शायद नींद आ जाए
दिया उल्फ़त का जल जाए तो शायद नींद आ जाए
कसक दिल की निकल जाए तो शायद नींद आ जाए
ज़रा-सा पास आओ तुम यही है क़ल्ब का अरमाँ
घड़ी भर यह बहल जाए तो शायद नींद आ जाए
तुम्हारे दिल में ही हमदम कभी अपनी मुहब्बत का
अगर इक खिल कमल जाए तो शायद नींद आ जाए
अगर नज़दीक हो हमदम लबों पर शोख़ियाँ रहतीं
ग़ज़ल की बात चल जाए तो शायद नींद आ जाए
चले आते हो ख़्वाबों में जगाने रोज़ रजनी को
तबीयत गर सँभल जाए तो शायद नींद आ जाए
श्री गणेश महोत्सव
चौपाई संख्या – १०
【१】
माह भाद्रपद का है पावन।
जन्म चतुर्थी तिथि मनभावन।।
रूप चतुर्भुज लगे सुहावन।
शिव- गिरिजा के पुत्र गजानन।।
【२】
प्रथम पूज्य हैं गणपति देवा।
सर्वप्रथम हो इनकी सेवा।।
सबका मंगल करने वाले।
गणपति हमको शरण लगाले।।
【३】
रख पितु- माता के पग चंदन।
प्रथम तुम्हारा होता वंदन।।
लंबोदर को मोदक भाता।
विद्या – संतति के हो दाता।।
【४】
अरि मत्सर के बने निकंदन।
सिंदूरी लगता है चंदन।।
वक्रतुण्ड का मूषक वाहन।
पीतांबर है अति मनभावन।।
【५】
विध्नहरण सब संकट हरते।
सकल मनोरथ पूरण करते।।
अतुलित मेधा के हो नायक।
भक्तों को बुधवार सहायक।।
【६】
शुभकारी हो मंगल देवा।
पान सुपारी चढ़ता मेवा।।
दूर्वार्पण है मंगलकारी।
वरदहस्त हैं अति सुखकारी।।
【७】
सूपकर्ण मुख तेज विराजे।
एकदंत कर मुँदरी साजे।।
कार्तिकेय हैं भ्रात तुम्हारे।
भक्तों के तुम बने सहारे।।
【८】
ऋद्धि- सिद्धि के हो तुम स्वामी।
कृपा करो हे अंतर्यामी।।
बेटी हैं संतोषी माता।
मनसा बहना जग विख्याता।।
【९】
असुर सभी तुमसे भय खाते।
गजमुख भक्तों को उर लाते।।
सुत शुभ-लाभ तुम्हारे जानो ।
सूक्ष्म दृष्टि गणपति की मानो।।
【१०】
संत सभी तुमको चित लाते।
मनवांछित फल सब जन पाते।।
दर्शन तेरा प्रभु सुखदाई।
पुष्प- हार ले रजनी आई।।
श्रीगणेश चतुर्थी
सुखकारी गण- रूप है, जग में अपरंपार।
भक्ति करो इनसे मिले, खुशियों का भंडार।।१।।
मोदक प्रिय पकवान है, रुचि से खाते आप।
जन- जन के हरते सदा, जीवन के हर पाप।।२।।
दूर्वा अर्पण कर उन्हें, देते हैं जो भोग।
उनसे रहते दूर ही, सकल दोष अरु रोग।।३।।
बुधवासर है अति परम, भक्तों को प्रिय जान।
इस दिन पूजा- पाठ से, होता बहु- कल्यान।।४।।
भादों की ही चौथ को, हुए अवतरित आप।
दर्शन से कटते सदा, सबके सारे पाप।।५।।
हरियाली तीज
तीज हरियाली आई,
मन में उमंग लाई,
पिया आप चले कहाँ,
पास मेरे आइए।
पेड़ों पर झूले पड़े,
दूर क्यों हैं आप खड़े,
ले के घटाओं के घड़े,
प्रेम बरसाइए।
चूड़ियों की खन-खन,
पायलों की रुन-झुन,
मेंहदी का रंग बन,
जिया में समाइए।
चूनर है मेरी धानी,
आपकी मैं बनूँ रानी,
रजनी की सुन बानी,
चंद्र बन जाइए।।
कद्र नहीं उनकी करते जब रहते बीच हमारे लोग
कद्र नहीं उनकी करते जब रहते बीच हमारे लोग
छोड़ जहाँ को जाने वाले सबको लगते प्यारे लोग
जग है एक सराय यहाँ पर आते कितने सारे लोग
कौन किसी का अपना होता जाते हाथ पसारे लोग
आँचल में उसके रहते हैं बनकर चाँद-सितारे लोग
माँ के हाथों से खाते हैं खाना राजदुलारे लोग
दीवानी बदली के जैसे फिरते हैं मारे-मारे
प्रेम बढ़ाने पास न आना हम तो हैं बंजारे लोग
संदेशा भेजा होगा परदेशी बालम ने हमको
रस्ता देख रही है रजनी कब आएँ हरकारे लोग
“पनघट”
पनघट प्रतिपल पंथ निहारे, कब आओगी लाडो मेरी!
लुका-छुपाई खो-खो खेली, पनघट के ही चौबारे पर।
लहँगा-चुनरी-चोली पहने, बाँध दुपट्टा मटक-मटक कर।
छोटी-सी मटकी लटकाए, नन्हीं-नन्हीं बँहिंयाँ तेरी।
पनघट प्रतिपल…….!
विद्यालय जाने से पहले, पनघट से पानी भर लाती।
संग बैठकर फिर अम्मा के, चूल्हे पर रोटी बनवाती।
छोटे चकला-बेलन तेरे, और बर्तनों की थी ढेरी।
पनघट प्रतिपल…….!
मधुर सुनहरे सारे किस्से, मनस्पटल पर छाए हैं।
सावन की रिमझिम बूँदों को, जबसे बादल लाए हैं।
राखी पर तुम दौड़ी आना, नहीं लगाना कोई देरी।
पनघट प्रतिपल…….!
चिड़िया चहकी पेड़ पर
चिड़िया चहकी पेड़ पर, भरकर उर आनन्द।
अपनी ही धुन में रहे, गाती सुन्दर छन्द।।
गाती सुंदर छन्द, भले ही आँधी आए।
कोई हो तूफान, कदम वह भरती जाए।।
पतझड़ हो रँगहीन, बहारें या हों महकी।
रजनी बाँधो गाँठ, कहे जो चिड़िया चहकी।।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
१
छाई भादों की घटा, अँधियारा चहुँ ओर।
अर्ध रात्रि जन्माष्टमी, वर्षा थी घनघोर।।
वर्षा थी घनघोर, उफनती यमुना ऐसी।
दर्शन देंगे श्याम, सजी हो दुल्हन जैसी।।
रजनी में ही थाम, लिए जब नन्द कन्हाई।
मुकुलित सारे देव, गगन में सुषमा छाई।।
२
आई है शुभ यह घड़ी, अति विशेष है पर्व।
मना रहे जन्माष्टमी, होता सबको गर्व।।
होता सबको गर्व, यशोदा हित सुखकारी।
हर्षित रंजित नन्द, सभी ब्रज के नर-नारी।।
रजनी में प्राकट्य, जगत में बजी बधाई।
जय गिरिधर गोपाल, घड़ी यह शुभ है आई।।
३
छाया जग आनन्द है, प्रमुदित सारे देव।
लगे सुखद जन्माष्टमी, मुकुलित उर स्वयमेव।।
मुकुलित उर स्वयमेव, यशोदा पुलकित भारी।
नन्द- हृदय उत्साह, नगर में खुश नर-नारी।।
रजनी में अवतार, महोत्सव ने हर्षाया।
बजे बधाई खूब, मुदित नभ करता छाया।।
४
प्यासा पनघट देखकर, यमुना हुई उदास।
कहाँ गई वह बाँसुरी, कहाँ तुम्हारा वास।।
कहाँ तुम्हारा वास, कहाँ हो कृष्ण कन्हाई?
