सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़ की ग़ज़लें -2 | Poetry of Sarfraz Husain Faraz

विषय सूची

तमाशा यह भी जहां को दिखा दिया मैंने

तमाशा यह भी जहां को दिखा दिया मैंने।
ख़िज़ां को फ़स्ले-बहारां बना दिया मैंने।

किताबे-दिल से भी उसको हटा दिया मैंने।
के जिसको अपनी नज़र से गिरा दिया मैंने।

कहा था जो भी वो कर के दिखा दिया मैंने।
वफ़ा से तेरी जफ़ा को हरा दिया मैंने।

परिन्दा प्यार का छत से उड़ा दिया मैंने।
के जिसमें रज थे वो दरबा जला दिया मैंने।

चराग़े-इ़श्क जहां भी जला दिया मैंने।
मुनाफ़रत को वहां से मिटा दिया मैंने।

अना पे तेरी यूं खंजर चला दिया मैंने।
तिरे बग़ैर भी जी कर दिखा दिया मैंने।

ख़ुद अपनी मौत का सामां बता दिया मैंने।
हर एक उक़्दा से पर्दा हटा दिया मैंने।

ग़मों को ऐसे भी रस्ता भुला दिया मैंने।
के हंस के सारे जहां को हंसा दिया मैंने।

फ़राज़ यह भी करिशमा दिखा दिया मैंने।
उदास लोगों को हंसना सिखा दिया मैंने।

वल्लाह कैसी चांद सी सूरत है आप की

वल्लाह कैसी चांद सी सूरत है आप की।
रक़्स़ां सभी के होठों पे मिदह़त है आप की।

समझा था मैंने भूल गए हो मुझे जनाब।
पुर्सिश को मेरी आए इ़नायत है आप की।

देखे बग़ैर आप को मिलता नहीं क़रार।
आंखों को मेरी अब भी ज़रूरत है आप की।

मैं और हाय आप का यह आस्ताने-ख़ास़।
मुझको यहां बुलाया मुह़ब्बत है आप की।

बिछड़े हुए तो हम को ज़माने हुए मगर।
सीने में ज़िन्दा आज भी उल्फ़त है आप की।

दुनिया की बात छोड़िए अपनी बताइए।
कह दूं मैं दिल की बात इजाज़त है आप की।

क्यों मुझको मेरे नाम से देते नहीं सदा।
किस दर्जा दिलकुशा ये शिकायत है आप की।

बातिल का साथ दीजिए ह़क़ को दबाइए।
जो चाहे आप कीजे ह़ुकूमत है आप की।

बे-सोचे समझे जल्द सुना दीजिए सज़ा।
मुजरिम हैं हम फ़राज़ अ़दालत है आप की।

सितम इस तरह दिल पे ढाती है दुनिया

सितम इस तरह दिल पे ढाती है दुनिया।
ग़मों पर मिरे मुस्कुराती है दुनिया।

निपटना है दुनिया से अब कैसे-कैसे।
हुनर यह भी हमको सिखाती है दुनिया।

सितम यह भी देखा है दुनिया का हम ने।
हंसाकर भी दिल को रुलाती है दुनिया।

लगाता है दुनिया से जो अपने दिल को।
तमाशा उसी का बनाती है दुनिया।

मयस्सर है जिसको गुल-ए-कामरानी।
उसी के फ़क़त गीत गाती है दुनिया।

कहीं का भी रहता नहीं फिर वो इन्सान।
निगाहों से जिसको गिराती है दुनिया।

जो मिलता है दुनिया से सादा दिली से।
निवाला उसी को बनाती है दुनिया।

फ़राज़ इससे वाक़िफ़ हैं अच्छी तरह हम।
बहुत उंगलियों पर नचाती है दुनिया।

ले गया जब वो हर ख़ुशी दिल की

ले गया जब वो हर ख़ुशी दिल की।
दूर हो कैसे बे-कली दिल की।

कर गया गुल वो रोशनी दिल की।
फिर मिटे कैसे तीरगी दिल की।

हिज्र का उसके ह़ाल मत पूछो।
सूनी-सूनी है हर गली दिल की।

वो न समझा तो कौन समझेगा।
ह़सरतें दिल की बे-बसी दिल की।

उसके बिन चैन किस तरह आए।
दीद उसकी है मयकशी दिल की।

मुनह़सिर इस पे जान है जानां।
अ़र्ज़़ कीजे न अनसुनी दिल की।

दिल का जाम-ए-सिफ़ाल टूट गया।
अब बुझे कैसे तिशनगी दिल की।

ज़हन की टाल दीजिए लेकिन।
बात कीजे न मुल्तवी दिल की।

क्या करेंगे फ़राज़ अब जी कर।
उसने जब रेढ़ मार दी दिल की।

ज़िन्दगी कुछ यूं गुज़ारी जा रही है

ज़िन्दगी कुछ यूं गुज़ारी जा रही है।
शादमानी ग़म पे वारी जा रही है।

हां में हां करने लगे क्यों बातिलों की।
क्या तुम्हारी अ़क़ल मारी जा रही है।

मेह़नतों पर है कमर-बस्ता वो हर दम।
नर से आगे अब यूं नारी जा रही है।

आपके ह़ुस्न-ए-अज़ल की जाने-जानां।
धीर-धीरे हर ख़ुमारी जा रही है।

ग़र्क़ हैं जो उलटे-सीधे अम्र में अब।
आरती उनकी उतारी जा रही है।

अपनी सूरत से नहीं मतलब उन्हें कुछ।
आइनों की गत संवारी जा रही है।

फ़ायदा मिलता नहीं कुछ दोस्ती से।
बे-सबब दौलत हमारी जा रही है।

उनसे मिलना है तो बस मिल लीजिए अब।
ऐ फ़राज़ उनकी सवारी जा रही है।

सुकूं से जहां में गुज़र चाहते हैं

सुकूं से जहां में गुज़र चाहते हैं।
परिन्दे हैं हम इक शजर चाहते है।

तिरे बिन मसीह़ा न हो जिसका कोई।
के हम वो ही दर्द-ए-जिगर चाहते हैं।

ख़ुशी ही ख़ुशी हो जहां हर क़दम पर।
मुह़ब्बत का ऐसा नगर चाहते हैं।

ख़ुदाया उन्हें भी तू ख़ुश हाल रखना।
जो रखना मुझे चश्मे-तर चाहते हैं।

इजाज़त है उन को मुह़ब्बत से जाएं।
बिछड़ना वो मुझसे अगर चाहते हैं।

करम तेरा होता रहे हम पे नाज़िल।
दुआ़ओं में बस यह असर चाहते हैं।

जिधर है बसेरा रक़ीबों का मेरे।
ठिकाना वो अपना उधर चाहते हैं।

नज़र दूर तक भी जहां हम न आएं।
फ़राज़ अब वो ऐसी डगर चाहते हैं।

सुरूरो-कैफ़ है क्या ह़ुस्नो-दिलकशी क्या है

सुरूरो-कैफ़ है क्या ह़ुस्नो-दिलकशी क्या है।
तिरे बग़ैर मिरी शेअ़रो-शायरी क्या है।

