माँ | Maa Ke Upar Kavita

माँ

( Maa )

 

खिली धूप से चमक रहे थे
उसके बाल
अनुभव की सिकुड़न रहती
उसके माथे पर
कड़वा तीखा बोलने की
ताकत उसके लब पर
मुस्कुरा कर फिर आ जाती
तेरे एक बुलाने पर
रिश्तो के ताने-बाने में
उलझी रहती जीवन भर
तरतीब से रखा हुआ सामान
उसके होने का एहसास कराता है।
चौके से उठती खुशबू मे
सारा दुलार डाला है।
दर्पण देखे कभी नहीं वो
लगती सुंदर मधुबाला हैl
उसके रहते घर मंदिर में
गोकुल मुरली वाला है।
जन्नत स्वर्ग ढूंढ रहे तुम
झुकी कमर कमजोर
नजर है माँ की
खुद दुख सह तुझको
पाला है।
जन्नत स्वर्ग ढूंढ रहे तुम
कब से
चरणों में देखो उसके
काशी काबा हैl

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

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