मुझको निशि- दिन याद, तुम्हारी हरपल आई।।
राधा है बेचैन, सभी का हृदय बुझा- सा।
दो रजनी को दर्श, किशन मत रखना प्यासा।।
करो तुम प्यार की बरसात थोड़ी
तड़पती है यहाँ पर रात थोड़ी
करो तुम प्यार की बरसात थोड़ी
तुम्हीं से कर रही मैं आसरा अब
लिए आओ कभी सौगात थोड़ी
हमीं से क्यूँ ये उम्मीदें लगाईं
करो तुम भी कभी शुरुआत थोड़ी
हया की बाँध के जंजीर को मैं
बढ़ेगी फिर रुकेगी बात थोड़ी
सितारों से जड़ी डोली को लेकर
यूँ रजनी की चली बारात थोड़ी
अर्श से बारिश हुई है हर तरफ़
अर्श से बारिश हुई है हर तरफ़
खुशनुमा ये ज़िंदगी है हर तरफ़
तेरी सूरत दिख रही है हर तरफ़
दिल धड़कने की ख़ुशी है हर तरफ़
छू लिया तूने मेरे जज़्बात को
रौशनी ही रौशनी है हर तरफ़
पाँव अब टिकते कहीं भी हैं नहीं
हो गई रंगीन धरती हर तरफ़
मिल गई रजनी को दौलत प्यार की
वह ग़ज़ल कहने लगी है हर तरफ़
श्रावणोत्सव
बह्र-
1222 1222 1222 1222
धरा पर ओढ़नी धानी सजाने आ गया सावन
सदाएँ प्रेम की सबको सुनाने आ गया सावन
बहारों को चमन में फ़िर बुलाने आ गया सावन
कली से इश्क़ का वादा निभाने आ गया सावन
किया विषपान शंकर ने उदधि-मंथन हुआ था जब
गरल के ताप को शीतल कराने आ गया सावन
चले हैं भक्त भोले के लिए काँवण शिवालय में
तभी जयकार हर-हर बम लगाने आ गया सावन
घिरे हैं अब्र जो श्यामल गरजते हैं बरसते हैं
इन्हीं रिमझिम फ़ुहारों से रिझाने आ गया सावन
है बेक़ाबू हुआ ये दिल इसी मौसम के जानिब से
तड़प इस क़ल्ब की कितनी बढ़ाने आ गया सावन
ख़ुशी से खिल गया गुलशन सभी भाई के आँगन में
बहन के प्यार की राखी बँधाने आ गया सावन
पड़ेंगे डाल पे झूले सभी सखियों-सहेली के
पुरानी याद बचपन की दिलाने आ गया सावन
उमंगों से बढ़ेंगे पेंग श्यामा-श्याम प्यारी के
हथेली पे हिना का नूर छाने आ गया सावन
कहीं पे सूतफेनी तो कहीं पे बन रही घेवर
अँदरसे की गर्म गोली खिलाने आ गया सावन
पहनती चूड़ियाँ रजनी कलाई में हरी-धानी
सनम को पास लाने के बहाने आ गया सावन
जो तुम्हें देखकर मुस्कुराते न हम
जो तुम्हें देखकर मुस्कुराते न हम
इश्क़ में दिल कभी हार जाते न हम
लड़खड़ाने लगे बिन पिए ही क़दम
काश तुमको ज़ुबाँ से बुलाते न हम
काम अच्छा किया मन में जागी ख़ुशी
पाप से कोई रिश्ता निभाते न हम
दान करते समय मुफ़लिसों के लिए
भूल कर भी बहाना बनाते न हम
दर्द में बीतती गर ये रजनी नहीं
इस ग़ज़ल का असर छोड़ पाते न हम
मन की सरहद
मन की सरहद तू क्या जाने
इसका मक़सद तू क्या जाने
कितनी पीड़ाएँ दिल सहता
इसकी अनहद तू क्या जाने
आँखों से जो पी थी हाला
पग थे लदबद तू क्या जाने
उल्फ़त में मंज़िल कब मिलती
घूमी जनपद तू क्या जाने
रजनी की ग़ज़लों का जादू
करता गदगद तू क्या जाने
त्रिपदा छन्द
1
मनमोहन घनश्याम।
रजनी के सुखधाम,
सुन्दर ललित ललाम।।
2
घिर आए घन श्याम।
मन्द हुआ अब घाम,
महि का रूप ललाम।।
3
छेड़ो मत घनश्याम।
पनघट पर कटि थाम,
उलाहना दे ग्राम।।
गुलाब छोड़ के काँटे बिछा रहा है कोई
गुलाब छोड़ के काँटे बिछा रहा है कोई
ये कैसी राहे – मुहब्बत पे चल दिया है कोई
मुग़ालते में न रहना कि चाहता है कोई
जिसे पुकारा था वो शख़्स दूसरा है कोई
जवाँ हुई है कली बादलों की आहट से
ये लग रहा है फ़लक से पुकारता है कोई
सनम के बज़्म में आने से बढ गई धड़कन
नज़र-नज़र से हुई बात, क्या, ख़ता है कोई
उन्हीं के दम से सवेरा उन्हीं से रजनी है
यहाँ पे कृष्ण- सा क्या दूसरा मिला है कोई
पितृ देवाय नम
परम पूज्य स्मृति शेष पिता जी की वन्दना में हमारी भावाभिव्यक्ति
दोहा छन्द-
“पिता” सदा गुरु रूप हैं, ईश्वर का उपहार।
जीवन का आधार वे, शिशुओं का संसार।।
मुक्तक –
“पिता” नाम के शख़्स इक ढाल हैं।
सदा बच्चों के वास्ते टकसाल हैं।
न भूलो कभी इनके अहसानों को-
बिना इनके नित रोते सब लाल हैं।
दर- ओ- दीवार भीग जाते हैं।
जब “पिता” हमको याद आते हैं।
है सुता “रामचंद्र” की “रजनी”-
गर्व से हम यही बताते हैं।
हाइकु-
आकाश “पिता”
खड़े बाँह पसारे
सिर पर छाँव
जीवनदाता
“पिता” अडिग नित
अंतः कोमल
“पिता” हैं माली
जीवन बगिया का
पालनहार
घुटनों चलें
नन्हें सुत-सुता
“पिता” प्रसन्न
उँगली थामे
कठिन डगर पे
“पिता” सहारा
मुश्किल घड़ी
कोई न देता साथ
“पिता” सँभाले
बेटी हो विदा
“पिता” आँसू को रोके
धरता धीर
बेटे का जाना
पढ़ने को विदेश
खर्चा दें “पिता”
अगणित हैं
उपकार “पिता” के
पाऊँ न पार
हर जनम
मिलें प्रभु हमको
यही “जनक”
माहिया-
अंबर की छाया है
देव बसें जिसमें
“पापा” का साया है
कुण्डलिया छन्द-
रही भलाई ही सदा, “पिता” आपके नाम।
हृदय प्रेम की भावना, अथक परिश्रम काम।।
अथक परिश्रम काम, कभी आराम न करते।
अडिग खड़े पाषाण, सदृश थे धीरज धरते।।
हुई देह है शांत, मगर सब करें बड़ाई।
‘रजनी’ को है गर्व, “पिता” में रही भलाई।।
भरी भलाई की लगन, “पितु” की सबके साथ।
करते रहे सहायता, थाम सभी का हाथ।।
थाम सभी का हाथ, सदा थे नेह जताते।
करते हैं अब याद, सतत हैं सब बतलाते।।
धन है यह अनमोल, यही है पुण्य कमाई।
गई “पिता” के संग, हृदय में भरी भलाई।।
दुष्कर है लिखना बहुत, तुम पर संत कबीर
【1】
दुष्कर है लिखना बहुत, तुम पर संत कबीर।
ढाई अक्षर जो पढ़े, सबसे बड़ा अमीर।।
【2】
‘मैं’ की गठरी बाँध कर, फिरती हूँ मैं मूढ़।
हरि को अपने मध्य मैं, कैसे पाऊँ ढूँढ़।।
【3】
यह तन काली कोठरी, मन है कोरा ठाँव।
पहले गुरु गोविंद में, किसके पड़ना पाँव?
【4】
आलस से भरपूर है, मेरा सकल शरीर।
कल के सारे काम अब, बनें न आज प्रवीर।।
【5】
पढ़ कर तुम्हें कबीर मैं, लेती हूँ हर सीख।
उत्तम दोहा लिख सकूँ, दो रजनी को भीख।।
भीगते ख़्वाबों की दिलदारी रखो
अलगनी में भीगते ख़्वाबों की दिलदारी रखो
ग़म तहाने के लिए इस दिल में अलमारी रखो
राम हैं मुँह में मगर रखते बगल में हैं छुरी
दोस्ती में दंश से बचने की तैयारी रखो
छल से पत्नी कर रही है क़त्ल पति का आजकल
बाद शादी के निरन्तर जाँच तुम जारी रखो
छूने आए पास रावण गर तुम्हें संसार में
भस्म करने के लिए आँखों में चिंगारी रखो
जिस घड़ी कह दी ग़ज़ल रजनी ने अपने दर्द की
आँसुओं को रोकने की कोशिशें भारी रखो
मानिनी (सुमुखी/मल्लिका) सवैया
1
अतीव सुरम्य गिरीश विवान, किरीट सुशोभित है जग में।
मुनीश यहाँ करते सब वास, सुरम्य विहान करे रग में।।
उमा सह सिद्धि गणेश महेश, करें तप नित्य इसी डग में।
दिनेश सुरेश समेत प्रवेश, प्रणाम करे रजनी पग में।।
2
भवान भुआल भजूँ गिरिराज, सदा तप- ध्यान बना रहता।
कड़ा अति शीत- तुषार प्रहार, प्रवाल समान सभी सहता।।
यहीं पर देवनदी पुनि वास, पुनीत धरा जग भी कहता।
करूँ अभिवन्दन पंथ पखार, कहे रजनी इतनी महता।।
3
सभी मिल आज चलें मथुरा, करते यदुवीर निवास जहाँ।
पुकार करें हम द्वार खड़ीं, तुम त्याग दिए वह रास कहाँ।।
निहार रही यमुना कबसे, भटकी मटकी तज प्यास वहाँ।
उदास पड़ी अब कुंज गली, करती रजनी हरि आस यहाँ।।
शूरवीर महाराणा प्रताप जी
हल्दीघाटी में दिखा,राणा का रण-रंग।
शूरवीर मेवाड़ का,डटा सैनिकों संग।। १
चेतक था अति प्रिय उन्हें,बरछी ढाल कृपाण।
मातृभूमि की राह पर,न्योछावर थे प्राण।। २
चुस्त चाल चेतक चले,भरता चपल उड़ान।
चंद्रलोक की सैर पर,जाता था यह यान।। ३
राणा देते थे नहीं,सपने में आराम।
अकबर थर्राता सदा,सुन कर उनका नाम।। ४
यही पढ़ा इतिहास में,अकबर रहा महान।
सारे अक्षर को मिटा,दो राणा को मान।। ५
रोटी खाई घास की,नहीं झुकाया शीश।
राणा की गाथा कहें,बड़े-बड़े वागीश।। ६
राणा के सच्चे सखा, जो थे भामाशाह।
सकल संपदा दान की, कठिन हुई जब राह।। ७
अपनी भावी पीढ़ियाँ,सच्चाई लें जान।
नित-नित उनके मुख बसे, गौरवशाली गान।। ८
मिली हमें यह प्रेरणा,और मिला यह ज्ञान।
राणा जैसा है नहीं,धरती पर इंसान।। ९
जय-जय-जय-जय घोष से,गूँज उठे नभथाल।
गर्वित टीका हम करें,केसर चंदन भाल।। १०
सावित्री व्रत
१
धर्मशील पत्नी सदा,हरती हर संताप।
स्वस्थ-सुखी साजन रहे,करती है वह जाप।।
२
वाम अंग पत्नी रहे,करे दाहिने काम।
जीवन भर पति को सदा,देती है आराम।।
३
वट का वह पूजन करे,निष्कंटक हो राह।
उम्र बढ़े पति की सदा,पत्नी की यह चाह।।
४
यम लेकर जब चल दिए,सत्यवान को साथ।
सावित्री सँग में चली,वापस लूँगी नाथ।।
५
संशय में फिर पड़ गए, स्वयं तभी यमराज।
सत सावित्री के लिए, सत्यवान सरताज।।
६
झुका हुआ था शीश फिर,सम्मुख किया प्रणाम।
पत्नी जिसकी पतिव्रता,घर में चारों धाम।।
७
रहूँ सुहागन मैं सदा,पत्नी बनकर नाथ।
सात जन्म तुम ही पिया,थामो मेरा हाथ।।
कहीं प्यार से आबोदाना नहीं है
ख़ुदी को नज़र से गिराना नहीं है
हमें ग़ैर से दिल लगाना नहीं है
नहीं क़ाफ़िया बह्र में बैठ पाए
ग़ज़ल ऐसी कहना-सुनाना नहीं है
करो वार तीरे नज़र से न हम पर
तुझे पास हमको बुलाना नहीं है
कड़ी धूप में जल गया है बदन ये
तेरे दिल में क्या अब ठिकाना नहीं है
न समझो मुहब्बत में आएगी अड़चन
अज़ी इतना ज़ालिम ज़माना नहीं है
मुहब्बत के मारे परिन्दे हैं बे-कस
कहीं प्यार से आबोदाना नहीं है
जहाँ जी करेगा बुलायेगी रजनी
बहाना तुझे अब बनाना नहीं है
पनघट ( गीत )
पनघट प्रतिपल पंथ निहारे, कब आओगी लाडो मेरी!
लुका-छुपाई खो-खो खेली, पनघट के ही चौबारे पर।
लहँगा-चुनरी-चोली पहने, बाँध दुपट्टा मटक-मटक कर।
छोटी-सी मटकी लटकाए, नन्हीं-नन्हीं बँहिंयाँ तेरी।
पनघट प्रतिपल…….!
विद्यालय जाने से पहले, पनघट से पानी भर लाती।
संग बैठकर फिर अम्मा के, चूल्हे पर रोटी बनवाती।
छोटे चकला-बेलन तेरे, और बर्तनों की थी ढेरी।
पनघट प्रतिपल…….!
मधुर सुनहरे सारे किस्से, मनस्पटल पर छाए हैं।
सावन की रिमझिम बूँदों को, जबसे बादल लाए हैं।
राखी पर तुम दौड़ी आना, नहीं लगाना कोई देरी।
पनघट प्रतिपल…….!