चराग़े-दिल हो मुनव्वर तो तीरगी क्या है।
बुझा हो दिल ही किसी का तो रोशनी क्या है।

जनाबे-नास़िह़े-मुश्फ़िक़ को क्या पता इसका।
असीरे-ज़ुल्फ़ बताएंगे आशिक़ी क्या है।

जो हंस के देख ले तू तो मैं तोड़ दूं साग़र।
निगाहे-लुत्फ़ के आगे यह मय-कशी क्या है।

अमीरे-शहर को कब तजरिबा है ऐ लोगो।
किसी ग़रीब से पूछो के बे-बसी क्या है।

शिकम-परस्ती ही जिन का उसूल है जग में।
वो क्या बताएंगे तुमको के बन्दगी क्या है।

मैं तेरी याद से ग़ाफ़िल कभी नहीं रहता।
ये होश है तो तो मिरी जान बे-ख़ुदी क्या है।

किसी भी दफ़्अ़ समझ में मिरी नहीं आया।
हज़ार बार ये सोचा के ज़िन्दगी क्या है।

फ़राज़* साक़िया कैसे बताएगा तुम को।
ये तिशनाकाम से पूछो के तिशनगी क्या है।

तेरा होता नहीं दीदार तिरे कूचे में

तेरा होता नहीं दीदार तिरे कूचे में।
कैसी ह़ाइल है यह दीवार तिरे कूचे में।

इक नज़र मेरी तरफ़ भी हो मसीहा मेरे।
कब से बैठा हू़ मैं बीमार तिरे कूचे में।

मुद्दअ़ किस से कहूं अपना बता दे तू ही।
मुझसे हर शख़्स़ है बेज़ार तिरे कूचे में।

यह मुक़द्दर है मिरा या के है साज़िश कोई।
ज़़र्ब ही खाई है हर-बार तिरे कूचे में।

लौट जाना ही मुनासिब है यहां से अपना।
कोई मिलता नहीं ग़मख़्वार तिरे कूचे में।

याद ताउम्र रहेगी यह निशानी मुझको।
दिल हुआ है मिरा मिसमार तिरे कूचे में।

अपने पहलू में बिठा रक्खा है सबको तूने।
मैं ही बे-कार हूं दिल-दार तिरे कूचे में।

तुझसे दो चार ही मिलते हैं यहां पर मुझको।
मुझसे ख़ब्ती की है भर-मार तिरे कूचे में।

