पारिवारिक की आवश्यकता क्यों
समाज देवता का युवा उपहार-परिवार समझा जाता है कि उत्तरदायित्वों से मुक्त रहते हुए यदि एकाकी जीवन व्यतीत किया जाय तो वह परिवार बसाकर, उसकी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए व्यस्त, परेशान व चिन्तित रहने की अपेक्षा अधिक सुखप्रद होता है।
परेशानियाँ और चिंताएँ निश्चित ही मनुष्य को दुःखी बनाती हैं, समस्याओं और कठिनाइयों में उलझा हुआ आदमी निश्चित ही क्षुब्ध व उदास रहता है। लेकिन परेशानी, चिंता, समस्याएँ और कठिनाइयाँ परिवार बसाने के कारण ही उत्पन्न होती हैं। यह सोचना भ्रमपूर्ण है।
पारिवारिक समस्याओं से परेशान व्यक्ति एकाकी और अविवाहित व्यक्ति को इस तरह की चिन्ताओं से मुक्त देखकर यह सोच सकते हैं कि इससे तो परिवार ही न बसाया जाता तो अच्छा रहता। परिवार बसाने पर घर के अन्य सदस्यों की आवश्यकताएँ पूरी करना, उनकी निर्वाह व्यवस्था जुटाना, रोग-बीमारी में उपचार चिकित्सा की व्यवस्था करना आदि ऐसी जिम्मेदारियाँ हैं, जिनसे अकेला व्यक्ति मुक्त रहता है।
अकेले व्यक्ति को इन चिन्ताओं से मुक्त देखकर ही परिवार को सब चिन्ताओं की जड़ मानने की भूल हो जाती है और पारिवारिक जीवन मात्र निराशापूर्ण, दुःखद अनुभव भर रह जाता है।
यह निराश दृष्टिकोण ही परिवार को समस्याओं का घर और चिन्ताओं की जड़ बना देता है अन्यथा परिवार कठिनाइयों, दुःखों और समस्याओं का आगार है, उनके कारण व्यक्ति दुःखी, चिन्तित व उदास रहे इसका कोई कारण नहीं है।
कठिनाई, समस्या और कष्ट के कारणों की दृष्टि से देखा जाय तो एकाकी जीवन भी उन कारणों से सर्वथा रहित नहीं होता यह बात और है कि एकाकी जीवन की समस्याएँ अलग ढंग की होती हैं, उनका स्वरूप पारिवारिक समस्याओं के स्वरूप से भिन्न होता है परन्तु समस्याओं से मुक्त कोई नहीं है।
जीवन निर्माणकारी साहित्य के एक लेखक ने एकाकी जीवन को एक अभिशाप बताते हुए लिखा है-“यह अभिशाप अपना भयंकर रूप तब धारण करता है जब व्यक्ति जीवन यात्रा के बिल्कुल मध्यवर्ती पड़ाव पर पहुँच जाता है।
उन समय अनुभव होता है कि खाली घर का सूनापन किस कदर उबाऊ हो जाता है। घर में प्रवेश करते ही जब अन्दर से स्वागत करने वाली कोई आवाज नहीं होती तो व्यक्ति अपने को बाहरी दुनिया से निकलने पर, जहाँ अधिकांश सम्बन्ध स्वार्थों के सम्बन्ध होते हैं।
अधिकांश रिश्ते केवल औपचारिक होते हैं और बातावरण में बनावटीपन भरा रहता है-ऐसी दुनिया से बाहर आने पर घर की खामोशी व्यक्ति को अपने अकेलेपन का अहसास कराती है। विशेषतः ऐसे व्यक्ति जिन्हें विवाह के बाद यह अकेलापन मिला है वे अनुभव करते हैं कि सूने घर में प्रवेश और पत्नी की मुस्कान के स्वागत का अनुभव करते हुए घर में प्रवेश करने में कितना भारी अन्तर होता है ?”
एकाकी जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप जीवन में सच्चे, आत्मीय और घनिष्ट मित्र का अभाव है। किस पर किस समय क्या बीत रही है. इसकी किसी को चिन्ता नहीं रहती। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई देता जिसके जीवन में एकाकी व्यक्ति का सर्वोच्च और सबसे महत्वपूर्ण स्थान हो। किसी को इस बात की चिन्ता नहीं रहती कि कोई व्यक्ति स्वस्थ है या बीमार, प्रसन्न है या खिन्न।
उस स्थिति में आभास होता है कि सच्चे मित्र की आवश्यकता जीवन में कितनी महत्वपूर्ण होती है और वह मित्र भी ऐसा जिसके प्रति अपने अनिवार्य दायित्व, जो अपने प्रति स्वयं को भी उसी प्रकार अनिवार्य दायित्वपूर्ण अनुभव कर सके तथा दोनों परस्यर दायित्वों, कर्तव्यों का निष्वापूर्वक पालन करते रहें। एकाकी रहने से जिस स्वतंत्रता की कल्पना की जाती है वह वस्तुतः स्वतंत्र नहीं स्वच्छन्दता होती है, जिसकी भड़क थोड़ी देर बाद ही शांत हो जाती है और फिर बाद में एक रिक्तता, पश्चाताप भर बच रहते हैं।
स्वतंत्रता का अर्थ है विवेकपूर्वक जीवन को जीना और प्रगति की सम्भावनाओं को साकार करना जबकि स्वच्छंदता जीवन से विवेक को स्थानच्युत कर उत्तेजना, बहक और भटकाव ही पैदा करती है। माना कि व्यक्ति एकाकी रहते हुए भी प्रस्तुत सम्भावनाओं और परिस्थितियों का विवेकपूर्ण उपयोग कर सकता है। परन्तु एक व्यक्ति की बुद्धि और समझ सीमित तो रहती ही है।
एकाकी भी होती है। उस स्थिति में प्रस्तुत सम्भावनाओं का पूरा लाभनहीं उठाया जा सकता। पारिवारिक जोवन में, जीवन-साथी उस मित्र की आवश्यकता को पूरा करता है, जो पूर्णतया निष्पक्ष, निर्दोष और यथासम्भव सहो परामर्श देता है। इसलिए कि परिवार में पति-पत्नी के लाभ व हित एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं, उन्हें दोनों का लाभ साथ-साथ दीखता है और ये परस्यर दूसरे पक्ष की भलाई में अपनी भलाई समझते हैं।
केवल उत्तरदायित्वों के बोझ से खिन्न होकर पारिवारिक जीवन के प्रति निराश और उदास दृष्टिकोण लिया जाय तो दूःखी व परेशान रहने के अलावा और कोई परिणाम नहीं निकलता। ना ज़रूरत शोर की, ना दिखावे की। हमारी सादगी ही हमारी संस्कृति ही हमारी असली पहचान है। वो है धरती की बेटी, संस्कृति की आवाज़ —एक पटेलिया आदिवासी समाज जो खुद में एक पूरी सभ्यता है।

बीएल भूरा भाबरा
जिला अलीराजपुर मध्यप्रदेश
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