जय हनुमान!
( माहिया छन्द )
हनुमत का राघव से
मेल अवधपुर में
बुढ़वा मंगल तबसे
मंगल करने आया
आज बड़ा मंगल
मन ने मंगल गाया
सारे मंदिर जाते
बड़का मंगल को
हनुमत की जय गाते
भक्त लखनपुर वासी
बाँट रहे शरबत
रहे न जनता प्यासी
चिल-चिल करती गर्मी
बड़का मंगल को
शीतल जल दे नर्मी
हैं पग-पग भण्डारे
बड़का मंगल पर
हनुमत के जयकारे
संकटमोचन भाते
हनुमत की महिमा
जन-जन मिलकर गाते
“हमेशा आपकी याद आती है।”
माँ के बिना दुनिया की हर चीज कोरी है,
जीवन का पहला संगीत माँ की लोरी है!
माँ से बढ़कर कौन है,बच्चों का सुख-पुंज।
अपने आँचल में छुपा,रखती हृदय-निकुंज।।
माँ है तो संसार है,माँ ही सुख-आगार।
लाखों सहती कष्ट पर,वह ही गृह-आधार।।
माँ सम जग में कौन है,जीवन में सुखधाम।
सुख-दुख में आता सदा,है उनका ही नाम।।
माँ दुर्गा बन पालती,लेकर नव अवतार।
हर संकट को काटती,बन कर वह तलवार।।
माँ के चरणों में बसे,धरती पर ही स्वर्ग।
अतुलित ममता पर करो,श्रद्धा का उत्सर्ग।।
आँचल से छाया करे,ममता की पुचकार।
छोटे हों या हों बड़े,करती प्यार-दुलार।।
माँ की ममता को कभी,तुला मध्य मत तोल।
उसके शुभ आशीष का,कहीं नहीं है मोल।।
भूखे रहकर भी भरे,बच्चों का माँ पेट।
वही बड़े होकर करें,उसका उर- आखेट।।
रोटी हों यदि तीन ही,खाने वाले चार।
भूख नहीं कह मातु यह,बाँटे प्यार- दुलार।।
गीले बिस्तर पर सदा,जाती है माँ लेट।
लाल कभी भीगे नहीं,लेती अंक- समेट।।
स्वर्ग विराजित युग-चरण,देव नवाएँ माथ।
सब संभव हर काम हों,जब हो माँ का साथ।।
अमिय पान पय-धार है,तेज पुंज सुख-छाँव।
माँ की रक्षा के लिये,ठिठके कभी न पाँव।।
करो बहुत सत्कार तुम,हो उसके ही अंश।
खिलता आनन पुष्प-दल,माँ से चलता वंश।।
शूरवीर महाराणा प्रताप
हल्दीघाटी में दिखा,राणा का रण-रंग।
शूरवीर मेवाड़ का,डटा सैनिकों संग।।
चेतक था अति प्रिय उन्हें,बरछी ढाल कृपाण।
मातृभूमि की राह पर,न्योछावर थे प्राण।।
चुस्त चाल चेतक चले,भरता चपल उड़ान।
चंद्रलोक की सैर पर,जाता था यह यान।।
राणा देते थे नहीं,सपने में आराम।
अकबर थर्राता सदा,सुन कर उनका नाम।।
यही पढ़ा इतिहास में,अकबर रहा महान।
सारे अक्षर को मिटा,दो राणा को मान।।
रोटी खाई घास की,नहीं झुकाया शीश।
राणा की गाथा कहें,बड़े-बड़े वागीश।।
अपनी भावी पीढ़ियाँ,सच्चाई लें जान।
नित-नित उनके मुख बसे, गौरवशाली गान।।
मिली हमें यह प्रेरणा,और मिला यह ज्ञान।
राणा जैसा है नहीं,धरती पर इंसान।।
जय-जय-जय-जय घोष से,गूँज उठे नभथाल।
गर्वित टीका हम करें,केसर चंदन भाल।।
ऑपरेशन सिंदूर
( मुक्तक )
भारतीय सिंदूर को, हल्के में मत तोल।
रक्त वर्ण की आभ यह, जग में है अनमोल।
दुश्मन के छक्के छुड़ा, देती है यह शक्ति-
नारी के नारीत्व में, रही भवानी बोल।
इक रोज़ आप चाय पे घर मेरे आइए
इक रोज़ आप चाय पे घर मेरे आइए
कुछ ज़िन्दगी के दर्द को सुनिए सुनाइए
जलने लगा है दिल ये जुदाई की आग में
आके ज़रा- सा इश्क़ का मलहम लगाइए
गुल खिल उठा है आपके आने से पास में
नश्तर ज़फ़ा के आप कभी मत चुभाइए
समझें न आप मुझको पराई कभी सनम
खुद की ही ज़ीस्त का मुझे हिस्सा बनाइए
गर्दिश की आँच छू सके हमदम न आपको
रजनी से राज़ आप न कोई छुपाइए
श्रमिक दिवस” पर ‘रजनी’ के कतिपय दोहे
कितनी मेहनत कर रहा, अपना यह मजदूर।
परिजन उसके क्यों रहें, फिर इतने मजबूर?(७७६)
माँ की ममता कर रही, दिन भर यह आलाप।
सहता क्यों मजदूर बन, सुत उसका संताप।।(७७७)
श्रमिक यहाँ दिन भर रहे , क्यों इतना लाचार?
अन्न नहीं है पेट में, दो दिन से बीमार।।(७७८)
राह देखती है त्रिया, श्रमिक गया परदेश।
मिल जाता संदेश यदि, कटते कुछ तो क्लेश।।(७७९)
श्रमिकों की पूजा जहाँ, वहाँ विराजें ईश।
धरा स्वयं है स्वर्ग सम, हों हर्षित जगदीश।।(७८०)
श्रमिकों को भाता नहीं, घर-आँगन- संसार।
कठिन कर्म से वह सदा, देता पंथ बुहार।।(७८१)
भटक रहा है हर डगर, कहीं न मिलता ठाँव।
धूप- शीत वर्षा सहे, श्रमिक निहारे छाँव।।(७८२)
पेड़ पर फेंका सदा पत्थर गया
पेड़ पर फेंका सदा पत्थर गया
फल की दौलत झुक के वह देकर गया
ख़ुश्क होठों की बुझाई प्यास है
जैसे प्यासे में उतर सागर गया
लौट के होता नहीं आना यहाँ
ज़ीस्त में डर मौत का घर कर गया
काटता है उस शज़र को ही बशर
लू में जो दे छाँव की चादर गया
दिलजवां शामे अवध को देख कर
रंग रजनी की ग़ज़ल में भर गया
धरोहर
विश्व धरोहर के दिवस, लें हम यह संज्ञान।
अपने भारत की धरा, अपना देश महान।।
अपना देश महान, करें संरक्षित इसको।
अनुपम भवन अनेक, भूल बैठे हैं जिनको।।
रजनी करती गर्व, रखें हम इसे संँजोकर।
अद्भुत इनका शिल्प, पुरातन यही धरोहर।।
सत्संग पर कुण्डलिया छन्द
महिमा अति सत्संग की, कहते संत कबीर।
बिन गुरु के संभव नहीं, तुलसी कहें प्रवीर।।
तुलसी कहें प्रवीर, तमस् मति का मिट जाता।
सब संशय हों दूर, चक्र सहस्त्र खुल पाता।।
रजनी है नत शीश, बढ़ी जीवन में गरिमा।
करती अंतस् शुद्ध, भली संगत की महिमा।।
तुम मिले तो लगा आज मधुमास है
तुम मिले तो लगा आज मधुमास है
जग रही होंठ में प्यास ही प्यास है
अनछुए इश्क़ का ख़ास आभास है
बुझ रही है नहीं वस्ल की आस है
महजबीं सुनके ख़ुद को मैं इतरा गई
ये अदा ऐ सनम आ गई रास है
अब्र छाया फ़लक में मुहब्बत लिए
दिल धड़कने का कैसा ये एहसास है
आज़माओ मुझे तुम कभी गर सनम
खींच लूँगी क़दम मैं न, विश्वास है
जान तुमपे ही हमदम है क़ुर्बां मेरी
औ तुम्हारे भी दिल में मेरा वास है
चाँद-तारों की डोली सजाओ सभी
आज रजनी सनम के चली पास है
पावन तेरा धाम है ( दोहा छन्द )
पावन तेरा धाम है, पुरुषोत्तम है नाम।
हो जग के आदर्श तुम, हृदय विराजो राम।।१।।
तुम सम जग में कौन है, दुखभंजन हे राम।
जगवंदित स्वीकार लो, मम करबद्ध प्रणाम।।२।।
दुखहर्ता हे राम तुम, करना भव से पार।
सरयू का तट जब मिले, तब होगा उद्धार।।३।।
लगन लगी है राम की, राम-राम नित राम।
‘रजनी’ मनका फेरती, राम तुम्हारा नाम।।४।।
बैठीं उपवन में सिया, हृदय बसे श्री राम।
तिनके को ही देख कर, पग ले रावण थाम।।५।।
रावण रावण ही रहा, बन न सका श्री राम।
एक मुक्ति की चाह में, लिया बैर को थाम।।६।।
गृह-भेदी भी क्या करे, बसा हृदय में राम।
लगन लगी थी राम में, चला छोड़ कर धाम।।७।।
पछताया था अंत में, बच जाते कुलदीप।
दंभ छोड़ कर राम के, होता अगर समीप।।८।।
काम राम के आ सके, जीवन है वह धन्य।
सुरगण मुनिगण पूज्य हैं, रखना प्रीति अनन्य।।९।।
पाहन हो यदि यह हृदय, तरल करें रघुनाथ।
जयकारा प्रभु राम का, देंगे फिर वह साथ।।१०।।
धड़का था दिल
धड़का था दिल ये ज़ोर से क़ाबू हुआ न था
आए वो जब क़रीब तो कुछ भी कहा न था
मैं ज़िन्दगी गुज़ार ही लूँगी पनाह में
आगोश में सनम के मुझे कुछ गिला न था
क्यों तुम बढ़ा रहे हो मुहब्बत के सिलसिले
ख़त में तुम्हारा नाम तो मैंने लिखा न था
यूँ इश्क़ की गली में कई मोड़ हैं मिले
रस्ता तुम्हारे दिल का मुझे पर मिला न था
रजनी जो कह रही है ग़ज़ल आज बज़्म में
ऐसा कलाम आज से पहले सुना न था
चौपाई छन्द
रघुनंदन के चरण पखारूँ।
हर श्वासों में उन्हें पुकारूँ।।
मातु-पिता सुत भ्रात हमारे।
सखा-बंधु हों तात सुखारे।।
दोहे
पावन तेरा धाम है, पुरुषोत्तम है नाम।
हो जग के आदर्श तुम, हृदय विराजो राम।।
तुम सम जग में कौन है, दुखभंजन हे राम।
जगवंदित स्वीकार लो, मम करबद्ध प्रणाम।।
दुखहर्ता हे राम तुम, करना भव से पार।
सरयू का तट जब मिले, तब होगा उद्धार।।
सुखद राम का नाम है, रहूँ शरण श्रीराम।
दया करो अब तो प्रभो, रटती आठों याम।।
लगन लगी है राम की, राम राम अरु राम।
रजनी मनका फेरती, राम तुम्हारा नाम।।
बैठीं उपवन में सिया, हृदय बसे श्री राम।
तिनके को ही देख कर, पग ले रावण थाम।।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!