मैं भी कुछ देर फ़राज़ अपना लगा लेता जी।
कोई होता जो मिरा यार तिरे कूचे में।

वतन

बू-ए-संदल से महका है सारा वतन।
क्यों न हो दिलकुशा फिर हमारा वतन।

कैसे सानी हो कोई जगत में तिरा।
ख़ूबियों का है जब तू पिटारा वतन।

हिन्दू-मुस्लिम हों,सिख हों के ईसाई हों।
हर किसी को है तू जां से प्यारा वतन।

क्यों न सर-सब्ज़ हो तेरी धरती भला।
तुझ पे शैदा है गंगा का धारा वतन।

तू समाया है मेरी रग-ए-जान में।
तुझ से दूरी हो कैसे गवारा वतन।

क्यों न शैदाई हो तेरा हर इक बशर।
तुझको कुदरत ने ऐसा संवारा वतन।

तू ही भारत है,तू इण्डिया,हिन्द तू।
जिसने जो चाहा तुझको पुकारा वतन।

क्यों न तारीफ़ हो सब के लब पर तिरी।
सबकी आंखो का है तू सितारा वतन।

फ़ैज़,ह़सरत के शैदा ख़ुमार-ओ-फ़राज।
किसने दिल अपना तुझपे न वारा वतन।

ख़त्म हो कैसे बे-कली अपनी

ख़त्म हो कैसे बे-कली अपनी।
रूठी-रूठी है मोहिनी अपनी।

जंग करती है रात-दिन लेकिन।
फिर भी बेहतर है सुन्दरी अपनी।

थर्थराते हैं ख़ानदानी सब।
जब तड़कती है दामिनी अपनी।

सब चिड़ी-मार आह भरते हैं।
जब भी उड़ती है कलचिड़ी अपनी।

जब भी जी चाहेगा बजा लेंगे।
राग अपना है रागिनी अपनी।

मुझको पस्तों में बात करने दे।
जेब में रख तू फ़ारसी अपनी।

बन्द स्कूल हो रहे हैं अब।
खोल लो आंखें मुन्शी जी अपनी।

क्या सुनाएं फ़राज़ अब ग़ज़लें।
छीन ली उसने डायरी अपनी।

ऐसा नहीं के ज़ीस्त मज़ेदार अब नहीं

ऐसा नहीं के ज़ीस्त मज़ेदार अब नहीं।
लेकिन किसी का कोई भी ग़म-ख़्वार अब नहीं।

सब अपनी उलझनों को ही सुलझा रहे हैं बस।
ग़म से किसी के कोई ख़बर-दार अब नहीं।

राह़त उन्हीं की याद से मिलती है क़ल्ब को।
कैसे कहूं के उनका मैं बीमार अब नहीं।

लिल्लाह कोई वस्ल का रस्ता निकालिए।
दूरी गवारा आप से सरकार अब नहीं।

करता है याद आप को आठों पहर ह़ुज़ूर।
इक पल भी क़ल्ब आप से बे-ज़ार अब नहीं।

अब अपने दिल की बात भी आती नहीं समझ।
पाज़ेब की ह़ुज़ूर यह झंकार अब नहीं।

बीते दिनों की बात पे पर्दे गिराइए।
यह दौर है क़लम का जी तलवार अब नहीं।

हम थक चुके मनाते-मनाते उन्हें फ़राज़।
उनसे मुआ़मलात का इसरार अब नहीं।

क्यों न रोशन हो ज़िन्दगी अपनी

क्यों न रोशन हो ज़िन्दगी अपनी।
चांद अपना है चांदनी अपनी।

जिनकी ह़सरत थी वो नहीं आए।
दूर हो कैसे बे-कली अपनी।

मुल्क बर्बाद हो चुका देखो।
छोड़ दो अब तो ख़ुदसरी अपनी।

चन्द लम्हे ही मुस्कुराती है।
फूल जैसी है हर ख़ुशी अपनी।

बिन पिए उन की मस्त आंखों से।
बुझ न पाएगी तिश्नगी अपनी।

साथ ईमान के उठें जग से।
यह ही चाहत है आख़िरी अपनी।

किसने खोली हैं काकुले-मुश्कीं।
महकी-महकी है क्यों गली अपनी।

हम भी शायर फ़राज़ हो जाएं।
आप दे दें जो डायरी अपनी।

जब दिमागों पे छाई आज़ादी

जब दिमागों पे छाई आज़ादी।
ख़ूने-दिल दे के पाई आज़ादी।

भर दिया जोश जिसने ज़ह्नों में।
वो ख़ुशी ले के आई आज़ादी।

जान दे कर ख़रीद लूं इसको।
ऐसी आंखों को भाई आज़ादी।

हिन्द ख़ुशहाल हो गया जिससे।
लुत्फ़ वो साथ लाई आज़ादी।

क्यों न चमकें भला दहन सबके।
खा गई ग़म की काई आज़ादी।

सब असीर-ए-क़फ़स ये कहते हैं।
हर ख़ुशी की है साई आज़ादी।

तेरे लाखों जवां लुटे इस पर।
तब मिली तुझको माई आज़ादी।

कोई दौलत नहीं फ़राज़ ऐसी।
जैसी होती है भाई आज़ादी।

शब-ओ-रोज़ इनके इशारों की साज़िश

शब-ओ-रोज़ इनके इशारों की साज़िश।
समझते हैं हम ख़ूब यारों की साज़िश।

कहीं गुल ही गुल हैं कहीं ख़ारो-ख़स बस।
ख़ुदा जाने क्या है बहारों की साज़िश।

यक़ीं मानिए वो भी भूलें हैं अपनी।
जिन्हें हम समझते हैं तारों की साज़िश।

ये जो हर तरफ़ हैं मज़ाहिब के झगड़े।
है इन में कई ताजदारों की साज़िश।

सिवा मेरे घर के बरसते हैं हर-सू।
न जाने है क्या अब्र-पारों की साज़िश।

उन्हें जान अपनी गंवानी पड़ी है।
जो समझे नहीं आब-शारों की साज़िश।

न आएंगे झांसे में इनके कभी हम।
निगाहों में है सब नज़ारों की साज़िश।

ख़ुशी में इज़ाफ़ा ही करती है उनकी।
है किस काम की हम बेचारों की साज़िश।

फ़राज़ इन से मोह़तात रहना हमेशा।
संभलती नहीं ग़म-गुसारों की साज़िश।

सह़ने-गुलशन में आई पुरवाई

सह़ने-गुलशन में आई पुरवाई।
रुत बहारों की लाई पुरवाई।

साज़ बजने लगे फुहारों कें।
जिस घड़ी सनसनाई पुरवाई।

उड़ गयी नींद अब्र पारों की।
इस क़दर गुनगुनाई पुरवाई।

कैफ़ियत है अ़जीब सी सबकी।
कैसी ज़ह्नों पे छाई पुरवाई।

जिसने मस्ती से भर दिया सबको।
लाई ऐसी दवाई पुरवाई।

खिल उठे सब के फूल से चेहरे।
सब ख़िज़ाओं को भाई पुरवाई।

छेड़ कर मेरे दर्दे-माज़ी को।
मन ही मन मुस्कुराई पुरवाई।

इक हमारे फ़राज़ क्या सब के।
ज़ह्नो-दिल में समाई पुरवाई।

जला दे न दिल को अ़दावत की आतिश

जला दे न दिल को अ़दावत की आतिश।
बुझा दें चलो यह ह़िक़ारत की आतिश।

अख़ुव्वत को कर देगी यह राख देखो।
न भड़काओ ऐसे सियासत की आतिश।

कहीं भी सुकूं दिल को मिलता नहीं है।
