हलाहल का प्याला

हलाहल का प्याला

कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला |

हर डगर मोड क्या पग-पग पर था अंधियारा
था कहीं क्षितिज से दूर भाग्य का हरकारा
हमने संघर्षो में कर्तव्यों को पाला ।
कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला |।

अब आदि-अन्त का भी हमको कुछ ज्ञान नहीं
इस जीवन -पथ में चलना भी आसान नहीं
जब रक्त जला तब दिया दीप ने उजियाला ।।

कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला |

वे क्या रूठे लगता है जग ही रूठ गया
जो साहस था वो कही अचानक छूट गया
हर नगर अपरिचित लगा हमें देखा भाला

कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला |

मन पीड़ा ने रस घोल दिया उर -गागर में
जिसको पीकर जग डूब गया सुख -सागर में
समझा जग ने इस काव्य कलश को मधुशाला

कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला |

जब-जब अन्तस में जीवन था जलजात खिला
जन-जन को सागर मरूथल में मधुमास मिला
इस भाँति गीत की पाँखुरियों में मधु डाला

कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला |

Vinay

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003

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