मातु सिद्धिदात्री तुम्हें, शिरस: कोटि प्रणाम।
चरणों में जगदंबिका, मिले शरण अविराम।।
कष्टों की बरसात में, भीग रही हर बार।
माँ सिर पर छाया करो, आऊँ जब भी द्वार।।
दया करें दुर्गा-सती , सब जन हों खुशहाल।
हाथ पसारे हैं खड़े, माता तेरे लाल।।
हे महिषासुरमर्दिनी ( मुक्तक )
हे महिषासुरमर्दिनी, करूँ तुम्हारा ध्यान।
वर मुद्रा कात्यायिनी, चढ़े शहद अरु पान।
उमा हेमवंती यही, हस्त कमल-तलवार-
अधिष्ठात्री ब्रज की रहीं, अंब अभय वरदान।
कूष्माण्डा अवतार ( दोहे )
मम माता ममतामयी, कूष्माण्डा अवतार।
आदिशक्ति से सृष्टि का, अण्ड रूप साकार।।१।।
अण्डरूप में सृष्टि का, करती मातु विकास।
माँ कूष्माण्डा रूप से , व्याप्त जगत में श्वास।।२।।
रणचण्डी का रूप हैं, धर दुर्गा अवतार।
दुष्ट- दलन कर मातु ने,भरी विजय हुंकार।।।३।।
“आई माँ”
( कुण्डलिया छन्द )
१
आई माँ नवरात्रि में, बाँधो बन्दनवार।
घन- घन- घन घण्टा बजे, वन्दन बारंबार।।
वन्दन बारंबार, मगन हो झूमे टोली।
देती है आशीष, भगत सब भर लो झोली।।
सजा हुआ दरबार, गगन तक सुषमा छाई।
रजनी जोड़े हाथ, जगत- जननी माँ आई।।
२
निज सुत के हित मातु ले, विविध रूप अवतार।
नेत्र तीसरा खोलकर, रक्षति पालनहार।।
रक्षति पालनहार, नहीं वह कभी कुमाता।
दानव दल हित काल, सदा यह जग की दाता।।
रजनी हो या धूप, गरजते मेघ कदाचित।
शीतल मंद बयार, सदा माँ निज सुत के हित।।
“सूर्य ग्रहण”
गर्व कभी करना नहीं,जीवन है सौगात।
ग्रहण सूर्य को भी लगे,तेरी क्या औकात।।
सागर मंथन के समय,छिड़ी हुई थी जंग।
कौन गरल का पात्र है,कौन अमिय के संग।
रूप मोहिनी का लिया,नारायण ने धार।
राहु-केतु के मन उठा,अद्भुत एक विचार।
देव पंक्ति में जा छुपे,खाई हरि से मात।
ग्रहण सूर्य को भी लगे,तेरी क्या औकात।।
भ्रमण गगन में कर रहा,थी निष्कंटक राह।
चंद्र छिपा था ओट में,रही द्वेष की चाह।
अचरज की यह बात है,यह खागोलिक फेर।
बीच धरा के आ गया,लिया सूर्य को घेर।
अवसर पाकर कर दिया,सूरज पर प्रतिघात।
ग्रहण सूर्य को भी लगे,तेरी क्या औकात।।
शिक्षा सब लेते चलो,मिले जहाँ से मित्र।
श्रेष्ठ सदा ही हम बने,खींचें सुंदर चित्र।
बने रहें गुणवान हम,पूजित हो हर कृत्य।
कब तक रजनी ही रहे,निकले सूरज नित्य।
नभमंडल में छा गया,मधुमय नवल प्रभात।
ग्रहण सूर्य को भी लगे,तेरी क्या औकात।।
गर्व कभी करना नहीं,जीवन है सौगात।
ग्रहण सूर्य को भी लगे,तेरी क्या औकात।।
होली की फुलझड़ी
होली की अब तक कभी, नहीं मिली सौगात।
छोड़ो भी साजन हटो, करते झूठी बात।।
जोगीरा सा रा रा रा रा
होलीरा ता रा रा रा रा
गुझिओं में तर माल है, लेकर हाथ गुलाल।
रजनी जोगीरा सदा, करता बहुत कमाल।।
जोगीरा सा रा रा रा रा
जोगीरा ता रा रा रा रा
जोगीरा मस्ती भरा, करें सभी स्वीकार।
हर्षित हो रजनी कहे, शुभ होली-त्योहार।।
साजन ने छोड़ा नहीं, किया बहुत ही तंग।
देखा पहली बार यूँ, मुझे, लगाते रंग।।
अंग-अंग पर लिख दिया, साजन ने निज नाम।
होली तू भी खूब है, बन जाते हर काम।।
लाल रंग फीका लगे, फीका रंग गुलाल।
गोरी तेरे गाल पर, साजन करें कमाल।।
रजनी खेली रात भर, होली साजन- संग।
भीग गई है चूनरी, भीग गया हर अंग।।
क्यों छुपते हो तुम पिया, जब भी दूँ आवाज।
रंग लगाकर मैं करूँ, होली का आगाज।।
आओ मेरे साजना, रँग दूँ तुमको आज।
भीगें दोनों प्रेम में, छोड़ी मैंने लाज।।
क्या तुम भी करते मुझे, सबसे ज्यादा प्यार।
चिह्न प्रीति का दो कभी, व्यक्त करो उद्गार।।
अधर मौन मुखरित हुआ, सुनता अखिल समाज।
मस्ती होली की चढ़ी, रजनी खोले राज।।
आओगे कब साजना, लेकर रंग गुलाल?
बाँहों में भर कर मुझे, करो लाल ये गाल!
अंग-अंग से फूटती, प्रियतम तेरी प्रीति।
रंग तुम्हारे रँग गई, भूली जग की रीति।।
जोगन जोगी के लिए, जैसे मीरा-श्याम।
छोड़ो जप तप साधना, अब लो मुझको थाम।।
पावन अपना प्रेम है, अनदेखा दीदार।
रखती प्रतिपल पास में, तोड़ी हर दीवार।।
नेह भरी है चाशनी, गुझियों में है प्यार।
होली की शुभकामना, करें आप स्वीकार।।
होली की है शुभ घड़ी, हो खुशियों का राज।
बहुत बधाई आपको, रजनी देती आज।।
महिला सशक्तिकरण
महिलाओं के प्रति रहे, हिंसक यदि परिवार।
सदा अँधेरों से घिरा, रहे पंथ दुश्वार।।(८२७)
तेजाबी हमला करे, उनको दो दुत्कार।
हर बाधाओं को मिटा, कदम बढ़ाना नार।।(८२८)
अबला बन कर तुम कभी, सहो न अत्याचार।
दो हजार तेरह उन्हें, मिला यही उपहार।।(८२९)
महिलाएँ सब हों सफल, स्थापित नव उन्वेष।
पथ सशक्ति का हो सबल, उन्नति रहे अशेष।।(८३०)
रोजगार उद्भूत हो, चाह रही सरकार।
पराधीन या पीड़िता, रहें न कोई नार।।(८३१)
धन से हों मजबूत सब, शिक्षा से संपन्न।
होता है उत्थान जब, नारी रहे प्रसन्न।।(८३२)
परित्यक्ता जो नारियाँ, उनके हित हो न्याय।
उन्नत पथगामी बनें, रहें न वे असहाय।।(८३३)
बेटी ( भ्रमर विलासिता छ्न्द )
१
बेटी नोची कुटिल दनुज ने।
काटी जिह्वा तमचर भुज ने।।
हड्डी तोड़ी फिर निशिचर ने।
ली प्राणों की बलि प्रतिकर ने।।
२
नन्हीं शाखें तरुवर मसले।
माली ने ही किसलय कुचले।।
रोए मैना कलरव रुकता।
साँसें मद्धम है दम घुटता।।
डमरू बजाइए ( मनहरण घनाक्षरी )
हर-हर बम-बम,
कठिनाई होती कम,
डम-डम डम-डम
डमरू बजाइए।
मन मेरा है शिवाला,
पियें शिव विष-प्याला।
तन में है मृगछाला,
दरश दिखाइए।
शीश में है गंग-वारी,
किए नन्दी की सवारी,
कर में त्रिशूल धारी,
सबको बचाइए।
सजे भूत-प्रेत और,
सर्प कण्ठ चंद्र मौर,
मेरे मन में हो ठौर,
हिय में बसाइए।।
“पीछा करती यादें”

निशि-वासर ले झाँझ-मँजीरा, पीछा करती यादें।
वासंतिक सुषमा रसभीनी, उर में भरती यादें।
बौर आम्र की मृदु सुधियों का, ले आई संदेशा।
करतल पर धर चिबुक निहारूँ, तव पथ पिया हमेशा।
खेतों में सरसों गदराई, सतत् निखरती यादें।
निशि-वासर ले झाँझ-मँजीरा, पीछा करती यादें।
ताखे पर जब दिया बारती, दे आँचल की छाया।
अवगुण्ठन में मधुमासों ने, शरश्रासन लहराया।
मदिर-मदिर आभासों को, प्रतिक्षण धरती यादें।
निशि-वासर ले झाँझ-मँजीरा, पीछा करती यादें।
मटर-चना-गन्ने की बाली, मलयाचल-सी महकी।
मादक ऋतुपति की बाँहों में, बेला-चंपा बहकी।
शहतूती कलियाँ शरमाईं, “रजनी” वरती यादें।
निशि-वासर ले झाँझ-मँजीरा, पीछा करती यादें।
वासंतिक सुषमा रसभीनी, उर में भरती यादें।
निशि-वासर ले झाँझ-मँजीरा, पीछा करती यादें।
वासन्ती बलिदान
जिएँ कफन को बाँध कर, अपने वीर जवान।
देशभक्ति के नाम पर, अपने वीर जवान।
मना रहे हम सब यहाँ, वैलेंटाइन पर्व।
खेल रहे खूनी समर, अपने वीर जवान।
प्यारी लगती प्रेमिका, प्यारा है दिलदार।
चले शूल की हर डगर, अपने वीर जवान।
छोड़ दिया परिवार को, छोड़ा अपना गाँव।
जरा नहीं ठिठके मगर, अपने वीर जवान।
लगी हुई थी देश में, पुलवामा की आग।
झेल रहे थे वो गदर, अपने वीर जवान।
पीछे से हमला किया, पाक हुआ नापाक।
ढाते फिर उस पर कहर, अपने वीर जवान।
बारह दिन के बाद ही, आतंकी थे ढेर।
जाते खुशियों से लहर, अपने वीर जवान।।
घर में बैठे थे छुपे, आतंकी गद्दार।
लेते फिर उनकी खबर, अपने वीर जवान।।
गोलाबारी में किया, वासन्ती उत्सर्ग।
चले शूल की हर डगर, अपने वीर जवान।।
कोरोना की मार से, सकल विश्व था त्रस्त।
पहरा देते हर पहर, अपने वीर जवान।।
रजनी मगन, गुनगुनाती रही
प्रिय तुम्हें देखकर, मैं लजाती रही।
श्वास भीतर तलक, महमहाती रही।
एक ही आस थी, एक ही प्यास थी।
दो घड़ी जब बहुत, आज मैं पास थी।
जिंदगी मौत से, जीत जाती रही।
प्रिय तुम्हें देखकर, मैं लजाती रही।
हाथ में हाथ थे, जब सजन साथ थे।
दो नयन मूँद कर, माथ पर माथ थे।
मुक्तिका अश्रु की, चमचमाती रही।
प्रिय तुम्हें देखकर, मैं लजाती रही।
जब ढली साँझ यह, अनकही बात कह।
छुप गई गोद में, नील आकाश सह।
गीत रजनी मगन, गुनगुनाती रही।
प्रिय तुम्हें देखकर, मैं लजाती रही।।
नव पुष्पित
नव पुष्पित- नव पल्लव से है, धरती पर श्रृंगार।।
ऋतुओं का है बसंत राजा, शारद का अवतार।।
१
शीत लगी है शीतलता को, ठंडक का अवसान।
प्रकृति बनी है नवल वधूटी, पीत हुआ परिधान।।
पीली- पीली सरसों फूली, करने को सत्कार।
ऋतुओं का है बसंत राजा, शारद का अवतार।।
नव पुष्पित….