धधकती है जिस दम मुह़ब्बत की आतिश।

निखरना है इक रोज़ किरदार उसका।
सहन जिसने कर ली नसीह़त की आतिश।

अरे ना-समझ सादगी से रहा कर।
जला दे न तुझको रऊ़नत की आतिश।

गुनहगार कर के ही छोड़े है दिल को।
सुलगती है जिस दम इरादत की आतिश।

उधर ही शराफ़त का कर देगी सुर्मा।
बढ़ेगी जिधर को जहालत की आतिश।

फ़राज़ आबे-उल्फ़त की ह़ाजत है इसको।
बुझेगी न फूंकों से नफ़रत की आतिश।

ऐसा गुमां तो दिल को कभी भी हुआ न था

ऐसा गुमां तो दिल को कभी भी हुआ न था।
वो बे-वफ़ा है!हम को पता बा-ख़ुदा न था।

उस से तअ़ल्लुक़ात हुए ख़त्म इस लिए।
सब कुछ था उस में दोस्तो रंग-ए-वफ़ा न था।

दिल पर गिरां गुज़रता जो सरकार आप के।
ऐसा तो हमने कोई भी मैसेज किया न था।

कैसे कहें वो सख़्त था या नर्म दोस्तो।
देखा था हमने आंख से उसको छुआ न था।

रूठे हुए थे वो ही मिरे ह़ाले-ज़ार से।
मैं तो किसी भी दौर में उन से ख़फ़ा न था।

बर्बादियों का मेरी,मिरी जान जाने-जां।
रंज-ओ-मलाल आप के रुख़ पर ज़रा न था।

अल्लाह जाने कैसे अ़यां हो गया फ़राज़।
वो राज़ जो किसी से अभी तक कहा न था।

जहां हो सदा तेरी रह़मत की बारिश

जहां हो सदा तेरी रह़मत की बारिश।
वहां क्यों न हो ऐश ओ इ़शरत की बारिश।

ज़माने में कोई भी तुझसा नहीं है।
यूं करते हैं सब तुझ पे मिदह़त की बारिश।

जहां ज़िक्र हो सब के होठों पे तेरा।
वहां क्यों न हो नूरो-निकहत की बारिश।

जहां काम करते हैं सब दिल लगा कर।
वहां हो के रहती है दौलत की बारिश।

सलामत रहे जब तलक दिल की दुनिया।
करें आओ सब पर इ़नायत की बारिश।

सितम ही सितम रोज़ ढाता है ज़ालिम।
किसी दिन तो कर तू मुह़ब्बत की बारिश।

रुला कर मुझे ख़ुद भी रोते हैं वल्लाह।
वो करते हैं जिस दम शिकायत की बारिश।

वो थे तो बरसते थे बादल ख़ुशी के।
गयी साथ उन के मुसर्रत की बारिश।

ग़म ए ज़िन्दगानी से तंग आ चुके हम।
फ़राज़ अब हो हम पर भी फ़रह़त की बारिश।

कहता है जो भी कहने दे तन्नाज़ पर न जा

कहता है जो भी कहने दे तन्नाज़ पर न जा
अन्जामे-इ़श्क़ देख तू आग़ाज़ पर न जा।

दिल का लहू निचोड़ के लाया हूं बज़्म में।
अशआ़र मेरे देख तू आवाज़ पर न जा।

अल्फ़ाज़ तेरे दिल में उतर जआएंगे मिरे।
मफ़हूम देख गीत का तू साज़ पर न जा।

कर देगा राज़ फ़ाश तिरे घर के आन में।
हम-राज़ ले के राज़ तू ग़म्माज़ पर न जा।

मैं काम कर रहा हूं अदब के मुह़ाज़ में।
मेहनत को मेरी देख तू ऐज़ाज़ पर न जा।

काटेगा तेरे हिज्र में हर लम्हा यह उसे।
तन्हा तू घर को छोड़ के शहनाज़ पर न जा।

किरदार ख़ूब हो तो बसा ले निगाह में।
यूं ही किसी ह़सीं के तू अन्दाज़ पर न जा।

वुसअ़त ख़ला की देख,न कर भूल ऐ फ़राज़।
ओछे हैं पंख तेरे तू परवाज़ पर न जा।

चन्द लम्ह़ात की कहानी है

शाख़े-गुल पर जो यह जवानी है।
चन्द लम्ह़ात की कहानी है।

लाख इसकी करो ह़िफ़ाज़त तुम।
डोर साँसों की टूट जानी है।

ज़र्ब तो हमको आयी है यारो।
उन की आंखों में कैसे पानी है।

नाम को मौत भी नहीं खाती।
ज़िन्दगी ही तो सिर्फ़ फानी है।

अपने हाथों में फिर ज़हे-क़िस्मत।
चार इक्के हैं एक रानी है।

क़द्र जानी न वक़्त की जिसने।
उसको ठोकर ज़रूर खानी है।

कितना दिलकश समा है देखो तो।
फूल महके हैं धूप धानी है।

जब भी ख़ाली फ़राज़ बैठेगा।
याद तो आप ही की आनी है।

कैसे न बद-शुगूनी हो फिर उनके माल में

कैसे न बद-शुगूनी हो फिर उनके माल में।
मटरे की दाल बेचे हैं अरहर की दाल में।

आया न फ़र्क़ कोई भी जब मेरी चाल में।
साथ उसने मेरा छोड़ दिया दो ही साल में।

बे-बात के भी दाद दिए जा रहे थे सब।
कुछ शाय़रात बैठी थीं चुप-चाप हाल में।

दो चार चीज़ क्या हैं मिरी जान जाने-जां।
तुझ सी हज़ार मछली हैं मछुए के जाल में।

रखता है यह शुगर को भी हर वक़्त नार्मल।
दांतों का भी इ़लाज है कीकर की छाल में।

गाली से बात करता है हर आदमी यहां।
पछता रहा हूं बैठ के मलुआ की टाल में।

इतराओगे ज़ियादा तो जाओगे जेल तुम।
रहते हो जैसे रहते रहो अपनी खाल में।

वो भी फ़राज़ मिलने लगे पार्कों में अब।
मुंह को छुपाए रहते थे कल तक जो शाल में।

गले मुझको अपने लगा कर तो जाओ

गले मुझको अपने लगा कर तो जाओ।
कहां जा रहे हो बता कर तो जाओ।

निगाहें तो डालो ज़रा बे-बसी पर।
तरस कुछ तो खाओ मिरी ज़िन्दगी पर।
सुकून-ए-जिगर के लिए जाने-जानां।
निगाहों के साग़र पिला कर तो जाओ।
कहां जा रहे हो बता कर तो जाओ।
गले मुझको अपने लगा कर तो जाओ।

मुझे ह़ाल दिल का सुनाओ तो दिलबर।
ख़फ़ा क्यों हो मुझसे बताओ तो दिलबर।
न जाओ रुला कर मुझे ऐसे हमदम।
मिरी चश्मे-नम को हंसा कर तो जाओ।
कहां जा रहे हो बता कर तो जाओ।
गले मुझको अपने लगा कर तो जाओ।

ये ज़ह्र-ए-ग़म-ए-इ़श्क़ पीना है मुश्किल।
तुम्हारे बिना मेरा जीना है मुश्किल।
क़दम अपने आगे बढ़ाने से पहले।
यक़ीं वापसी का दिला कर तो जाओ।
कहां जा रहे हो बता कर तो जाओ।
गले मुझको अपने लगा कर तो जाओ।

