उद्देश्य, लक्ष्य, ध्येय

उद्देश्य, लक्ष्य ,ध्येय मानव जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है जिस मनुष्य के जीवन मे कोई उद्देश्य नही वह मनुष्य दिशा दृष्टि विहीन होता है।

जीवन का बिना उद्देश्य, राष्ट्र समाज मे कोई महत्व नही रहता उद्देश्य मनुष्य के दृष्टि, दृष्टिकोण एव स्वंय के स्वतंत्र विचार धारा के अस्तित्व पर निर्धारित होती है।

उद्देश्य जीवन के पथ का वह उजियार है जो मनुष्य को अनेको परीक्षाओं से गुजरता है एव उसके अन्तर्मन कि दृढ़ता समर्पण कि परख करता है जिसके उपरांत मनुष्य को उसके उद्देश्य के लिये चयनित कर उसके स्वयं के अंतर्मन से ही उजियार प्रकाश का प्रस्फुटन करता है।

जिसके कारण उसे अपना उद्देश्य बौना लगता है और वह समय काल मे बट बृक्ष जैसा विशाल
उद्देश्यपूर्ण जीवन का बृहद जीवन पथ सार तथ्य तत्व होता है तो लक्ष्य उसका आलम्बन और ध्येय उसकी ऊर्जा यह भ्रम कि उद्देश्य लक्ष्य एवं ध्येय तीनो जीवन मे एक ही पराक्रम को परिभाषित करते है अर्थहीन एव अज्ञानता के अंधकार कि दिशा ले जाता है ।

उद्देश को यदि सागर कि गहराई मान ले तो लक्ष्य होंगे सागर तक जाना सागर में उतरना एव सागर के अंतर्मन में गोते लगाने हेतु अभ्यास तदुपरान्त सागर कि गहराई में उतरना यानी उद्देश कि प्राप्ति इसी प्रकार अगर उद्देश्य एवरेस्ट है तो लक्ष्य होगा पहाड़ चढ़ने का अभ्यास तदुपरांत छोटे छोटे चोटियों पर चढ़कर अनुभव अनुभूति कि तदुपरांत एवरेस्ट कि चढ़ाई यानी उद्देश्य कि परम प्राप्ति उक्त दोनों में ध्येय है उद्देश के निर्धारण के बाद उसके पथ पर चलने के दौरान आने वाले अवरोध ,चुनौतियों, परीक्षाओं जैसे द्वंद युद्ध का शौम्य, शांत, अविचलित, एकाग्र शत्र ,शास्त्र जो मन बुद्धि को उद्देश्य पथ से विचलित होने ,भयभीत होने असंयमित होकर भटकाव से विमुख शाश्वत शक्ति दृढ़ता समर्पण है तो लक्ष्य जीवन के बृहद उद्देश्य पथ के अनेक लघु आयाम है जिनके बिना उद्देश्य कि परम प्राकाष्ठा पर पहुंचना असंभव है।

मनुष्य के जीवन मे उसके उद्देश्य का निर्धारण उसके स्वयं के अतिरिक्त कोई दूसरा नही कर सकता क्योंकि उद्देश्य का जन्म ही मनुष्य के स्वतंत्र अस्तित्व के मन ,बुद्धि, विचार के सत्त्यार्थ प्रकाश में होता है किसी अन्य के द्वारा निर्धारित उद्देश्य कि प्राप्ति के लिए स्वतंत्र मन बुद्धि के मानव को कोई भी मार्ग बता तो सकता है चला नही सकता है चलेगा वह तभी जब मार्ग उसके स्वयं के द्वारा निर्धारित किया गया हो।

बहुत स्पष्ट है उद्देश्य मानव मन बुद्धि का अपना चयन होता है जिसकी उत्पति उसके स्वयं से होती है और ऐसा जब भी होता है तब उद्देश्य पथ का मानव विजेता होता है चाहे कितने ही बाधा व्यवधान उसके उद्देश्य पथ को विकट विकराल बनाने कि कोशिश क्यों ना करे ।