२
नव उमंग है नव तरंग है, आया नवल विहान।
अंबर झूमे धरती गाए, करता नृत्य किसान।।
मलय पवन है मधुमय मृदुमय, कुसुमित उर उद्गार।
ऋतुओं का है बसंत राजा, शारद का अवतार।।
नव पुष्पित….
३
पग- प्रक्षालन सरिता करती, पक्षी कलरव- गान।
आम्र वृक्ष पर बौर रसीले, यौवन का आह्वान।।
कंत तुम्हारा आनन देखूँ, छाए सुखद निखार।
ऋतुओं का है बसंत राजा, शारद का अवतार।।
नव पुष्पित….
नये साज़ छोड़ो, पुराने सुनाओ
नये साज़ छोड़ो, पुराने सुनाओ
रिवायत- नफ़ासत ग़ज़ल में निभाओ
नज़र से सिलेंगे सभी रुज तुम्हारे
अगर ज़ख़्म ख़ुद के हमें तुम दिखाओ
ऐ बच्चो न बनना कुँए के ही मेंढक
परिंदों की परवाज़-सा जोश लाओ
बुलन्दी पे होंगे तुम्हारे सितारे
अगर हौसला दिल में अपने जगाओ
हुए साल रजनी के सोलह हैं क़ामिल
मुहब्बत के शाने ज़रा तुम बढ़ाओ
रिवायत – परंपरा
नफ़ासत – सुंदर
रुज – ज़ख़्म
परिन्दा – पक्षी
परवाज़ – उड़ान
क़ामिल – संपूर्ण
शाने – कंधे
क़दम को चूमना
हुई गर ज़िन्दगी बोझिल हो खस्ताहाल जाता है
क़दम को चूमना माँ के मुसीबत टाल जाता है
भरे हों अश्क़ आँखों में गुज़र होती हो मुश्किल से
पिता का हाथ हो सिर पे निकल जंजाल जाता है
त्रिवेणी में चलो सारे नहाओ कुम्भ में जाकर
समझ लो तीन पीढ़ी तक कटा हर काल जाता है
वतन में अम्न हो क़ायम यही जज़्बा लिए दिल में
खुला दर छोड़ के घर से जिगर का लाल जाता है
कसक रजनी की बाक़ी अब नहीं कोई निगाहों में
सनम का नाम चुपके से मुहब्बत डाल जाता है
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
१
नेता जी ने दे दिया, नारा यह जयहिन्द!
कहने में प्यारा लगे, खोलो मुखारविन्द।।
खोलो मुखारविन्द, बढ़ाता मान हमारा।
डरे सभी अंग्रेज, हमें लगता अति न्यारा।।
है भारत की शान, सुभाष बने नचिकेता।
आजादी हित खून, माँगते थे बस नेता।।
२
अपने सुभाष चन्द्र की, पुण्य जयंती आज।
अंग्रेजों का कर दिया, खत्म यहाँ से राज।।
खत्म यहाँ से राज, जगी थी अलख निराली।
देश-भक्ति की गूँज, कि जैसे हो दीवाली।।
सभी दिलों में आस, सभी ने देखे सपने।
फौज हिन्द आजाद, बनाए नेता अपने।।
नाम तेरा बता गयीं आँखें
नाम तेरा बता गयीं आँखें
शर्म से फिर लजा गयीं आँखें
दिल की धड़कन सुना गयीं आँखें
राज़ सारे बता गयीं आँखें
दुश्मनी को मिटा गयीं आँखें
सबको अपना बना गयीं आँखें
पा मज़ामीन जो गयीं आँखें
ख़त सभी से छुपा गयीं आँखें
तुझपे दिलबर ये जान क़ुर्बां है
तेरी रजनी को भा गयीं आँखें
प्रथम पूज्य गणवेश
सकट चौथ का दिन विमल, प्रथम पूज्य गणवेश।
कष्टहरण – मंगलकरण, सुत हिमसुता- महेश।।
गौरासुत तुम रुद्रप्रिय, बुद्धिप्रियं हेरंब।
संतति और सुहाग पर, कृपा करो अविलंब।।
पर्व सकट की चौथ का, देता खुशी अपार।
तिल गुड़ भोग लगाइए, गणपति पूजन वार।।
कुण्डलिया छन्द
अर्पण करते देश-हित, सैनिक अपने प्राण।
रहें सुरक्षित हम सभी, देते हमको त्राण।।
देते हमको त्राण, पुकारें भारत माता।
त्याग प्रिया की बाँह, वतन से जोड़ा नाता।
जगवन्दित बलिदान, अमर है अटल समर्पण।
सैनिक अपने प्राण, देश हित करते अर्पण।।
मकर संक्रांति महापर्व
दोहा छन्द
मकर राशि में कर रहे, दिनकर आज प्रवेश।
भोर सुहानी आ गई, लेकर यह संदेश।।
पर्व मकर संक्रांति का, खिचड़ी का है दान।
उड़ें पतंगें व्योम में, देतीं खुशी महान।।
पर्व मकर संक्रांति का, देता खुशी अपार।
तिल गुड़ चिक्की की महक, उड़ें पतंग हजार।।
कुण्डलिया छन्द
१
आओ मिलकर हम सभी, चलो लड़ाएँ पेंच।
पर्व मकर संक्रांति का, रखना डोरी खेंच।।
रखना डोरी खेंच, गजक तिल चिट्टी खाएँ।
झूमें नाचें आज, खुशी हम सभी मनाएँ।।
सजे हुए घर- द्वार, सरित गंगा में जाओ।
रजनी की यह चाह, लगाकर डुबकी आओ।।
२
नारी- नर सब सज गए, बच्चे गाएँ गान।
खिचड़ी का तो आज हम, सभी करेंगे दान।।
सभी करेंगे दान, बधाई लेकर आते।
देते हैं उपहार, खुशी से सबके नाते।।
खुला हुआ आकाश, उड़े कनकौआ न्यारी।
रजनी की यह चाह, सुखी हों सब नर- नारी।।
जिन्हें ख़ून देकर भी पाले हुए हैं
( ग़ज़ल )
जिन्हें ख़ून देकर भी पाले हुए हैं
उन्हीं ने तो छीने निवाले हुए हैं
सुखी हैं जहाँ माँ- पिता जी हमारे
वहीं तो घरों में उजाले हुए हैं
वतन से बड़ा है न महबूब कोई
दिलों में यही बात ढाले हुए हैं
न बच्चे हमारे जिएँ मुफ़लिसी में
कई दर्द हँस- हँस के टाले हुए हैं
चमन में नहीं तितलियाँ खुल के उड़तीं
गुलाबों के काँटों से छाले हुए हैं
किसी के छलावे में आके कृषक भी
बिना बात पगड़ी उछाले हुए हैं
ये “रजनी” सदा से इसी मौज़ में है
गले में पिया बाँह डाले हुए हैं
तपिश याद की तेरी
मन-मंदिर में गरल घोलती, तपिश याद की तेरी।
तन्हाई में बहुत बोलती, पीर राद की तेरी।
कुहू-कुहू काली कोयल की, कर्कश कुंजित करती।
कुंचित केशों की कलिका भी, केवल कँवल कुतरती।
काम-कामना कलन कोलती, कलम बाद की तेरी।
मन-मंदिर में गरल घोलती, तपिश याद की तेरी।
संग बिताये थे जो भी पल, महक रहे श्वासों में।
जो सिंदूरी अभिलाषा थी, सिंचित आभासों में।
रंगमहल में निडर डोलती, लहर नाद की तेरी।
मन-मंदिर में गरल घोलती, तपिश याद की तेरी।
कंगन कर, कुंडल कानों में, किंचित नहीं सुहाता।
माणिक माला छाले बनकर, उर में आग लगाता।
कमर किंकिणी नित्य तोलती, पर्त माद की तेरी।
मन-मंदिर में गरल घोलती, तपिश याद की तेरी।
ऊँ जय गणेश! : श्रृंगार छंद
१
बनाया मोदक का पकवान।
जिमाऊँ तुमको हे भगवान।।
कृपा कर मुझ पर दीनानाथ।
शीश पर रखना अपना हाथ।।
२
दिया पितु- माता को अति मान।
स्वर्ग सम पद- रज है यह जान।।
गजानन देवों के हैं देव।
प्रथम अब पूजित वह स्वयमेव।।
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी दिवस पर मुक्तक
१
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
हमारे देश की गौरव हमारी जान है हिन्दी।
जिएँ जिसके लिए ‘रजनी’ वही अभिमान है हिन्दी।
दिया है जन्म संस्कृत ने बड़े लाड़ों से है पाला-
हमारे माथ की बिन्दी सुरीला गान है हिन्दी।
२
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
यहीं तुलसी यहीं मीरा यहीं रसखान बसते हैं।
इसी में तो कबीरा के हमेशा प्रान बसते हैं।
बिहारी ने रचे दोहे- मिलेंगे सूर के पद भी
लगे है मातु सम हिन्दी यहीं भगवान बसते हैं।
३
१३/११
हिन्दी अपने देश का, सबसे मीठा गान।
मिलती इससे है सदा, एक नई पहचान।
माँ की लोरी के सदृश, हिन्दी करे दुलार-
सुरसरि सम पूजा करे, अपना हिन्दुस्तान।
करें कुंभ में स्नान
हृदय कुंभ पावन रहे, करें कुंभ में स्नान।
कुंभ नहाने से मिले, अमर कुंभ में ध्यान।।
फलदाई है कुंभ यह, यथा कल्पतरु जान।
पावन मन से आ सभी, करते संगम स्नान।।
कल्पवास में संतगण, करते जप-तप ध्यान।
ईश्वर से रख रति सघन, करें नाम गुणगान।।
देखते हैं ( ग़ज़ल )
इधर देखते हैं उधर देखते हैं
सनम को बचाके नज़र, देखते हैं
नहीं हम कहीं भी गुज़र देखते हैं
सनम की गली में बसर देखते हैं
शिक़ायत है तुमसे तुम्हीं से मुहब्बत
तुम्हारे ही दिल की डगर देखते हैं
सिया-राम का था स्वयंवर जहाँ पे
चलो जाके मिथिला नगर देखते हैं
ऐ यारो बुलंदी पे है अज़्म अपना
मगर गुल से गुलशन में डर देखते हैं
करें हम ग़रीबों को क़ामिल भी कैसे
जो ख़ुद को ही ज़ेर-ओ-ज़बर देखते हैं
