बचपन के दुश्मन बने पब्लिक स्कूल
याद आते हैं बचपन के वह दिन जब लोग गांव के बगिया में प्राथमिक ज्ञान प्राप्त करते थे। 5- 6 वर्ष की उम्र में पढ़ने जाया जाना शुरू किया। आराम से सुबह 9:00 बजे घर से निकलते थे । उछलते कूदते मौज मस्ती करते विद्यालय 10:00 बजे पहुंचते । हमें कभी होमवर्क का भी ज्यादा टेंशन नहीं रहा।
आप लोग सोचते होंगे मैं कोई हजार वर्ष पुरानी बातें बता रहा हूं। नहीं जी यह बातें दो दशक पूर्व की है । लेकिन आज के बच्चों को देखता हूं तो कभी-कभी हंसी आती है। अधिकांश बच्चों को सुबह 6:00 बजे तक तैयार होकर निकलना होता है। कभी-कभी तो बच्चा अपने पापा का चेहरा भी नहीं देख पाता और स्कूल चला जाता है ।
मम्मी का तो खैर देख लेता क्योंकि तैयार तो उन्हें ही करना पड़ता है । जिनके घर में नौकर चाकर है वहां तो बच्चा मां के भी दर्शन नहीं कर पाता । ऊपर से बस्ती का बोझ इतना बढ़ गया है बच्चों का कि उनकी कमर टेढ़ी होने लगती है। बच्चे और मजदूर में यही फर्क हो सकता है कि एक पत्थर ढोता है दूसरा पुस्तक।
यूकेजी एलकेजी प्रेप के फंडे के चलते बच्चा दो ढाई वर्ष का नहीं हुआ की नर्सरी में भर्ती कर दिया जाता है । इन तीन वर्षों की पढ़ाई में बच्चा चार अक्षर लिखना पढ़ना बोलना आ जाता है तो मां-बाप ऐसे खुश होते जैसे कोई गोल्ड मेडल उनका बच्चा जीत कर लाया हो।
जिस उम्र में बच्चों को आवश्यकता होती अधिक से अधिक मां-बाप का सानिध्य मिले वह प्राकृतिक रूप से अपनी। बाल क्रिया कर सके। वही स्कूल में बच्चा शांत मौन बैठने पर मजबूर किया जाता हैं ।थोड़ी सी गलती होने पर पड़ने लगते हैं गालों पर थप्पड़। कभी-कभी जब मैं इन बच्चों की क्लास में जाता हूं उन्हें देखकर तरस आता है कि आखिर क्यों माता-पिता अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए इन बच्चों का बचपन छीन रहे हैं ?
इन बच्चों की आखिर क्या गलती है जो भुगतने को अभिशप्त हैं । कौन है इसका जिम्मेदार ?जब तक हम इन बातों का गहराई के साथ विश्लेषण नहीं करेंगे समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहेगी।
कहते हैं की प्रकृति स्वयं बहुत बड़ी शिक्षक है जो सहज में सिखा देती है। 5 वर्ष तक की उम्र तक बच्चा मां पिता एवं परिवार के सानिध्य में जो कुछ सीख लेता है उसे विद्यालय के घुटन भरे माहौल में नहीं सिखाया जा सकता है । आपका बच्चा दो-चार अक्षर ज्ञान नहीं सीख पाए परंतु प्रकृति के सानिध्य में पलते हुए जरूर अपनी सहज प्रक्रिया से बढ़ते हुए जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।
इसीलिए गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर कहते हैं -” स्कूल वह फैक्ट्री है जहां पर बच्चों को प्रातः 8:00 बजे से 2:00 बजे मध्यान तक पुस्तकों को रटने के लिए अभिशप्त किया जाता है।”
गुरुदेव की बातें अक्षरसह सत्य प्रतीत होती हैं । स्कूलों में आज सिखाया है क्या जा रहा है? मात्र पुस्तकों के रटने या फिर परीक्षा में उल्टी करके हो गई पढ़ाई लिखाई।
हमें यह सोचना होगा कि पब्लिक स्कूलों की जितनी ग़लती है उतनी ही अभिभावकों की सोच का भी है । नित्य परचून की दुकानों की भांति खुलते पब्लिक स्कूलों का मुख्य उद्देश्य पैसा बटोरना होता है ।उन्हें बच्चों की शिक्षा से ज्यादा कोई सरोकार नहीं रहता । आवश्यकता है कि अभिभावक स्वयं समझे, विचार करें क्या समाधान खोजा जा सकता है ? बच्चा आपका है उसके बारे में आप स्वयं जान समझ सकते हैं।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )







