलाता है।
छह माह में एक – दो मूवीज भी दिखाता है,
दिल खोल के बीवी को शॉपिंग भी कराता है।
देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

बच्चों की परवरिश में बराबर साथ निभाता है ,
बच्चे जब छोटे हो हाथों से खाना खिलाता है।
शाम को लौटने पर उनके साथ समय बिताता है,
रविवार को उन्हें बाहर घुमाने भी ले जाता है।
देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

अपने सास-ससुर को माँ-बाप का दर्जा देता है,
साला, साली, साडू सबका सम्मान करता है।
बीवी के मायके वालों को भी अपना बताता है,
उनके आदर सत्कार में कहाँ कमी रखता है।
देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

बीवी के रूठ जाने पर हरदम उसे मनाता है,
उसकी खुशियों की लिये अपने सपनों को भूलाता है।
बीवी के चेहरे पर तब भी उदासी जब वो पाता है,
चेहरे पर उसके खुशी रहे बस यही वह चाहता है।
देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

कुकिंग का शौक ना होते हुए भी खाना पकाता है,
अपने हाथों से बनाकर बीवी को वो खिलाता है,
मीठा कभी नमकीन नई-नई चीजें बनाता है,
बच्चों को अलग व्यंजन बनाकर खिलाता है।
देखो फिर भी किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

जब कोई तीसरा उनके बीच में आ जाता है,
लव ट्रायंगल में वह बुरी तरह फंस जाता है।
उसकी आर्थिक स्थिति का मजाक बनाया जाता है,
उसकी कमियों को तब हर बार गिनाया जाता है।
देखो फिर किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

मायके वालों की दखलअंदाजी बर्दाश्त करता है,
साला साली के तानों को भी चुपचाप सुन लेता है।
तब इनका षड्यंत्र सच में सफल हो जाता है,
पता नहीं क्यों और कैसे पर उनका तलाक हो जाता है।
देखो फिर किस्मत में अकेला वो रह जाता है!
देखो फिर किस्मत में अकेला वो रह जाता है!

आज के हालात

देखकर आज कल के हालात।
कहनी पड़ रही है यह बात।
भारी और पीड़ित मन से कि,
दफन कर दिये अपने जज़्बात!

कहीं लड़कियाँ कट रही है।
कहीं लड़के मारे जा रहे हैं।
बेरहमी से कितने हिस्सों में,
देखो मासूम काटे जा रहे हैं।

कोई अंधा हो गया वासना में,
किसी को लालच है पैसे का।
घृणा भर चुकी उनके मन में,
ज़मीर भी मर चुका ऐसों का।

कोई विकृत मानसिकता का है,
किसी की मनोदशा खराब है।
कोई रख रहा संबंध बहुतों से,
किसी की नीयत ही खराब है।

ना किसी के बेटे सुरक्षित है,
न ही कहीं बेटियाँ महफूज है।
इन अधर्मी दुष्ट पापियों का,
सच में कैरेक्टर ही लूज है।

सीख कर सेल्फ डिफेंस टेक्निक,
बच भी सकते हैं बाहर वालों से।
घर में ही दुश्मन भरे पड़े अब तो,
भगवान बचाए ऐसे घरवालों से।

“पुलवामा अटैक-ब्लैक डे ऑफ इंडिया”

जाया नहीं जाएगी कुर्बानी
देश के जवानों की,
दुश्मनों तैयारी कर लो
अपने जनाजे उठाने की।

जवानों की शहादत पर
न खौले वो खून नहीं पानी है,
जो देश के काम ना आए
बेकार वह जवानी है।

कभी पाकिस्तान कभी आतंकियों ने कि मनमानी है,
इन्हे सबक सिखाने की
भारतीय जवानों ने ठानी है।

जाया नहीं जाएगी कुर्बानी,
मेरे देश के जवानों की।
दुश्मनों तैयारी कर लो,
अपने जनाजे उठाने की।

कभी पठानकोट उरी अब पुलवामा को निशाना बनाया है,
भरत माँ के सपूतों ने हर बार ही मज़ा चखाया है।

जवानो की शहादत पर हमने अश्रु बहाया है
मेरे वीर जवानों ने दुश्मन को मार गिराया है।

फिर होनी चाहिए सर्जिकल स्ट्राइक हर भारतवासी चिल्लाया है,
नहीं होना चाहिए लहू अब ठंडा जो इस बार गरमाया हैं।

जाया नहीं जाएगी कुर्बानी,
मेरे देश के जवानों की।
दुश्मनों तैयारी कर लो,
अपने जनाजे उठाने की।

मैं भी हो गया बुड्ढा

मैं भी हो गया बुड्ढा,
तू भी हो गई बुड्ढी।

क्या इस जन्म में,
मिलेंगे फिर कभी।

थोड़ा धैर्य मैं रखता,
थोड़ा पेशेंस तू रखती।

थोड़ा धीरज मैं रखता,
थोड़ा सब्र तू रखती।

बनी हुई हमारी बात,
इस कदर ना बिगड़ती।

मैं भी हो गया बुड्ढा,
तू भी हो गई बुड्ढी।

क्या इस जन्म में,
मिलेंगे फिर कभी।

जब 25 का था हाथ थामा,
अब हो गया हूँ प्लस फोर्टी।

तब भी थी तेरी ज़रूरत ,
अब भी है कमी खलती।

जाने किन बातों में आ,
कर बैठी ऐसी गलती।

रहती थी बनकर फेतफुल,
क्यूँ की फिर इन्फिडेलिटी?

जिसने हाथ था पकड़ा,
वो था बड़ा ही कपटी।

ले गया बच्चों संग बीवी,
उसका माइंड था डर्टी।

पति-पत्नी के झगड़ों में,
देखो पीस गए बेटा बेटी।

करते थे हम कितनी मस्ती,
मेरे बच्चे बड़े थे नॉटी।

सुधार लेते हैं बुढ़ापे में,
जवानी में जो की गलती।

भविष्य भी संवर जाएगा,
जमा की है कुछ संपत्ति।

आख़िर शुरू से रहा है,
पैसा ही तुम्हारी प्रायॉरिटी।

तलाक के साथ तुमने,
ले ली थी मेरी प्रॉपर्टी।

देखो मेहनत करके मैं,
बन गया फिर से वेल्थी।

जब तक था सेहतमंद,
कहलाता था मैं हेल्दी।

घिर चुका हूँ डिप्रेशन से,
टेंशन से हो गया सेंटी।

मैं भी हो गया बुड्ढा,
तू भी हो गई बुड्ढी।

क्या इस जन्म में,
मिलेंगे फिर कभी।

कवि : सुमित मानधना ‘गौरव’

सूरत ( गुजरात )

#sumitkikalamse

#atulsubhash

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