कभी ज़लज़लों से न रजनी से डरते
अमा में भी अपनी सहर देखते हैं
अज़्म- हौसला
क़ामिल- संपूर्ण
ज़ेर-ओ-ज़बर- अस्त-व्यस्त
अमा- अमावस
सहर- सवेरा
नव वर्ष में : गीत
दे रही शुभकामना सब हों सुखी नव वर्ष में।
दीप आशा का जलाएँ चौमुखी नव वर्ष में।।
लग गया पच्चीसवाँ जबसे, चढ़ा यौवन नवल।
ले रजत पक्षी धरा पर रश्मियाँ उतरीं धवल।
छिप गया रवि ठंड में ले गोमुखी नववर्ष में।
दीन-दुखियों की निशा में भोर की छाए किरण।
बाल-बच्चे हों न भूखे नित्य पाएँ अन्नकण।
हर हृदय में खिल सके सूरजमुखी नववर्ष में।
मुस्कुराए हर कली, नर्तन करे अलि बावरा।
देव सब आशीष की वर्षा करें, दें आसरा।
याचना माँ! हो नहीं कोई दुखी नव वर्ष में।।
स्वागत नूतन वर्ष का
स्वागत नूतन वर्ष का, भले विदेशी चाल।
वसुधा ही परिवार है, रहें सभी खुशहाल।।
बदल गया है साल फिर, मत बदलो तुम मीत।
संग तुम्हारे ही सजे , जीवन का संगीत।।
देते रहना तुम सदा, साथ हमें हर साल।
मिले तुम्हारे संग में, खुशी मुझे हर हाल।।
नए साल में कर रही, प्रियतम यह मनुहार।
बाँह तुम्हारी थाम कर, करूँ प्रेम विस्तार।।
स्वागता छन्द
रोग- दोष हरते बजरंगी।
बुद्धि ज्ञान बल के वह संगी।।
भूत-प्रेत सब दूर भगाते।
राम-नाम हनुमान सुनाते।।
“चैत्र सुदी का आगम सच में नव संवत कहलाएगा”
ज़ख़्म जिगर ने खाए इतने फ़िर भी ये मुस्काएगा
यारों से यारी के बाद मुक़रना किसको भाएगा
सुंदर धाम अयोध्या में ये मन पंछी लहराएगा
नौकर-चाकर हम राघव के दिल अपना यह गाएगा
एक मुक़द्दर ही है साथी और किसी से क्या उम्मीद
ऊपर वाला साथ रहे तो सच सपना हो जाएगा
खूब मानओ वर्ष नया पर याद सदा रखना ये बात
चैत्र सुदी का आगम सच में नव संवत कहलाएगा
राज़ छुपाकर रक्खे कितने रजनी ने दिल में गहरे
पाक़ ज़मीं पर चलके ख़ुद का दामन कौन बचाएगा
मौक्तिक दाम छंद
हुए दसवें गुरु सिंह महान।
किए निज बालक ही बलिदान।।
सदा रखते पहले वह देश।
नहीं झिझके गुरु थे लवलेश।।
पिता
दर- ओ- दीवार भीग जाते हैं।
जब “पिता” मुझको याद आते हैं।
है सुता “रामचंद्र” की “रजनी”
गर्व से हम यही बताते हैं।
क़त्आत
1
122 122 122 122
हुई थी जो पहली मुलाक़ात लिखना
नज़र के नज़र से इशारात लिखना
जिधर देखती हूँ नज़ारे तुम्हारे
ख़यालों में तुम मेरे जज़्बात लिखना।
2
2122 1212 22
हमसफ़र ज़िंदगी मेरी हो तुम।
हमनवा आशिक़ी मेरी हो तुम।
ज़ीस्त रजनी की हमक़दम तुम हो-
ऐ सनम बंदगी मेरी हो तुम।
3
2122 2122 2122 212
बेवफ़ा-सी ज़ींस्त में हम क्यों भला दाख़िल हुए।
इम्तहाँ में बावफ़ा इस मौत के शामिल हुए।
इस जहाँ में रो रहे थे जो बशर पैदायशी-
हँस के रुख़सत हों अगर वो खुल्द के काबिल हुए।
बशर- मनुष्य
खुल्द- स्वर्ग
दो दोहे
वीर शहादत को नमन, ले केसरिया माल।
चंदन कर रज देश की, तिलक लगाया भाल।।१।।
पुत्र अमर गोविंद के, उनके त्याग महान।
देश-प्रेम पर कर दिए, अपने सिर कुर्बान।।२।।
तुलसी पूजन दिवस
सेंटा को क्यों पूजते, यह संतों का देश।
तुलसी की पूजा करें, काटें यम का क्लेश।।
तुलसी का पूजन करें, पावन है यह काज।
देवी करतीं हैं कृपा, होता स्वस्थ समाज।।
पुण्य प्राप्ति का यह दिवस, तुलसी पूजन साथ।
सुख की वर्षा हो सदा, हे लक्ष्मी के नाथ।।
अटल बिहारी वाजपेयी
अद्भुत प्रवक्ता, श्रेष्ठ, निष्पक्ष, निष्कलंक, निष्ठावान, अनुकरणीय राजनीतिज्ञ, वंदनीय, उत्कृष्ट सरल हृदय कविवर भारत रत्न माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती के उपलक्ष्य में शतश: सविनय नमन- वंदन सहित सादर प्रस्तुत हैं हमारे तीन दोहे-
अटल जयंती है अटल,अटल बिहारी नाम।
राजनीति सह कवि अटल,अटल किए सब काम।।
अटल इरादे देखकर,शत्रु रहे भयभीत।
राजनीति के रवि अटल,कविवर हृदय प्रणीत।।
अटल पुरोधा विश्व के,अटल गूँजता नाम।
गौरवगाथा है अटल,करते अटल प्रणाम।।
गणपति-वन्दना
( गणपति-वन्दना स्वरचित दोहों के माध्यम से स्वनिर्मित पेंटिंग के साथ )

दोहा लिखने मैं चली, गणपति देना साथ।
रहें भवानी सामने, लिए कमल दल हाथ।।
लंबोदर हे गजवदन, एकदंत भुज चार।
नमस्तेतु मंगलकरण, विघ्नहरण दातार।।
प्रथम पूज्य के रूप में, हरते सारे क्लेश।
मातु-पिता सबसे बड़े, गणपति का संदेश।।
विमल बुद्धि वरदान से, करते हो कल्यान।
मोदक प्रिय हे गजवदन, हो ज्ञानी मतिमान।।
अति प्रिय दूर्वा भोग है, मोदक का है चाव।
गणपति रखते हैं सदा, निज भक्तों का भाव।।
विनायकौ हे गजवदन, गौरी पुत्र गणेश।
सकल कामना पूर्ण कर, हरो सकल मम क्लेश।।
सुखदाता गणपति सदन, विघ्न विनाशक रूप।
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड प्रिय, पुस्तक पाणि अनूप।।
रूप विनायक-मति विमल, प्रथम पूज्य गणवेश।
कष्टहरण – मंगलकरण, सुत हिमसुता- महेश।।
गौरासुत तुम रुद्रप्रिय, बुद्धिप्रियं हेरंब।
शुभगुणकानन सिद्धिप्रिय, कृपा करो अविलंब।।
मुहब्बत की गली सँकरी नहीं है
मुहब्बत की गली सँकरी नहीं है
मगर सबको यहाँ मिलती नहीं है
मिलेगी कौन-सी नदिया जहाँ में
समुंदर तक कभी पहुँची नहीं है
पकड़ लेते हो मेरा हाथ जब तुम
ज़ुबाँ मेरी सनम हिलती नहीं है
मुहब्बत का तराना तुम सुनाओ
फ़िज़ा अब भी यहाँ बदली नहीं है
सनम आग़ोश में गुज़रेगी रजनी
ख़ुमारी इश्क़ की उतरी नहीं है
नया कुछ भी नहीं
ज़िंदगी-सा इस जहाँ में बेवफ़ा कुछ भी नहीं
मौत तो है बावफ़ा जिससे गिला कुछ भी नहीं
मिल गए क़िस्मत से हम-तुम दो बदन इक जान यों
चाहिए हमको सनम इसके सिवा कुछ भी नहीं
जिस क़लम से खींच दी तस्वीर जब महबूब की
बाद में फ़िर उस सियाही से लिखा कुछ भी नहीं
दरमियाँ अपने न होंगे फ़ासले जाने वफ़ा
इससे बढ़कर ज़िंदगी में राब्ता कुछ भी नहीं
नाम रजनी और पूनम चंद्रिका जानें सभी
अब सुख़नवर के लिए इसमें नया कुछ भी नहीं
नर्म हवा का झोंका ( गीत )
नर्म हवा का झोंका आकर, तुमको जो सहलाए।
तभी समझ जाना हे प्रियतम, मन मेरा छू जाए।
लगे महकने मुझमें तुम जब, सुरभि पुष्प की आती।
वर्षा की हर बूँद माथ पर, चुंबन देकर जाती।
गीत विरह के छोड़ हृदय यह, फाल्गुन राग सुनाए।
नर्म हवा का झोंका…….1
गए मजूरी पर तुम साजन, जाने कब आओगे?
निर्झर बहते तुम बिन नयना, तभी समझ पाओगे।
जब मेरी सुधियों का बादल, तुम पर जल बरसाए।
नर्म हवा का झोंका…….2
अनछूते अहसास दुबककर, दिल में रह जाते हैं।
मृगनयनी के अश्रु लुढ़ककर, उर तक हो आते हैं।
सुर चकोर के तप्त कर रहे, विधु रजनी में आए।
नर्म हवा का झोंका……3
कभी दिल टूट जाता है

किसी के तोड़ने से क्या कभी दिल टूट जाता है
ख़ुदी से मुंतसिर होके जहां ये छूट जाता है
मुहब्बत का घड़ा यारो जो सिर पर फूट जाता है
ये वो शय है जिसे आशिक़ ही इक दिन लूट जाता है
महालक्ष्मी छंद
विधान- यह एक वर्णिक छंद है। इसमें नौ वर्ण होते हैं।चार चरण। दो-दो चरण समतुकान्त!
रगण रगण रगण
212 212 212
1
शारदे मातु हे ज्ञानदा!
हो कृपा आपकी सर्वदा।।
चंद्रिका साधती साधना।
आप ही तूलिका थामना।।
2
साँझ की छा रही लालिमा।
व्योम की देख लो भंगिमा।।
चंद्र की है निशा साधिका।
प्रेम में है पगी चंद्रिका।।
महालक्ष्मी छंद
3
रागिनी छेड़ती है मही।
व्योम की प्रार्थना ये रही।।
माँग हो चंद्रिका की भरी।
चूड़ियाँ चंद्र लाए हरी।।
बालकनी में धूप!

