युद्ध के दौरान कविता | Yuddh ke Dauran Kavita
युद्ध के दौरान कविता ( Yuddh ke Dauran Kavita ) रात के प्रवाह में बहते हुए अक्सर अचेत-सा होता हूं छूना चाहता हूं — दूर तैरती विश्व-शांती की वही पुरानी नाव-देह . अंधेरे और उजाले का छोर पाटती तमाम निर्पेक्षताओं के बावजूद यह रात भी / एक राजनैतिक षड़यंत्र लगती है मुझे . जहां…

