महाकुंभ

महाकुंभ: प्राचीनता एवं आधुनिकता का अद्भुत संगम

वर्तमान समय में प्रयागराज में लगने वाले महाकुंभ की चर्चा भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में सुनाई दे रही है। कुंभ की परंपरा तो हजारों वर्ष पुरानी है लेकिन इस वर्ष का महाकुंभ आध्यात्मिक दृष्टि ही से ही नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि इस समय राजनीति की कुर्सी पर एक ऐसे आध्यात्मिक नेता योगी आदित्यनाथ जी विराजमान है जो प्रयागराज ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत को आध्यात्मिक रंगों में रंग देना चाहते हैं। इस समय पूरे प्रयागराज को हर गली गूचे को एक दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है।

मेला क्षेत्र में भी विभिन्न अखाड़े अपने अध्यात्मिकता के साथ ही भौतिकता के प्रदर्शन में भी चका चौथ दिखाई दे रहे हैं। जो आध्यात्मिक त्याग तप का हिस्सा था वह आलीशान काटेजो में बदलता जा रहा है।

जो संत महात्मा सब माया है कह कर भौतिकता को नकारते थे वही आकंठ मोह माया में डूबते उतराते दिखाई दे रहे हैं। आइए हम लोग समझने का प्रयास करते हैं की कुंभ महाकुंभ आदि क्या है?

कुंभ, अर्धकुंभ और महाकुंभ

भारतवर्ष अध्यात्म प्रधान देश है। आध्यात्मिक की प्रधानता के कारण ही इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है जहां प्रतिवर्ष माघ ,छठे वर्ष में अर्धकुंभ और 12 वें वर्ष में कुंभ का आयोजन सदियों से होता आ रहा है। इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक आध्यात्मिक चर्चा एवं आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार प्रसार रहा है।

यह कुंभ पर्व 12 वर्ष के अंतराल पर चार स्थान पर (हरिद्वार , प्रयाग , नासिक और उज्जैन) में मनाए जाते हैं । 12 वर्षों में चारों स्थान के लिए पुराणों में ज्योतिष के अनुसार मुहूर्त दिए गए हैं ।

इन्हीं मुहूर्त के अनुसार कुंभ पर्व आयोजित होते हैं। कुंभ का अर्थ है आत्मा अथवा आत्मज्ञान को समझना और उस पर चलने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में देखा जा रहा है कि कुंभ पर्व को मात्र मेला ठेला समझ लिया जा रहा है।

जिसके कारण आत्मज्ञान अथवा ईश्वर प्रकृति एवं मनुष्य संबंधी ज्ञान जो हम ले सकते थे वह नहीं ले पा रहे हैं। वर्तमान समय में कुंभ पर्व भौतिकता के प्रदर्शन का मेला हो चुका है।

सरकार ने अब तो डिजिटल महाकुंभ बना दिया है। यही कारण है कि डिजिटल बाबाओं द्वारा डिजिटल पूजा भी होने लगी हैं। यहां आने वाले साधु संत भी जप तप की जगह प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान देते हैं। यही कारण है कि कुंभ पर्व अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है।

चंडी पत्रिका के संपादक ऋतशील शर्मा के अनुसार कुंभ का अर्थ है मानवी चेतना को जोड़ने वाले ,अपने भीतर देखने की प्रेरणा देने वाले तथा कभी नष्ट न होने वाले आत्म विज्ञान को देने वाले पर्व को कुंभ पर्व कहते हैं।

जिस प्रकार अंदर से खाली कुंभ बाहर से भी नाना प्रकार की वस्तुओं के बीच खाली ही रहता है उसी प्रकार भीतर से परमेश्वर के ज्ञान से विहीन मनुष्य नाना प्रकार के भौतिक वस्तुओं के बीच शून्य कुंभ की भांति खाली ही रहता है ।