रजनीगंधा-सम लगे, बालकनी में धूप।
रजनीहासा-सा खिला, मखमल रूप-अनूप।।
मखमल रूप-अनूप, सरककर प्रियतम आए।
संग पिएँ हम चाय, नहीं मुझ बिन रह पाए।।
रजनी हुई प्रसन्न, सटाकर बैठे कंधा।
बहुत सताती शीत, उन्हें सुन रजनीगंधा!!
तीरगी का तराना न गाओ कभी
तीरगी का तराना न गाओ कभी
शम्अ दिल से अज़ी तुम जलाओ कभी
तुम हुए हम पे क़ुर्बान ऐ जान-ए-जाँ
यार झूठी क़सम तो न खाओ कभी
जान देता है मेरी ग़ज़ल पे जहाँ
एक-दो शेर तुम भी सुनाओ कभी
अपना हक़ ही जताने की ख़ातिर सुनो
हमसे मिलने सरे आम आओ कभी
शर्म से लाल होती है रजनी बहुत
तुम हया का ये घूँघट उठाओ कभी
आस का एक दीपक जलाओ कभी
तीरगी का तराना न गाओ कभी
आस का एक दीपक जलाओ कभी
हम बने हैं तुम्हारे लिए ही सनम
यार झूठी क़सम तो न खाओ कभी
जान देता है मेरी ग़ज़ल पे जहाँ
एक-दो शेर तुम भी सुनाओ कभी
अपना हक़ ही जताने की ख़ातिर सुनो
हमसे मिलने खुले आम आओ कभी
शर्म से लाल होती है रजनी बहुत
रुख़ से आकर न घूँघट उठाओ कभी
हनुमत-भक्ति पर हमारे ७ दोहे
१
वीरों में अति वीर हैं,महावीर हनुमान।
भक्तशिरोमणि रामप्रिय,करूँ तुम्हारा ध्यान।।
२
जामवंत की बात को,गये सभी अब मान।
अरि मर्दन होगा तभी,हनुमत भरें उड़ान।।
३
संकट काटो हे प्रभो,निर्मल मति संधान।
शरण तुम्हारे आ पड़ी,रामभक्त हनुमान।।
४
अतुलित विद्या तेज बल,बुद्धि विमल संज्ञान।
भक्ति आपकी मन बसे,हनुमत दो वरदान।।
५
हनुमत तन सिंदूर भर,पहुँचे माँ के पास।
परम भक्ति का हो गया,रघुवर को आभास।।
६
विद्या देते हो सदा,रामभक्त हनुमान।
क्रोध अहं सब दूर हो,करूँ नित्य गुणगान।।
७
बाला जी सरकार के,जो भी आता द्वार।
संकट सारे काटते,बजरंगी दातार।।
दोहापूर्ति
पाप हरो करुणा करो, सदा रहो प्रभु साथ।
वैतरणी के कष्ट को, दूर करो हे नाथ।।1।।
पाप हरो करुणा करो, सदा रहो प्रभु साथ।
भव से पार करो हमें, नाथ पकड़कर हाथ।।2।।
पाप हरो करुणा करो, सदा रहो प्रभु साथ।
एक सहायक हो तुम्हीं, तुम ही दीनानाथ।।3।।
पाप हरो करुणा करो, सदा रहो प्रभु साथ।
लगन तुम्हारी है लगी, राम-राम-गुण गाथ।।4।।
पाप हरो करुणा करो, सदा रहो प्रभु साथ।
हो अनाथ के नाथ तुम, कभी न छोड़ो हाथ।।5।।
1- दिल दिसंबर
2122 2122 22
होंठ शबनम से भी जल जाते हैं।
पास हम-तुम जो चले आते हैं।
दिल दिसंबर-सा हुआ मावठ में-
अब्र रजनी में भी मुस्काते हैं।
शबनम- ओस की बूँद
मावठ- माघ-वृष्टि
अब्र- मेघ
2- पाक़ दामन
2122 2112 22
पाक़ दामन जो नहीं कर सकता।
दिल को रोशन वो नहीं कर सकता।
पर क़मर है यूँ फ़िदा रजनी पर-
वह पलायन तो नहीं कर सकता।
पाक़- पावन
क़मर- चाँद
क्या ज़रूरत है
आँख पुरनम ये हुई जाती है।
शब दिसंबर को लिए आती है।
क्या ज़रूरत है हमें स्वेटर की
गर्म साँसों की सदा भाती है।
जब लड़ाएँगे नयन
जब लड़ाएँगे नयन से ये नयन हम।
सुब्ह कब होगी हुई कब शाम हमदम।
दे गया यादें दिसंबर क़ल्ब में जो-
हमनवा रजनी रहेगी ख़ूब पुरनम।
ढा गए आँसू
सबसे नज़रें चुरा गए आँसू
बात बिगड़ी बना गए आँसू
गम को दिल में छुपा गए आँसू
राज़ कोई दबा गए आँसू
हाथ थामे रहो बुढ़ापे में
कान में फुसफुसा गए आँसू
साथ हम-तुम चलेंगे राहों में
साज़ ये गुनगुना गए आँसू
ख़त्म करना न तुम मुहब्बत को
जान तुमको बता गए आँसू
उम्र के इन हसीन लम्हों में
सारे शिक़वे भुला गए आँसू
हो गई है उदास जब रजनी
तुम पे भी क़ह्र ढा गए आँसू
बाद मुद्दत के जब मिले हम-तुम
गम का क़िस्सा सुना गए आँसू
तमन्ना है सनम
दिसंबर जा रहा है जनवरी गुलज़ार हो जाए
तमन्ना है सनम इस बार तो दीदार हो जाए
रखूँ कैसे क़दम मैं हमनवा के दिल के गुलशन में
अगर वो सौत के दिल का किराएदार हो जाए
समझती थी जिसे मैं बाग़बाँ माह-ए-मुहब्बत का
उसी के इश्क़ में दिल की कली कचनार हो जाए
बहाना गुनगुनी-सी धूप का करके चली आई
कभी तो सामने मेरे विसाल-ए- यार हो जाए
गुलाबी ठंड में भाने लगा सूरज ही रजनी को
क़मर को रश्क़ फिर कोई नहीं सरकार हो जाए
कुछ तो है वो बात : गीत
सुनकर तुम शरमार्ई “रजनी!” “कुछ तो है वो बात!”
चाँद छेड़कर पूछ रहा है, सिहर उठा क्यों गात?
तारों वाली झीनी चुनरी, महक रहा है वेश।
बेला-चंपा से हैं सज्जित, घूँघर काले केश।
संध्या की लाली गालों पर, अधर हुए जलजात।
“कुछ तो है वो बात!”
सुनो रूपसी क्यों करती हो, तुम ऐसा श्रृंगार?
घायल है दिल का हर कोना, हारा मैं दिलदार।
डाल-डाल मैं बचता जाऊँ, तुम्हें विजय सौगात।
“कुछ तो है वो बात!”
नारि-नवेली मेरा जीवन, झंकृत करती नित्य।
वाणी में गुंजित है वीणा, नैनों में साहित्य।
छैल-छबीली तुम बिन मेरे, कटें न पल-छिन सात।
“कुछ तो है वो बात!”
दिल में जाने क्या-क्या चलता रहता है
दिल में जाने क्या-क्या चलता रहता है
ज़ुल्मी ज़माना आग उगलता रहता है
दिल प्रेमी को देख मचलता रहता है
क़समें खा वो बात बदलता रहता है
घर से भूखा बाप निकलता रहता है
बच्चों के सुख में ख़ुद ढलता रहता है
हर एक घड़ी वक़्त फिसलता रहता है
ठोकर खाके ही शख़्स सँभलता रहता है
दे दी है आवाज़ तुम्हें मैंने साजन
दिल में रजनी शोर-सा पलता रहता है
माँ गंगा जी
लिया भगीरथ ने कठिन, निश्चय मन में धार।
पुत्र सगर के हित हुआ, गंगा का अवतार।।
गंगा पावन तीर्थ है, हरता हर अज्ञान।
जन मन रंजन सुरसरित, योगी करते ध्यान।।
माँ गंगा अति पावनी, सुर-सरिता है नाम।
देव-लोक से चल पड़ीं, होकर वह उद्दाम।।
हर-हर गंगे सब करें, हर लेतीं अघ- भार।
निर्मल करतीं हैं धरा, उर- आँगन हर द्वार।।
डुबकी लेकर गंग में, नर धोते निज पाप।
नहीं सँभलता जो अधम, होता पश्चाताप।
माँ गंगा की गोद में,जन-जन करें प्रवेश।
खुशियाँ छाईं हर तरफ,झूम रहा है देश।।
हर्षित नर- नारी बहुत,करते गंगा स्नान।
संत-बाल सब झूमते,मंदिर-मंदिर गान।।
नर्म हाथों पे हिना मैंने लगाई होती
नर्म हाथों पे हिना मैंने लगाई होती
तुझको जो याद मेरी रोज़ ही आई होती
वस्ल की रात में जो शम्अ जलाई होती
ज़िन्दगी फिर तो उजालों में नहाई होती
नाम तेरा मैं हथेली पे लिखाकर रख लूँ
तूने जो प्यार की ये रस्म निभाई होती
अनछुए इश्क़ का अहसास बयाँ हो जाता
वक़्त पर नज़्म सनम तूने सुनाई होती
मुझको अंजान सनम तू तो कभी क्यों लगता
मेरी आँखों से अगर आँख मिलाई होती
तूने इल्ज़ाम लगाए नहीं होते मुझ पर
अश्क़ गिरते न कभी आँख दुखाई होती
तुझको भर-भर के दुआ रोज़ दिया करती मैं
मेरे ज़ख़्मों की जो दी तूने दवाई होती
तुझको पैग़ाम न भिजवाती कभी क़ासिद से
जान लेवा न अगर इतनी ज़ुदाई होती
एक आवाज़ पे तू दौड़ा चला आ जाता
काश चूड़ी की खनक तुझको लुभाई होती
गजरा-कंगन भी पहनती मैं लगाती बिंदिया
दिल में दिलदार जो तेरे मैं समाई होती
मैं तेरी रूह के सागर में उतरती हमदम
सैर रजनी को कभी उसकी कराई होती
शब्दार्थ-
हिना- मेंहदी
वस्ल- मिलन
क़ासिद- डाकिया
दोहे
देव – जागरण का दिवस, तुलसी – पूजन साथ!
सुख की वर्षा हो सदा, हे लक्ष्मी के नाथ !!१!!