गले मुझको अपने लगा कर तो जाओ।
कहां जा रहे हो बता कर तो जाओ।

बात उनकी जो चल रही है अभी

बात उनकी जो चल रही है अभी।
यूं तबीअ़त बहल रही है अभी।

क्यों न पटकें ये ज़ुलमतें सर को।
शम्अ़ चाहत की जल रही है अभी।

अ़क़्द हो किस तरह मिरा उनसे।
उन की निय्यत बदल रही है अभी।

वस्ले-जानां की क़ल्बे-मुज़तर में।
हर तमन्ना मचल रही है अभी।

तोड़ कर प्यार के ह़सीं रिश्ते।
वो ख़ुशी से उछल रही है अभी।

कहते-कहते वो रुक गए जिसको।
बात वो ही तो खल रही है अभी।

फिर न रोकूंगा बस ज़रा ठहरो।
रूह़ तन से निकल रही है अभी।

सब की रख ली फ़राज़ उसने,पर।
बात अपनी ही टल रही है अभी।

जुलबाज़ों की क़ौम के कुछ ग़द्दारों की

जुलबाज़ों की क़ौम के कुछ ग़द्दारों की।
छोड़ो बातें करनी अब मक्कारों की।

हर सू हैं जो झगड़े मन्दिर-मस्जिद के।
चाल है यह सब धर्म के ठेकेदारों की।

जाग रही है धीरे-धीरे सब जनता।
ख़ैर नहीं है मुल्क में अब अ़य्यारों की।

नादानों क्यों इन पे भरोसा करते हो।
एक ही जैसी लत है सब सरकारों की।

क़ौम के ग़म में कितने परेशां हैं लीडर।
देखो तो तुम सूरत इन बेचारों की।

कल जिन में रोशन रहती थीं क़न्दीलें।
ह़ालत ख़स्ता है अब उन मीनारों की।

तुमने ही गर फेर लीं हम से नज़रें तो।
कौन ख़बर लेगा फिर इन बीमारों की।

क़ह्र-ए-इलाही नाज़िल जिसदम होता है।
बुनियादें हिल जाती हैं दरबारों की।

बे-फ़न हर सू फन मारे फिरते हैं फ़राज़।
क़द्र कहां अब दुनिया में फ़नकारों की।

हो न पाया कोई राब्ता शाम तक

हो न पाया कोई राब्ता शाम तक।
मैं उन्हें ढूंढता ही रहा शाम तक।

और कर लेगा वो फ़ास्ला शाम तक।
भूल जाएगा मेरा पता शाम तक।

अब ही आ कर दिला दो दवाई मुझे।
दर्द हो जाएगा दो गुना शाम तक।

तू न आया तो फिर लौट जाना पड़ा।
मैं ने देखा तिरा रास्ता शाम तक।

मुस्कुराऊंगा कब तक तिरे हिज्र में।
घेर लेगी ग़मों की रिदा शाम तक।

कब तलक दिल को रोशन रखेगी मिरे।
सुब्ह हो जाएगी ख़ुद ख़फ़ा शाम तक।

राह में हम ने रख-रख के देखा है जी।
टूट जाता है हर आइना शाम तक।

मैं फ़राज़ उस के आंगन में बैठा रहा।
ह़ाल पूछा न उस ने मिरा शाम तक।

जो हो जैसा उसे वही कहना

जो हो जैसा उसे वही कहना।
मतलबी हो तो मतलबी कहना।

क्या मुनासिब है बोलिए यारो।
इक निबोरी को रसभरी कहना।

वक़्ते-आख़िर है ऐ मिरे क़ासिद।
जा सलाम उनसे आख़िरी कहना।

एक बातिल को साह़िब-ए-ईमां।
हमने सीखा नहीं कभी कहना।

क्या किसी तौर से ये जाइज़ है।
सर झुकाने को बन्दगी कहना।

आ़म है आज कल सियासत में।
घर के लोगों को अजनबी कहना।

हमने शम्अ़-ए-वफ़ा से सीखा है।
जां लुटाने को ज़िन्दगी कहना।

कब है आसान एक मिसरे में।
क़ल्बे-मुज़्तर की बेकली कहना।

ऐ फ़राज़ उन का यह ही शेवा है।
मेरी चाहत को दिल-लगी कहना।

भेज कोई ह़सीं सई फिर से

भेज कोई ह़सीं सई फिर से।
चोट दे-दे मुझे नई फिर से।

फिर बुला दे मिरे मसीहा को।
दर्द उठने लगे कई फिर से।

चांद मद्धम सा लग रहा है क्यों।
दूर कर दे तू यह रई फिर से।

बात कहने से पेश्तर अपनी।
ग़ौर कर लीजिए भई फिर से।

किसकी जादूगरी है यह यारो।
उसकी मत कैसे फिर गई फिर से।

दूर क्यों कर न होगी यह नफ़रत।
आओ मिल कर करें सई फिर से।

लाख सब ने मना किया लेकिन।
उसने पेशा चुना पई फिर से।

यौमे-मज़दूर सब मनाएंगे।
आने वाली है इक मई फिर से।

भूल फिर से फ़राज़ कर बैठा।
दर-गुज़र कर ख़ता दई फिर से।

ह़ुस्न जलवे दिखाता रहा रात भर

ह़ुस्न जलवे दिखाता रहा रात भर।
इ़श्क़ नग़मे लुटाता रहा रात भर।

दिल का दीपक जलाता रहा रात भर।
मैं ग़ज़ल गुनगुनाता रहा रात भर।

उन को दुल्हन बना कर तसव्वुर में,मैं।
मन ही मन मुस्कुराता रहा रात भर।

जलवागर क्या हुए वो ज़रा बाम पर।
चांद मुखड़ा छुपाता रहा रात भर।

आप सोते रहे चैन से और,मैं।
दर्द से तिलमिलाता रहा रात भर।

उन की परतो से ले कर किरन नूर की।
घर मिरा जगमगाता रहा रात भर।

उन की यादों का फिर ज़ह्नो-दिल में मिरे।
इक दिया झिलमिलाता रहा रात भर।

दिल ख़यालों-ख़यालों में ही ऐ फ़राज़।
नाज़ उन के उठाता रहा रात भर।

करने लगे वो कैसी सियासत बताइए

करने लगे वो कैसी सियासत बताइए।
नफ़रत को कह रहे हैं मुह़ब्बत बताइए।

ज़ालिम को दे रहे थे हिदायत बताइए।
कैसे न जाती आप की इ़ज़्ज़त बताइए।

क्यों कर न हो इस अम्र पे ह़ैरत बताइए।
बिकने लगी टकों में अ़दालत बताइए।

जाने की ज़िद पे आप अड़े हैं जनाबे-मन।
कैसे न गुज़रे दिल पे क़यामत बताइए।

तालीम जितनी आ़म हुई जा रही है अब।
उतनी ही बढ़ रही है जहालत बताइए।

चश्मा चढ़ा रखा था तकब्बुर का नाक पर।
कैसे न होती आप की दुर्गत बताइए।

हर दिन मुक़ाम अपना बदलती है दोस्तो।
कब इक जगह पे टिकती है दौलत बताइए।

चल देगी पीछे-पीछे मिरी जान जाने-मन।
कैसे करूं मैं आप को रुख़सत बताइए।

इतना शरारती तो कोई दूर तक न था।
आयी कहां से आप में यह लत बताइए।

माना न कहना आप ने मां-बाप का कभी।
पड़ती न कैसे आप को दिक़्क़त बताइए।

कोई अ़मल भी आप का अच्छा नहीं फ़राज़।
कैसे मिलेगी आप को जन्नत बताइए।

तू ही दिल की आर्ज़ू है तू ही ज़िन्दगी है मेरी

तू ही दिल की आर्ज़ू है तू ही ज़िन्दगी है मेरी।
तू सुकून है नज़र का तू ही हर ख़ुशी है मेरी।

