राम जी के दरबार मे
आज तौबा गर्दी थी.. इतनी की पैर धरने तक कि जगह नही.. तिल तिल लोग खिसक रहे थे.. पसीने से सरोबार हो रहे थे.. हर मनुष्य दूसरे मनुष्य से लगभग रगड़ कर ही चल रहा था.. और यह गर्दी होनी भी थी.. प्रभु श्री रामचंद्र के जन्मोत्सव की घड़ी थी.. रामजी की भक्ति में दुनिया गा रही थी.. झूम रही थी.. जयकारे लगा रही थी.. खूब गर्दी थी.
रामजी का जन्मोत्सव तो सदियों से मनाया जा रहा है.. सदियों से दुनिया प्रभु के श्रीचरणों में झुकती आ रही है.. मगर यह जनसैलाब अब बढ़ा है.. बचपन याद आता है तब जोश उत्साह तो यही था मगर गर्दी इतनी नही हुआ करती थी.. माँ के साथ जाता था.. माँ कुछ पैसे देती थीं और मेरी मौज हो जाती थी।
माँ बहुत ही हिदायतें देती थी.. कही घूम न हो जाऊँ इस चिंता में रहती थी.. नागपुर में भी कुछ समय मैने गुजारा है.. कुछ कक्षाएं वहां भी पढ़ी है.. अकोला के बनिस्बत नागपुर की शोभायात्रा खूब बड़ी खूब जोरदार होती थी.. दादी जी के साथ जाता था देखने मैं.. दादीजी उंगली थामे रहती थी.. मैं शोभायात्रा का आनंद लेता मगर दादीजी मुझ पर ही नजर रखती थी.. उन्हें भी लगता था कि कही मैं खो न जाऊ.. नागपुर की शोभायात्रा की भव्यता देख मैं मन ही मन मे कल्पना करता था कि अकोला में भी ऐसा हो तो कितना मजा आ जाये.
तो अकोला में पहले झांकिया नही निकलती थी मगर मेला सा माहौल बड़ा ही प्यारा बनता था.. मेले में खूब दुकानें सजती थी.. बच्चो के खिलौनो की दुकानें शायद कुछ अधिक ही लगती थी.. मैं खिलौने निहारता.. कुछ लेने की जिद करता.. कुछ माँ दिला देती.. कुछ आने वाले साल के लिए बाकी रखती।
मोहल्ले के कुछ बच्चे भी कभी कभी साथ मे हो जाते थे.. चूंकि हमारा रहना खोलेश्वर में ही था सो रामजी का मेला हमारे लिए कोई बहुत दूर नही था.. जब लौटते तो खूब शोर मचाते हुए हम सब बच्चे आते थे.. कोई पी पी बजाता तो कोई फुग्गे लहराता.. कोई कुल्फी चुसता तो कोई छोटी वाली गाड़ी चलाता.. बचपन सच मे कितना सुहाना होता है.. है न..!
आज की गर्दी की बात करे तो इंटक भवन से ही लोगो ने अपनी गाड़िया खड़ी करनी शुरू कर दी थी.. जहा बड़े सुहाने दिन बिताए उस खोलेश्वर में मेरे लिए आज गाड़ी खड़ी करने की जगह भी नही थी.. मैं काफी देर ईधर उधर गाड़ी दौड़ाता रहा और अंत मे वसंत सिनेमा के पास जैन मंदिर पर गाड़ी खड़ी की।
वहां भी गाड़ियों के ढेर लगे हुए थे मगर मैने किसी तरह अपनी गाड़ी खड़ी कर ही दी और फिर पैदल ही अथाह जनसागर के बीच घुस गया.. रामजी के भक्तों में गजब का उत्साह था.. पूरे जुलूस को पार करने में मुझे करीब डेढ़ घण्टे लगे.. भीड़ ही इतनी थी.. घूमते घूमते मुझे बच्चो के खिलौनों की कुछ दुकाने दिखाई दी.. खिलौने भी अब बदल गए थे.. नए जमाने के साथ बच्चो की पसंद भी बदल रही है।
मेरे समय के खिलौने लगभग नही जैसे थे.. मैं ढूढंने लगा बचपन का मेरा प्रिय खिलौना.. रसोई का सामान.. आप को याद होंगा पहले रसोई में लगने वाली चीजों का पूरा एक पैकेट आता था.. चकला, बेलन, चूल्हा, कढ़ाई, चम्मच, थाली आदि.. छोटे छोटे से यह खिलौने मुझे बड़े ही प्यारे लगते थे.. मैं यह लेना चाहता था मगर माँ हंसकर कहती कि तू लड़की थोड़े न है.. ये तो लडकिया लेती है.. तो भी मैं जिद करता तो माँ दिला देती इस शर्त पर की ये सब बच्चो के लिए है.. तेरे अकेले के लिए नही.
घर पर हम बच्चे उन खिलौनों से खूब खेलते.. झूठमूठ यू ही उस पर खाना पकाया जाता.. सब को पंगत में बैठाकर भोजन परोसते.. रसोई घर के खिलौने को ले कर मन के किसी कोने में न जाने कितनी मीठी मीठी यादे भरी पड़ी है.. जिंदगी के थपेड़ों के बची जब कभी भी कुछ अधिक झुलस जाता हूं तब घर के किसी कोने में आंख मूंद उन दिनों को ले आता हूं जिस में रसोई घर के सामानों का यह खिलौना भी है।
वह मुझे नही मिला.. मिलता तो जरूर खरीद लेता.. जब एकांत मिलता तब उन खिलौने सजाता.. भोजन बनाता.. बच्चे और पत्नी जरूर हँसते मगर मैं कहा उनकी फिक्र करता.. उन्हें भी पंगत में बैठा देता.. भोजन परोसता.. मगर वह खिलौना मिला ही नही.. मिलता तो मेरे भीतर बैठी छोटी सी स्त्री को जीवित कर जाता.. स्त्री का जीवित होना.. ताज्जुब न करे आप.. हम सभी के भीतर कही न कही स्त्री दबी पड़ी है.. बस फर्क इतना है कि यह स्त्री कभी कभार किसी खास मौके पर ही आती है.. अपना अहसास कराती है.. सभी को यह अहसास हो यह जरूरी नही मगर कभी ध्यान धरेंगे तो पाएंगे कि मैं सच कह रहा हु.
डीजे पर खूब भक्ति गीत बज रहे थे.. खूब नृत्य हो रहे थे.. एक बारगी तो मेरा भी मन हुआ कि भीड़ में घुसू ओर नाचू ( हालिका मुझे नाचना नही आता है ) मगर मुझ से कुछ अधिक जवान या नोजवानो की अत्यधिक ऊर्जा देख सोचा कि रहने दु.. इनके बीच गया तो कही मेरा कचूमर न बन जाये.. गरबा होता तो पक्का मैं शुरू हो जाता मगर नए लड़को के बीच जाने की मेरी हिम्मत ही नही हुयी.
श्रीरामचन्द्र जी के जन्मोत्सव पर अकोला में झांकिया अब बढ़ने लगी है और यह बहुत ही सुखद है.. वो दिन दूर नही जब आसपास के शहरों के रामजी के भक्त इस दिन इस महोत्सव का लाभ लेने अकोला जरूर पधारेंगे.. अनेक अनेक धन्यवाद.

रमेश तोरावत जैन
अकोला
मोब 9028371436
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