तुलसी का पूजन करो, अति पावन यह काज।
देवी करतीं हैं कृपा, होता स्वस्थ समाज ।।२।।
पादप तुलसी का धरूँ, अपने आँगन ठाँव।
हितकारी माता सदृश, रखती हैं निज छाँव ।।३।।
तुम ही मेरी चूड़ियाँ, तुम्हीं कलाई नाथ।
तुम सारे श्रृंगार हो, रुचिकर है तव साथ ।।४।।
कुंडलिया छंद
तुलसी का पादप धरूँ, अपने आँगन- ठाँव।
हितकारी माता सदृश, रखतीं हैं निज छाँव।।
रखतीं हैं निज छाँव, सदन को पावन करतीं।
अर्पित कर मैं नीर, सुखों से झोली भरतीं।।
पाकर अमर सुहाग, खुशी से रजनी हुलसी।
रक्षित हों संतान, धरूँ मैं पादप तुलसी।।
खाटूश्यामजी के प्राकट्योत्सव पर मेरा दोहा
बर्बरीक हे श्याम प्रभु, भगवन खाटूश्याम!
हारे के संबल सुनो, आई तेरे धाम ।।५।।
तेरा साथ
सात जन्म का लग रहा, प्रियतम तेरा साथ।
बीच राह मत छोड़ना, ले हाथों में हाथ!!
एक जन्म कम लग रहा, साजन तेरा साथ।
थाम रखोगे साजना, शत जन्मों तक हाथ?
मुक्तक-१
यहीं तुलसी यहीं मीरा यहीं रसखान बसते हैं।
इसी में तो कबीरा के हमेशा प्रान बसते हैं।
बिहारी ने रचे दोहे मिलेंगे सूर के पद भी-
लगे है मातु सम हिन्दी यहीं भगवान बसते हैं।
मुक्तक-२
तुम्हें कार्तिक महीने की छठी तिथि माँ सुहाती है।
सजी नारी दिवाकर देख व्रत का प्रण उठाती है।
कठिन छत्तीस घंटे तक बिना जल-अन्न के रहती-
निभाती रीति वह सारी भजन गाकर सुनाती है।।
मुक्तक-३
परिमल पद रज देश की, पावन मलय सुगंध।
सदा निभाते ही रहें, हम इससे अनुबंध।
राम कृष्ण गौतम सभी, गाते इसका गान-
भारत भू पर जन्म हो, पाएँ बलिष्ठ कंध।
छठ पर्व
1
वैदिक संस्कृति की झलक, छठ पूजा का पर्व।
सनातनी हिन्दू सभी, करते इस पर गर्व।।
करते इस पर गर्व, प्रकृति से प्रेम सिखाती।
सुख- वैभव धन- धान्य, सभी पर खूब लुटाती।।
सूर्यदेव को अर्घ्य, कृपा फिर होती दैविक।
रजनी कहती सर्व, बिहारी मानें वैदिक।।
2
व्रत करके सब नारियाँ, माँगे अटल सुहाग।
पति- बच्चों के साथ में, उत्तम हो अनुराग।।
उत्तम हो अनुराग, प्रकृति माता यह जानो।
छठ मैया है नाम, सभी इनको पहचानो।।
हरतीं सारे कष्ट, मिलें खुशियाँ जी भर के।
रजनी कहे सुहाग, मिले सबको व्रत करके।।
3
करते आदिक दिन सदा, सब नहाय अरु खाय।
दिवस दूसरे फिर करें, खरना तब मन लाय।।
खरना तब मन लाय, तरणि अस्ताचल होते।
देकर उनको अर्घ्य, व्रती निर्जल तब सोते।
बाद घण्ट छत्तीस, उषा में पारण धरते।
रजनी कहे प्रसाद, समर्पित तब हैं करते।।
दीवाली दीपों का मेला
शतक पाँच सौ रखा अकेला।
भक्तों ने यह दुख भी झेला।।
दलगत राजनीति का खेला।
न्यायालय में मचा झमेला।।
चमत्कार देखा अलबेला।
बना अवध में भवन नवेला।।
रामलला पर नेह उड़ेला।
दीवाली दीपों का मेला।।
गोवर्धन पूजा
गोवर्धन नख पर लिया, गिरिधर ने जब धार।
हर्षित ब्रज के लोग सब, हुई इंद्र की हार।।
संकट काटो मम सकल, हे गिरिधर महराज।
वरद हस्त हो शीश पर, रखना मेरी लाज।।
दीपोत्सव
1
आएँ हम दीपावली, सुखद मनाएँ आज।
सबके सिर पर हो सदा, बस खुशियों का ताज।
बस खुशियों का ताज, गरीबों के घर जाकर।
बाँटें प्रेम अथाह, उन्हें हम गले लगाकर।।
दीपक लेकर साथ, मिठाई भी ले जाएँ।
रजनी को है गर्व, खुशी जब देकर आएँ।।
2
दिया जलाएँ हम सभी, निज फौजी के नाम।
हिन्द राष्ट्र- हित वे सदा, आते हैं नित काम।।
आते हैं नित काम, पर्व को सुखद बनाकर।
इनका त्याग महान, करें सब कुछ न्योछावर।।
हमको दे सुख- चैन, हटाते सभी बलाएँ।
रजनी को है ध्यान, सभी हम दिया जलाएँँ।।
3
दीवाली घर- घर मनी, अवध बना सुखधाम।
चौदह वर्षों बाद जब, आए थे प्रभु राम।।
आए थे प्रभु राम, लिए सँग सीता माता।
और सहित हनुमान, लखन सम अति प्रिय भ्राता।।
जन- जन में उत्साह, नगर में थी खुशहाली।
रजनी थी उजियार, मनी घर- घर दीवाली।।
छोटी दीपावली
१
पूज रहे सब संग में, लक्ष्मी और गणेश।
हो वर्षा सौभाग्य की, करें कुबेर प्रवेश।।
२
नरक चतुर्दश पर रहें, दुख कोसों ही दूर।
माँ लक्ष्मी की हो कृपा, हम सब पर भरपूर।।
३
हनुमत का है अवतरण, नरक चतुर्दश- वार।
बल विद्या अरु बुद्धि के, बजरंगी भण्डार।।
४
दुःख सहें कन्या बहुत, थीं षोडशः हजार।
नरकासुर को मार कर, दिया कृष्ण ने तार।।
५
शिव चतुर्दशी पर मनुज, शिव को करो प्रणाम।
पंचामृत अर्पण करो, गौरा का लो नाम।।
दिलासा तो न देते तुम
क़सम खाकर हमारी ही भुला हमको न देते तुम
वफ़ा की नेक मूरत को कहीं फ़िर खो न देते तुम
पड़ी हम पर बड़ी भारी तुम्हारी नफरतों की बू
कली दिल की हमारी तोड़ हमको जो न देते तुम
हमारी बा-बफ़ाई की ज़रा भी क़द्र होती तो
जफ़ाओं से भरे काँटे जिगर में बो न देते तुम
खली होगी हमारी भी कमी शायद तुम्हें दिलबर
गले मिलके हमारे फूट कर यूँ रो न देते तुम
तुम्हारे दिल पे है हमदम हमेशा राज़ रजनी का
हमारी ज़ीस्त में झूठी दिलासा तो न देते तुम
वोट की है दुकान मुश्किल में
वोट की है दुकान मुश्किल में
हर चुनावी निशान मुश्किल में
बेटियों के दहेज़ की ख़ातिर
बाप का है मकान मुश्किल में
फ़स्ल जयचंद की उगी हर सू
मुल्क़ का है जवान मुश्किल में
जी सकेगा किसान अब कैसे?
आज उसका लगान मुश्किल में
चार दिन की है ज़िंदगी तेरी
उस पे कड़वी ज़ुबान मुश्किल में
साथ कोई बशर नहीं देगा
अंत आया तो जान मुश्किल में
हुस्न रजनी का चाँद ने देखा
ख़ुद है उसका जहान मुश्किल में
आया करवा चौथ
एक साल पर फिर सजन, आया करवा चौथ।
रहूँ सुहागन चिर जतन, आया करवा चौथ।।
करवा का व्रत मैं रखूँ, कर सोलह श्रृंगार।
पिया निहारें थिर नयन, आया करवा चौथ।।
प्रणय निवेदन कर पिया, गहे हाथ में हाथ।
आलिंगन में घिर मिलन, आया करवा चौथ।।
प्रियतम का मुख देखकर, जुड़े हृदय के तार।
हुई प्रेम में गिर मगन, आया करवा चौथ।।
हर पल तू सजता रहे, बन सिंदूरी माथ।
पिय ‘रजनी’ के सिर-वदन, आया करवा चौथ।।
मुक्तक
आधार छंद- गीतिका
पाश में थे मोह के अर्जुन! छुड़ाया आपको।
कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में गीता सुनाया आपको।
भव्य एवं दिव्य अपने रूप का दर्शन करा-
श्रेष्ठ होता कर्म ही फल से सिखाया आपको।
वस्ल के वक़्त
( Vasl ke Waqt )
वस्ल के वक़्त वो रुका ही नहीं
माह-ए-उल्फ़त में दिल मिला ही नहीं
मुस्कुराते हैं ख़ार में भी गुल
हार से उनका वास्ता ही नहीं
ज़ीस्त क़ुर्बान इस पे है मेरी
हिन्द जैसा वतन बना ही नहीं
क्यों किनारों से राब्ता रखता
ये समुंदर को ख़ुद पता ही नहीं
तेरी आग़ोश में रही रजनी
पर मिला इसका कुछ सिला ही नहीं
गौरी जिनका नाम
१
सुता हिमालय की उमा, गौरी जिनका नाम।
अष्टम् दुर्गा रूप में, करें सफल सब काम।।
२
आईं माँ नवरात्रि में, करके केहरिनाद।
रूप महागौरी शुभम्, हरें सकल अवसाद।।
३
सर्व सुमंगलदायिनी, श्वेताम्बरा प्रसिद्ध।
सती सदागति, शाम्भवी, करतीं सुखी-समृद्ध।।
४
आईं माँ नवरात्रि में, होकर सिंह सवार।
चूड़ी बिंदी से करूँ, माता का श्रृंगार।।
५
अष्टभुजा नवरूप में, करतीं हैं उद्धार।
शक्तिमयी संकट हरो, करो दुष्ट संहार।।
६
जगजननी जगदंबिका, सुखी रहे संतान।
रजनी पूनम चंद्रिका, माँग रही वरदान।।
७
चुनरी माँ की लाल है, लाल सजे श्रृंगार।
हलवा- पूड़ी भोग ले, भक्त खड़े दरबार।।
८
रम्य कमलदल से करूँ, माता का श्रृंगार।
सदा सुहागन मैं रहूँ, करना माँ उपकार।।
९
ऊँचे पर्वत पर बना, माँ तेरा दरबार।
हस्तबद्ध आते सभी, लेकर भक्त पुकार।।
१०
रण- चंडी का रूप धर, बन दुर्गा अवतार।
दुष्ट दलन कर मातु ने, भरी विजय हुंकार।।
११
सदा पुकारूँ मैं तुझे, हे दुर्गा हे अंब।
भीषण विपदा में रहीं, एक तुम्हीं अवलंब।।
१२
वरद- हस्त वरदायिनी, महिमा अपरम्पार।
जगराता फिर आ गया, भरने को भण्डार।।
१३
आतीं माँ नवरात्रि में, करके केहरिनाद।
रूप सुहाना भा गया, हुआ हृदय आह्लाद।।
१४
माँ दुर्गा ममतामयी,अद्भुत है श्रृंगार।
शीश मुकुट गल माल है, अष्टभुजी जयकार।।

रजनी गुप्ता ‘पूनम चंद्रिका’
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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