धान की कटनी

करै चला कटनी | Katni par Kavita

करै चला कटनी

 

ले ला रोटी-चटनी, करै तू चला कटनी,
कि मोर धनिया!
फिर से लूटिहा लहरवा कि मोर धनिया।

ताजी- ताजी अइली हम अबहिन गवनवाँ,
छूटल नाहीं हथवा से मेंहदी सजनवाँ।
अउतै करावा मत अइसन खटनी,
रजऊ समझा न हमके तू कव्वा-हकनी।
ले ला रोटी-चटनी, करै तू चला कटनी,
कि मोर धनिया!
फिर से लूटिहा लहरवा कि मोर धनिया।

कटी न तव गेहूँआँ उड़ाई आन्ही-पनियाँ,
घरवा में आवत तव बुलाइत हम बनियाँ।
बेचित कुछ अनजा, खरीदित नथुनी,
नीक लागत ई जवनियाँ तोहार चिकनी।
ले ला रोटी-चटनी, करै तू चला कटनी,
कि मोर धनिया!
फिर से लूटिहा लहरवा कि मोर धनिया।

काला पड़ी लूहिया में नाजुक मोर बदनवाँ,
क्रीम-पाउडर सूख जाई समझा सजनवाँ।
करा न करेजवा हमार छलनी,
तनकी छलकै दद्या छंहवाँ में आपन हिरनी।
ले ला रोटी-चटनी, करै तू चला कटनी,
कि मोर धनिया!
फिर से लूटिहा लहरवा कि मोर धनिया।

कइलू तू टॉप उम्में देखा मत चमवाँ,
संगवाँ जब रहबू तौ नाहीं लागी घमवाँ।
धीरे-धीरे बुझ जइबू कुल बुझनी,
बाटू चँनवाँ से सुग्घर मोर सजनी।
ले ला रोटी-चटनी, करै तू चला कटनी,
कि मोर धनिया!
फिर से लूटिहा लहरवा कि मोर धनिया।

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )

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