तिरा संग राह़ते-जां तिरा प्यार दिल का दरमां।
तू शराबे-ज़िन्दगी है तू निगाहों का है अरमां।
तुझे सोचने की धुन में कहीं हो न जाऊं पागल।
तू ही बे-ख़ुदी है मेरी तू ही मयकशी है मेरी।
तू ही दिल की आर्ज़ू है तू ही ज़िन्दगी है मेरी।

बिना तेरे एक पल भी मुझे चैन कब है दिलबर।
मिरा दिल जला रहा है तिरे हिज्र का ये मन्ज़र।
तुझे किस तरह भुला दूं मुझे तू ही यह बता दे।
तू ही तिशनगी है मेरी तू ही बे-कली है मेरी।
तू ही दिल की आर्ज़ू है तू ही ज़िन्दगी है मेरी।

तिरी दीद रूह़े-अफ़ज़ा तिरी याद है इ़बादत।
तिरा वस्ल मेरी जन्नत तिरा हिज्र है क़यामत।
तुझे देखकर ही मिलता है सुकून चश्मे-तर को।
तू ही आ़शिक़ी है मेरी तू ही शायरी है मेरी।
तू ही दिल की आर्ज़ू है तू ही ज़िन्दगी है मेरी।

तू ही दिल की आर्ज़ू है तू ही ज़िन्दगी है मेरी।
तू सुकून है नज़र का त ही हर ख़ुशी है मेरी।

