प्रेम | Poem prem
प्रेम ( Prem ) लिख देता हूँ नाम तेरा पर, बाद मे उसे मिटाता हूँ। और फिर तेरे उसी नाम पर,फिर से कलम चलाता हूँ। एक बार हो तो समझे कोई, बार बार दोहराता हूँ। कैसी है यह प्रीत मेरी जो, बिना समझ कर जाता हूँ। बैठ अकेले में पागल सा, मैं…
प्रेम ( Prem ) लिख देता हूँ नाम तेरा पर, बाद मे उसे मिटाता हूँ। और फिर तेरे उसी नाम पर,फिर से कलम चलाता हूँ। एक बार हो तो समझे कोई, बार बार दोहराता हूँ। कैसी है यह प्रीत मेरी जो, बिना समझ कर जाता हूँ। बैठ अकेले में पागल सा, मैं…