जीवन के रंग

आवा-गमन


जो आया जग में अंत जाना है,
जो जाया जग में अंत जाना है।

प्रकृति की रचना प्रबल आवा-गमन अडिग,
चौरासी लाख योनियों का उत्पन्न पतन अडिग।

चार खानें चित्त अजर अमर कोई नहीं,
सबके अंदर सांसें अता पता कोई नहीं।

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार पांच प्रमुख,
भिन्न-भिन्न रंग रूप तीन ताप संताप सुख।

दस इन्द्रियां सबका अपना क्रम धर्म-कर्म,
पच्चीस प्रवृतियां विभिन्न मुद्रायें मर्म धर्म-कर्म।

कागा रस रूप गंध शब्द स्पर्श कर्तव्य,
अगन गगन पवन जल थल सशक्त कर्तव्य।

कागा की कलम

कवि साहित्यकार: डा. तरूण राय कागा

पूर्व विधायक

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