आत्म जागरण का पर्व: गुरु पूर्णिमा

सामान्यतया सभी जीवों का जन्म माता-पिता के सहयोग से होता है वह चाहे पशु पक्षी हो या मानव । परंतु मानव जीवन में ही हम गुरु ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। मां पालन पोषण तो कर सकती हैं ,पिता आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं परंतु जीवन में व्याप्त ज्ञान रूपी अंधकार से निकाल कर ज्ञान का प्रकाश गुरु ही दे सकते हैं ।

निगुरा एक प्रकार की गाली है ।मनुष्य को अनंत शक्तियों का स्वामी कहा गया है परंतु सारी शक्ति ज्ञान के अभाव में नष्ट हो जाती है । गुरु ही है जो हमें उस शक्ति का बोध कराते हैं । वह मार्ग बताते हैं जिससे यह मानव योनि सफल हो सके। मान लीजिए कोई गाड़ी है परंतु उसमें ड्राइवर ना हो तो गाड़ी किस काम की । इसी प्रकार यह शरीर एक प्रकार से निष्प्राण है । गुरु इसमें प्राण फूंकते हैं जिससे हमें अपने आत्म स्वरूप का बोध होता है।

पतंग की डोर को यदि ऐसे ही छोड़ दिया जाए तो वह कहा जाएगी कुछ पता नहीं । इसी प्रकार मानव जीवन के साथ भी होता है । गुरु के अभाव में जिंदगी कहां कैसे खत्म होती जा रही है कुछ पता नहीं । गुरु का स्थान हमारे शास्त्रों में ब्रह्मा विष्णु महेश से भी ऊंचा मान गया है।

स्वयं भगवान को भी गुरु का वरण करना पड़ा । वह चाहे भगवान कृष्ण के गुरु संदीपनी रहे हो या भगवान राम के गुरु विश्वामित्र एवं वशिष्ठ हो। गुरु वरण की परंपरा को प्राचीन काल से ऋषियों ने संस्कारों के माध्यम से यज्ञोपवीत संस्कार के रूप में समाज को श्रेष्ठ बनाने के लिए स्थापित की थी।

गुरुकुलों में बिना किसी भेदभाव के सभी जातियां के बच्चों को समान रूप से शिक्षा दी जाती थी । किसी राजकुमार एवं फकीर में पहचान करना मुश्किल होता था। परंतु समय के प्रभाव में गुरुकुल परंपरा नष्ट हो गई । आज के गुरुजन बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर उसका रक्त पी रहे हैं।

विद्यालय इस भाव से नहीं खोलते हैं कि इससे युवा पीढ़ी को सद्मार्ग की शिक्षा देनी है बल्कि इसलिए खोले जा रहे हैं कैसे जल्दी से जल्दी अभिभावकों और बच्चों का रक्त पीकर अपनी चमड़ी को बढ़ाऊ । उच्च वेतन भोगी शिक्षकों में अधिकांश का शराबी एवं नशेड़ी होते हैं जो बच्चों की शिक्षा न देकर सरे आम नशा करने एवं चरित्र हीनता के गुण सीखाते हैं। भाई भतीजावाद ,जात-पात का भेदभाव बच्चे स्कूलों में ही सीखने लगते हैं।

यदि देश को श्रेष्ठ युवाओं से युक्त समाज बनाना है तो गुरुजनों को अपनी गरिमा समझनी होगी। मैं यह नहीं कहता कि समाज में अच्छे लोग नहीं है परंतु उनकी अच्छाई इस गंदी नाली में मिलकर समाप्त हो जाती है । बच्चे पढ़ने पढ़ाने की अपेक्षा आचरण से ज्यादा सीखते हैं ।

आचार्य वही है जो आचरण से शिक्षा दे। आज विद्यालय में भी पाठ्यक्रम के नाम पर बच्चों को इतना हटाया जा रहा है कि वह मात्र बुद्धु बक्सा बनकर रह गया है । यह पाठ्यक्रम कूड़ेदान से ज्यादा कुछ नहीं है । शिक्षा वह जो श्रृजनशीलता ,सभ्यता, शालीनता सिखाएं।

आवश्यकता है पाठ्यक्रम में परिवर्तन की। अंग्रेजी भाषा के ज्ञान ने बच्चों की कमर और तोड़ दें रहीं हैं। इससे बच्चे मात्र अनुवादक बनकर रह जाते हैं। उनकी सृजनशीलता खत्म हो जाती है। अंग्रेजी भाषा के गौरव गान के साथ ही वह अपनी मातृभाषा को घृणा की दृष्टि से देखने लगता है।

आज आवश्यकता है ऐसी शिक्षा की जिसमें बच्चे स्वयं अपने जीवन से सीख सकें। जो स्वयं समाज के लिए उदाहरण बन सके। अपने दीपक स्वयं बन सके।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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