Kavita mehngai

  • महंगाई | Kavita mehngai

    महंगाई ( Mehngai )   महंगाई ने पांव पसारे कमर तोड़ दी जनता की सुरसा सी विस्तार कर रही बढ़ रही दानवता सी   आटा दाल आसमान छूते भुगत रहे तंगहाली को निर्धन का रखवाला राम जो सह रहे बदहाली को   दो जून की रोटी को भागदौड़ भारी-भरकम होती स्वप्न सलोने सारे धराशाई मजबूरियां…