साथ ही जिस प्रकार अंदर से पूर्ण कुंभ बाहर से भी पूर्ण दिखाई देता है उसी प्रकार अंदर से परमेश्वर के ज्ञान से युक्त मनुष्य बाहर नाना प्रकार की भौतिक वस्तुओं के बीच पूर्ण कुंभ के समान आत्मज्ञान से पूर्ण होता है । संक्षेप में कहा जाए तो कुंभ पर्व की यही शिक्षा है कि हम अपने शरीर रूपी चिनमय कुंभ को आत्मज्ञान से पूर्ण करने का अभ्यास करें।

कुंभ परंपरा के संदर्भ में गुरुवर रविंद्र नाथ टैगोर भी कहते हैं–
मन ! जाग मंगल लोके,
अमल अमृत -मय नव आलोके ज्योति विभासित चोखे।।
हेर गगन भरि जागे सुंदर ,
जागे तरंगे जीवन सागर-
निर्मल प्राते विश्वेर साथे ,
जाग अभय अशोके।।

प्रयागराज प्राचीन काल से ही शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। महर्षि भारद्वाज ने यही अपना गुरुकुल स्थापित किया था । कहते हैं गंगा की धारा उस समय भारद्वाज मुनि के आश्रम के नीचे बहती थी। यही कारण था की भगवान राम भी वन गमन के समय उनके आश्रम में विश्राम किए थे।

मुगल शासक अकबर ने प्रयाग का नाम बदलकर अल्लाह आबाद और यही नाम बिगड़ता हुआ इलाहाबाद हो गया। और लगभग 500 सालों बाद वर्तमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने इसे पुनः प्रयागराज में बदल दिया।

प्रयागराज की धरती आध्यात्मिकता के साथ ही प्रधानमंत्री की नगरी भी कहलाती है। यहां पर सूर्य की सात रश्मियों की भांति सात प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री , इंदिरा गांधी , विश्वनाथ प्रताप सिंह, गुलज़ारीलाल नंदा, चंद्रशेखर और राजीव गांधी हुए। गुलजारी लाल नंदा तथा चंद्रशेखर इलाहाबाद वासी तो नहीं थे किंतु उन्होंने उच्च शिक्षा यहीं से प्राप्त की थी।

यहां का इलाहाबाद विश्वविद्यालय को ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट पूर्व का ऑक्सफोर्ड की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। प्रयागराज मात्र एक नगर ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि पूरे विश्व के आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

संपूर्ण विश्व के लोगों की एक बार इच्छा जरूर है कि वह इस महाकुंभ में मां गंगा में डुबकी जरूर लगाए।
करोड़ों लोग मात्र आस्था के बल पर कड़ाके के ठंड में भी मन में आस जरूर लगाए हैं की संगम में डुबकी अवश्य लगाएंगे।

याद आता है पिछला कुंभ जब हमारे गांव तक लगभग 25 किलोमीटर का जाम लगा था। हम लोगों ने संगम तट पर तो नहीं लेकिन अपने क्षेत्र में हजारों तीर्थ यात्रियों को खिचड़ी का प्रसाद खिलाया था।

कहा जाता है कि भगवान राम वन गमन के समय तथा लंका पर विजय प्राप्त करने के पश्चात भी प्रयाग के दर्शन किए थे। कहते हैं तीर्थ में श्रेष्ठ प्रयागराज के दर्शन मात्र से करोड़ों पापों का नाश हो जाता है।
श्री रामचरितमानस में तुलसीदास जी महाराज कहते हैं–
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा । निरखत जन्म कोटि अघ भागा ।।देखु परम पावनि पुनि बेनी ।हरनि सोक हरि लोक निसेनी।

कहते हैं हरि अनंत हरि कथा अनंता। इस प्रकार से प्रयाग की महिमा भी अनंत है। आइए हम आध्यात्मिकता, भौतिकता एवं अदृश्य राजनैतिकता के अद्भुत संगम में डुबकी लगा कर अपने जीवन को धन्य बनाएं।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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