नया चोला बदल कर देखना था

नया चोला बदल कर देखना था।
तुम्हें शीशे में ढल कर देखना था।

ह़क़ीक़त जाननी थी गर हमारी।
हमारे साथ चल कर देखना था।

नज़र आ जाते तुमको भीड़ में हम।
ज़रा सा बस उछल कर देखना था।

बुलाया था हमें जब अपने दर पर।
तुम्हें बाहर निकल कर देखना था।

बहल जाता यक़ीनन क़ल्बे-मुज़तर।
किसी शय से बहल कर देखना था।

वकीलों से सबक़ लेना था तुम को।
अगर सच को निगल कर देखना था।

अमर हो जाते मिस्ल ए शम्अ़ हर सू।
किसी के ग़म में जल कर देखना था।

फ़राज़ आख़िर ये लापरवाही कैसी।
गिरे थे तो संभल कर देखना था।

दिलों में है सब के ठिकाना तुम्हारा

दिलों में है सब के ठिकाना तुम्हारा।
ज़माने के तुम हो ज़माना तुम्हारा।

सलीक़े से खींचो कमां जाने-जानां।
ख़ता हो न जाए निशाना तुम्हारा।

कलाई तो छोड़ो कोई देख लेगा।
बहुत ख़ूब है यह बहाना तुम्हारा।

करूं किस अदा की मैं तारीफ़ वल्लाह।
है अन्दाज़ हर इक शहाना तुम्हारा।

लबों की हंसी हो के हों नाज़ो-ग़मज़े।
हर इक ढंग है क़ातिलाना तुम्हारा।

न भूलेगी दुनिया कभी जाने-जानां।
कहानी हमारी फ़साना तुम्हारा।

ख़याल इसका रखना हर इक शय से बढ़ कर।
ये इ़ज़्ज़ो-क़िरा है ख़ज़ाना तुम्हारा।

यही आर्ज़ू है दिल-ए-मुज़तरिब की।
सफ़र उम्र का हो सुहाना तुम्हारा।

फ़राज़ अपने अशआ़र भूले हुए हूं।
किया याद जब से तराना तुम्हारा।

ह़ुस्ने-नख़वत है तेरी अंगड़ाई

ह़ुस्ने-नख़वत है तेरी अंगड़ाई।
क्या क़यामत है तेरी अंगड़ाई।

बिन पढ़े भी जो लुत्फ़ देती है।
वो इ़बारत है तेरी अंगड़ाई।

किससे इसकी मिसाल दूं हाय।
रश्के-नुज़हत है तेरी अंगड़ाई।

तेरी हर इक अदा से जान-ए-जां।
बेश-क़ीमत है तेरी अंगड़ाई।

रश्क आता है देख कर इस को।
जामे-इशरत है तेरी अंगड़ाई।

क्यों न भाय निगाह को जानां।
मिस्ले-ख़िलअ़त है तेरी अंगड़ाई।

पल में दिल को ख़रीद लेती है।
कैसी दौलत है तेरी अंगड़ाई।

चुपके-चुपके जो गुदगुदाती है।
वो शरारत है तेरी अंगड़ाई।

और क्या क्या कहूं भला इसको।
शाने-ज़ीनत है तेरी अंगड़ाई।

हर मुसव्विर फ़राज़ कहता है।
जाने-नुदरत है तेरी अंगड़ाई।

कैसे कहता मैं हाले-रुस्वाई

कैसे कहता मैं हाले-रुस्वाई।
कर गया चुप मलाले-रुस्वाई।

रोकने से भी रूक नहीं पाया।
ऐसा फैला वबाले-रुस्वाई।

आप जो आज मुझसे वाक़िफ़ हैं।
यह है सारा कमाले-रुस्वाई।

रब ही जाने के हश्र क्या होगा।
बढ़ रहा है हिलाले-रुस्वाई।

उसको रुस्वाई से बचाने को।
औढ़ ली मैंने शाले-रुस्वाई।

तूने मशहूर कर दिया मुझको।
शुक्रिया ऐ नवाले-रुस्वाई।

वो रहा दूर सब गुनाहों से।
जिसने रक्खा ख़याले-रुस्वाई।

जिसने इसको फ़राज़ झेला है।
वो ही देगा मिसाले-रुस्वाई।

देख लेता जो ग़ारे-तन्हाई

देख लेता जो ग़ारे-तन्हाई।
दिल न होता निसारे-तन्हाई।

रास आयीं न मेह़फ़िलें जिनको।
हो गए वो शिकारे-तन्हाई।

रुख़ से उतरा न आज तक यारो।
ऐसा छाया ग़ुबारे-तन्हाई।

इससे पहले ये तोड़ दे हमको।
तोड़ दो तुम ह़िसारे-तन्हाई।

हो गए वो असीरे-रौनक़ सब।
जो न समझे वक़ारे-तन्हाई।

यह ही ग़म खाए जाता है दिल को।
कैसे उतरे ख़ुमारे-तन्हाई।

कैसे भाए उसे कोई मजलिस।
जिसको भायी बहारे-तन्हाई।

फिर सुना दो ग़ज़ल कोई हमको।
फिर सजा दो दयारे-तन्हाई।

आप रूठे फ़राज़ क्या हमसे।
हो गए हम मज़ारे-तन्हाई।

शेअ़र कहना सिखा दिया हमको

शेअ़र कहना सिखा दिया हमको।
तुम ने शाइ़र बना दिया हमको।

ख़्वाब रक़सां थे उनके आंखों में।
तुम ने क्यों कर जगा दिया हमको।

अच्छा चलते हैं जान यह कहकर।
आप ने तो डरा दिया हमको।

हम ने जिससे भी तेरा घर पूछा।
उसने आगे बढ़ा दिया हमको।

याद आते हैं आप ही हर पल।
आप ने क्या करा दिया हमको।

तुम ने आवाज़ दे के खिड़की से।
फिर तमाशा बना दिया हमको।

हम तो भूले न तुमको ऐ दिलबर।
तुम ने कैसे भुला दिया हमको।

जाने क्या सोच कर फ़राज़ उसने।
अन्जुमन से उठा दिया हमको।

सूरज की क्या धूप खिली रे

सूरज की क्या धूप खिली रे।
रजनी की फिर नींद उड़ी रे।

धरती जागी,अम्बर जागा।
झील का प्यारा मंजर जागा।
बुलबुल ने क्या गाए नग़मे।
सबके दिल की पीर घटी रे।
रजनी की फिर नींद उड़ी रे।

बातिल जागे,सच्चे जागे।
नींद में ग़ाफ़िल बच्चे जागे।
मद्धम-मद्धम,होले-होले।
जीवन की क्या नाव चली रे।
रजनी की फिर नींद उड़ी रे।

मस्त हवा के झोखे आए।
सागर में तन धो के आए।
टकराए जब कलियों से ये।
फूलों की तब डाल सजी रे।
रजनी की फिर नींद उड़ी रे।

सूरज की क्या धूप खिली रे।
रजनी की फिर नींद उड़ी रे।

पानों की होड़ ऐसी लगी ख़ास-गान में

पानों की होड़ ऐसी लगी ख़ास-गान में।
तिनका तलक न छोड़ा मिरे पान-दान में।

मीठे का मान घट गया किस दर्जा देखिए।
केले क़सीदे पढ़ते हैं भिंडी की शान में।

कंजूस अब तो खा ले मुरब्बा निकाल कर।
आने लगी फफूंदी तिरे मर्तबान में।

रेज़े भी मिल न पाएंगे दो चार दिन के बाद।
काग़ज़ की नाव छोड़ो न यूं आब-दान में।

हरगिज़ न बास जाएगी माही के जिस्म की।
चाहे डुबो के रख दो इसे ज़ाफ़रान में।

शेरों से कल जो लड़ते थे आंगन में दोस्तो।
ख़ुश हैं वो चूहे फांस के अब चूहे-दान में।

खाने की शय मिलेगी मुक़र्रर जगह पे बस।
लेकिन शराब पाओगे अब हर दुकान में।

धरती पे ही लगाने को कम पड़ गए फ़राज़।
क्या ख़ाक झंडे गाड़ें वो अब आसमान में।

सह़रा में बहरो-बर में मकीन-ओ-मकान में

सह़रा में बहरो-बर में मकीन-ओ-मकान में।
कोई नहीं है आप सा गुल गुल्सितान में।

ज़ुल्म-ओ-जफ़ा पे आज कोई बोलता नहीं।
क्या आबले पड़े हैं सभी की ज़ुबान में।

फ़रमाने-मुस्तफ़ा से भी मोड़े हुए हो मुंह।
इ़ल्म-ओ-हुनर से दूर हो तुम किस गुमान में।

क़दमों पे कोई ज़ोर नहीं ठीक है मगर।
नज़रें तो अपनी रखिए मियां आसमान में।

निकले जो सच तो लुत्फ़ ही आ जाए दोस्तो।
इक बात ऐसी कह के गए हैं वो कान में।

बख़्शी है जैसी आप को अल्लाह ने ह़ुज़ूर।
ऐसी महक कहां है गुल-ए-ज़ाफ़रान में।

सच्ची लगन से करते हैं मेह़नत जो रात-दिन।
वो पास हो के रहते हैं हर इम्तिहान में।

ख़ुश्बू तलाश करता है इन में तू किस लिए।
सब फूल काग़ज़ी हैं तिरे फूल-दान में।

हर वक़्त शेअ़रो-शायरी करते हो ऐ फ़राज़।
तुम सा निकम्मा कोई नहीं ख़ानदान में।

क़ल्बे-मुज़तर भी मिरा मिस्ले-शहाना ख़ुश है

क़ल्बे-मुज़तर भी मिरा मिस्ले-शहाना ख़ुश है।
आप क्या आए इधर माहे-शबाना ख़ुश है।

यह हवा ख़ुश है फ़िज़ा ख़ुश है ज़माना ख़ुश है।
चूम कर आप को ख़ुश्बू का ख़ज़ाना ख़ुश है।

दूर थे आप पहुंच से तो था ना-शाद बहुत।
आप को छू के निगाहों का निशाना ख़ुश है।

आप से क़ब्ल थे उतरे हुए चेहरे दिलबर।
देख कर आप को अब सारा घराना खुश है।

यूं ही लहराते रहो ज़ुल्फ़े-गिरह-गीर सदा।
आप की दीद से गुलशन का दहाना खुश है।

इ़श्क़ की बात ही क्या इ़श्क़ से हटकर भी यहां।
जल्वा-ए-ह़ुस्न से हर ठोर-ठिकाना ख़ुश है।

क्या असर आपकी आमद का है जान-ए-जानां।
साज़े-दिल का मिरे हर एक तराना ख़ुश है।

कोई सच्चाई पे फिर मिटने को राज़ी है फ़राज़।
कोई फिर कर के यहां झूठा बहाना ख़ुश है।

उदास क़ल्ब की,आंखों की बेकली के लिए

उदास क़ल्ब की,आंखों की बेकली के लिए।
किसी का साथ ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिए।

