हालाते जिंदगी

ये जिंदगी

यह फ़िल्म आप देख रहे हो न.. राजकपूर जी की मौत.. मौत के बाद मातम मनाने वालो का मेला.. एक से बढ़कर एक फिल्मी हस्तियां.. सब लोग शोकाकुल है.. कपूर परिवार को ढांढस बंधा रहे है.. दुनिया गमगीन है।

महान सितारा अस्त हो गया है.. वही आम दृश्य जो कि हम सब अक्सर देखते है.. शरीक होते है.. दुनिया का दस्तूर निभाते है.. मशानिया बैराग जाग जाता है.. कुछ पलों के लिए संसार की असारता का अहसास होता है.. ओर फिर सब भूल जाते है.. जिंदगी दौड़ा देती है.. नए तमाशे सजा देती है.. हम तमाशे में शरीक हो जाते है.. कभी मदारी कभी बंदर बन जाते है.. जिंदगी यू ही बदस्तूर बीतती रहती है।

करीब अड़तीस वर्ष पहले की यह चलती फिरती तस्वीरे मुझे भयभीत कर देती है.. देख रहा हु भीड़ में वो चेहरे जो कि अब इस धरती पर नही है.. बांके छैल छबीले सुंदर आकर्षक हीरो स्व. राज जी को नमन कर रहे है मगर अब स्वयं मुट्ठी भर राख बन सागर की न जाने किन गहराइयों में पड़े है।

राजकपूर जी की मौत से गमजदा इन सितारों कभी अपनी मौत के बारे में नही सोचा होंगा.. वे राज जी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रहे है और इस बात से अनजान है कि कभी उनके लिए भी प्रार्थना की जाएगी.. दुआएं पढ़ी जाएंगी.. तस्वीरों पर उनकी मालाएं चढ़ाई जाएंगी.. वही तो हुआ।

रस्मे रीति रिवाज उनके लिए कोई जुदा नही.. बस बात इतनी सी की मौत दूसरे की है मगर स्वयं के लिए सोचा नही.. मगर मैं सोचता हूं.. मौत के अहसास को जीता हु.. मेरे डर की यही वजह है.. अब कोई यह नसीहत देने मत बैठ जाना कि मौत से क्या डरना.. इसे तो आना है.. हा आना है मगर भय तो है.. इतना बहादुर नही मैं की यू ही शेखी बघारता फिरू जो भी होंगा देखा जायेगा।

मरे हुए लोगो की चलती फिरती तस्वीरे मुझे कही बहुत गहरे में ले जाती है.. डरा जाती है.. भविष्य के अंजाम को जता जाती है.. भविष्य.. हा भविष्य.. एक तसवीर.. एक हार.. चंद दिनों के लिए जलता एक दीपक.. कुछ अधसूलगी अगरबत्तियां.. एक मुट्ठी राख.. नदियों में लौटती पोटटी सागर की ओर बढ़ती एक मुट्ठी राख.. बस इतना सा अस्तित्व.. वो भी सागर की अथाह गहराइयों में खोता हुआ.. कुछ लहरों का शौर ओर फिर शांति.. भयावह शांति.. ख़ौफ़ से भरी शांति।

यही है जीवन का अंतिम अध्याय.. जिनकी तस्वीरों को देखा उनका भी.. मैं जो लिख रहा हु मेरा भी ओर जो यह सब पढ रहे है नही पढ़ रहे है उनका भी.. गहराती सर्द रात भय से भरी है.. पलको पर बोझ अब बढ़ने लगा है.. किसी नई सुबह की आस में देह निढाल है मगर सुबह होंगी ही इस पर मुहर कौंन लगायेगा..?

विचारों के बवंडर हाहाकार मचाये हुए.. जिंदगी को मुट्ठी में बांधने हेतु ऊर्जा प्रयत्नशील ओर अब आंखे भिच रही है.. बस उसी तरह जैसे धीरे धीरे प्राण छूटते है.. उसी तरह जैसे लोग मरते है.. गहरी नींद भी तो मौत का ही एक भाग है.. मैं मरूंगा या गहरी नींद में जाऊंगा यह सब अब सुबह की पहली किरण के साथ तय होंगा.. अनेक अनेक धन्यवाद।

रमेश तोरावत जैन
अकोला

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