राजकुमार सिद्धार्थ ने जीवन एव ब्रह्म के याथार्त कि खोज को अपना जीवन उद्देश्य निर्धारित किया तब उनका प्रथम लक्ष्य था मोह माया का त्याग, दूसरा लक्ष्य था जीवन के संबंधों एव बैभव का त्याग, तीसरा लक्ष्य था मार्ग एवं ज्ञान कि प्राप्ति ,चौथा लक्ष्य था तपस्या जिसके बाद उन्हें अपने परम उद्देश्य कि प्राप्ति बोधि बृक्ष के नीचे बोधत्व के रूप में प्राप्ति हुई जो ब्रह्मांड में मानव शरीर में परब्रह्म परमात्मा को अवतरित करना समाहित कर प्रकृति प्राणि के ब्रह्मांड में प्राणि प्राण में ब्रह्म अवतरण कि प्रथम महान घटना थी जो आत्मा कि परम यात्रा कि परमात्मा सत्ता सुख बैभव से सम्पन्न राजकुमार द्वारा सबकुछ त्याग कर प्रमाणित किया गया ।

राजकुमार सिद्धार्थ द्वारा स्वयं अंतर्मन के पुकार पर जीवन के उद्देश्य का निर्धारण एव उसके पथ में लघु लक्ष्यो को प्राप्त करना एव उद्देश के प्रति एकाग्रता समर्पण दृढ़ता ध्येय ध्यान अविचलित आगे बढ़ते रहने कि प्रेरणा देती रही।

अब समाज राष्ट्र में यदि इसे परिभाषित करना हो तो माँ बाप अपने पुत्र को अपनी इच्छानुसार डॉक्टर इंजीनियर ,आई ए एस ,आदि आदि बनने का उद्देश्य उसके समक्ष रखते है किंतु होता इतर है जो वह बनाना चाहता है उसीके अनुसार वह स्वय के लक्ष्यों का अंतर्मन से निर्धारण करता है और उसके लिए प्रतिस्पर्धा में उतर जाता है क्योकि यह परम सत्य है कि मानव जिस भी उद्देश्य को अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के आयाम में निर्धारित करता है उंसे वह निश्चित प्राप्त करेगा ।

उद्देश्य पथ में में निर्धारित लघु लक्ष्यो कि प्राप्ति ही उद्देश्य कि वैधता क्योकि लक्ष्य होते ही है प्राप्त करने के लिए उद्देश्य पथ के लघु लक्ष्यो कि प्राप्ति बृहद उद्देश्य के ध्येय के प्रति उत्साहित रख सकारात्मक ऊर्जा का सांचार करता है जो उद्देश्य पथ कि अनिवार्यता है।

उदाहरण के लिए यदि भारत को 2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर कि अर्थव्यवस्था के बृहद उद्देश्य को हासिल करना है तो मितव्ययता, कर चोरी,भ्रष्टाचार, आयात निर्यात संतुलन,घरेलू निवेश को प्रोत्साहन, ग्रामीण कुटीर उद्योगों को बढ़ावा ,आद्योगिक विकास दर में बृद्धि,ढांचागत सुधार,संवेदनशील एव संवैधानिक समाज कि संस्कृति कि प्राथमिकता, विदेशी निवेश को बढ़ावा,अपराध पर नियंत्रण जैसे छोटे छोटे निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना ही होगा तब जाकर पांच ट्रिलियन का उद्देश्य 2025 को प्राप्त किया जाएगा ।

यदि किसी तरह बिना इन लघु लक्ष्यो को प्राप्त किये पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था कि बात की जाय तो वह परिहास जैसी होगी क्योंकि अर्थव्यवस्था समाज राष्ट्र के शिराओं में बहता वह प्रवाह है जिससे जीवन है राष्ट्र का अस्तित्व है।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

गोरखपुर उत्तर प्रदेश

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