डॉ. आलोक रंजन कुमार

डॉ. आलोक रंजन कुमार की कविताएँ | Dr. Alok Ranjan Kumar Poetry

पिता : भविष्य का तक़दीर है

    माता यदि ऑक्सीजन है,
    तो पिता हाइड्रोजन है।
    दोनों के मिलन से ही,
    शरीर में भरता जल है।

    माता यदि आज है तो ,
    पिता आज और कल है।
    पिता अनन्त आकाश है
    पिता भरा पूरा बादल है ।

    पिता अतीत व वर्तमान भी है
    भविष्य भी है,उसका फल है।
    पिता सर का साया भी है ,
    बाहर के लिए छाया भी है।

    पिता अस्थि, मज्जा, रक्त
    व पूरा का पूरा शरीर है।
    पिता अतीत से लेकर
    भविष्य का तकदीर है।

    पिता ताउम्र खेलाता खेल है,
    कभी खेलाता फुटबॉल है ।
    कभी शतरंज खेल खेलाए ,
    पर बच्चों को दिलाता गोल है।

    पिता के साये तले

      हर बचपन पिता के साये तले।
      हर युवापन पिता के साये तले।

      हर आंधियां पिता के साये तले।
      घूमें वादियां पिता के साये तले।

      शिक्षा दीक्षा पिता के साये तले।
      विवाह भी पिता के साये तले।

      भविष्य भी पिता के साये तले।
      पूरा परिवार पिता के साये तले।

      जैसा डगर पिता दिखाते चले।
      हम अपना क़दम बढ़ाते चले।

      पर्यावरण दिवस मनाने चला हूँ

      पर्यावरण दिवस मनाने चला हूँ।
      खुद ही प्रदुषण फैलाने चला हूं।
      शिक्षित होकर ज्ञान बाँटने चला हूं,
      कविता की पंक्तियां बाँचने चला हूं।
      पर्यावरण दिवस मनाने चला हूँ।

      औरों को पेड़ लगाने का ज्ञान देकर
      खुद ही पेड़ काटने चला हूं।
      पर्यावरण दिवस में कई जगह
      जा जा कर फोटो खिंचाने चला हूँ।
      पर्यावरण दिवस मनाने चला हूं।

      पर्यावरण बचाओ का नारा लगाकर
      जन-जन को जगाने चला हूँ।
      अपने मकाँ सजाने संवारने को,
      पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने चला हूं।
      पर्यावरण दिवस मनाने चला हूँ।

      दूसरों को सीख देता हूं बचाने को
      खुद अनावश्यक जल बहाने चला हूं।
      ओजोन- सुरक्षा का सबक देता हूँ सबको
      खुद बेपरवाह हो इत्र लगाने चला हूँ।
      पर्यावरण दिवस मनाने चाला हूँ।

      सभी जीवों की सुरक्षा हमारा कर्तव्य है,
      पर खुद ही शिकार करने चला हूं।
      धूएं से पर्यावरण प्रदूषित होता है।
      पर खुद मोटर कार चलाने चला हूं।
      पर्यावरण दिवस मनाने चला हूं।

      जय माता शारदे

      ऐसा करो, माॅ॑ शारदे।
      ज्ञानी बनें , उपहार दे।
      करता सदा, यह प्रार्थना।
      माता सुनें, नित याचना।

      देवी सुनें , भव तारणी।
      संकट सभी, दुख हारिणी।
      करते रहें , हम साधना।
      पूरी करें, मनोकामना।

      जीवन रहे , सबका सुखी।
      दिखे नहीं , कोई दु:खी।
      ममतामयी , हम मानते।
      समदृष्टि रखें, सब जानते।

      उपकार माॅ॑ , सब पर करें।
      भंडार सुख, घर घर भरें।
      तेरी कृपा, हम चाहते।
      बल अरु बुद्धि,सब मांगते।

      जय माता शारदे !
      त्रुटि सब विसार दे!

      Prof Dr Alok Ranjan Kumar

      डॉ. आलोक रंजन कुमार

      जपला, पलामू, झारखंड।

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