किनारा कर लिया दिलबर तमाम आ़लम से।
करूं मैं और बता क्या तिरी ख़ुशी के लिए।

कभी तलाश हंसी मुझको करती-फिरती थी।
बहाने ढूंढता हूं अब मैं खुद हंसी के लिए।

मैं उनकी याद में कुछ यूं भी खोया रहता हूं।
के उनकी याद ज़रूरी है शायरी के लिए।

ख़याले-यार को लफ़ज़ों में ढाल जाऊं बस।
ग़ज़ल कही है इसी फ़र्ज़े-मन्सबी के लिए।

फ़क़त ये सिर ही झुकना बहुत नहीं नादां।
झुकाना दिल भी ज़रूरी है बन्दगी के लिए।

कमा के आप ही खाया तो क्या किया मिस्टर।
कमा के देखिए दौलत कभी किसी के लिए।

फ़राज़ हम ही मिले थे उन्हें ज़माने में।
मिला न और कोई उनको दिल्लगी के लिए।

मानिए जाने-जां ह़क़ीक़त है

मानिए जाने-जां ह़क़ीक़त है।
आप का रूठना क़यामत है।

आना पड़ता है आप से मिलने।
क्या करें आप से मुह़ब्बत है।

वक़्त पर आप क्यों नहीं आते।
आप से बस ये ही शिकायत है।

कैसे उतरेंगे आप के अहसांन।
ज़िन्दगी आप की बदौलत है।

हम ग़रीबों का राग क्या यारो।
जिनपे दौलत है उनकी इ़ज़्ज़त है।

दूर जाया न कीजिए लिल्लाह।
आप की हर घड़ी ज़रूरत है।

क्यों बहाते हो बे-सबब पानी।
एक इक बूंद बेश-क़ीमत है।

जो मियां मिट्ठू बनते रहते हैं।
ऐसे लोगों से हम को नफ़रत है।

काम से काम रख फ़राज़ अपने।
काम वालों पे रब की रह़मत है।

नज़र मिलाते ही फ़र्शी सलाम कर देंगे

नज़र मिलाते ही फ़र्शी सलाम कर देंगे।
वो मेरे आगे निगाहों का जाम कर देंगे।

मैं यह ही सोच के उनके क़रीं नहीं जाता।
शराबे-शौक़ का वो ऐहतेमाम कर देंगे।

कहां ख़बर थी के अपना बनाके वो मुझको।
जहां के इ़श्क़ को मुझ पर ह़राम कर देंगे।

न ऐसे भीगिए बारिश की इन फ़ुहारों में।
थपेड़े सर्द हवा के ज़ुकाम कर देंगे।

ख़िलाफ़े-ज़ुल्म क़लम हम उठाएंगे जब भी।
तुम्हारे ज़ुल्म का क़िस्सा तमाम कर देंगे।

ज़रा सा वक़्त तो दे तू हमें ठहरने का।
तमाम शहर में उल्फ़त को आ़म कर देंगे।

निगाहें फेर लीं उस ने अगर किसी दिन भी।
दयारे-यार में रो-रो के शाम कर देंगे।

न कर सकेंगे शहंशाहे-वक़्त भी जिनको।
वो काम आप के अदना ग़ुलाम कर देंगे।

फ़राज़ कैसे मैं रह पाऊंगा ख़फ़ा उनसे।
अगर वो हंस के ज़रा भी कलाम कर देंगे।

तीरगी में रोशनी की बात थी

तीरगी में रोशनी की बात थी।
आप की आमद ख़ुशी की बात थी।

आप से कैसे बताते बोलिए।
आप ही की आ़शिक़ी की बात थी।

लौट आए ज़ोह्द के सह़रा से हम।
क्यों न आते मयकशी की बात थी।

आप कैसे क़ैद हो कर रह गए।
आप की तो सब से ऊंची बात थी।

आज तक रक़्स़ां है ज़ह्न-ओ-क़ल्ब में।
कितनी दिलकश उस परी की बात थी।

उम्र भर जिसने रुलाया दोस्तो।
प्यार की वो दो घड़ी की बात थी।

हम जिसे दिल से लगा कर रह गए।
वो भी उनकी दिल-लगी की बात थी।

क्यों बताऊं बात उसकी आप को।
ज़िन्दगी से ज़िन्दगी की बात थी।

वो भी क्या दिन थे मुह़ब्बत के फ़राज़।
हर घड़ी लब पर किसी की बात थी।

कुछ तरस चांद पर तो खाया कर

कुछ तरस चांद पर तो खाया कर।
चांदनी में न यूं नहाया कर।

दिल पे गिरती है मेरे बिजली सी।
होंठ दांतों में मत दबाया कर।

बे-ह़िजाबाना आके गुलशन में।
दिल गुलाबों के मत जलाया कर।

शर्म आती है इन उजालों को।
छत पे ज़ुल्फ़ें न यूं सुखाया कर।

ये किसी काम के नहीं होते।
हाथ ओछों से मत मिलाया कर।

तेरे दम से ही है फबन इसकी।
सह़ने-गुलशन में आया-जाया कर।

बस ग़रज़़ पर ही हंस के मिलता है।
बे-सबब भी तो मुस्कुराया कर।

बिन तिरे दिल कहीं नहीं लगता।
जल्दी-जल्दी फ़राज़ आया कर।

ह़क़ बात को लिखने की कला भूल गए हैं।

ह़क़ बात को लिखने की कला भूल गए हैं।
अब अहले-क़लम अपनी अदा भूल गए हैं।

कल दर्स जो देते थे ज़माने को वफ़ा का।
वो लोग भी अब तर्रज़े-वफ़ा भूल गए हैं।

चाहत के ह़सीं रेशमी फंदों में उलझ कर।
ज़ीरक भी यहां सम्ते-हवा भूल गए हैं।

तूफ़ाने-बला देख के आंखों से वो अपनी।
रंगीनी-ए-आ़लम का समा भूल गए हैं।

बे-वक़्त भी हम याद दिला देते थे सबको।
देखा है तुम्हें जब से दवा भूल गए हैं।

ह़ावी हुई है मग़रिबी तहज़ीब कुछ ऐसी।
अब नास़िहे-मुशफ़िक़ भी ह़या भूल गए हैं।

क्या सोच के यह बात कही आप ने हाय।
हम आप को ऐ माहे-लक़ा भूल गए हैं।

क्या बात है साक़ी तिरी मेह़फ़िल में बता दे।
वाइ़ज़ भी यहां ह़ुक्मे-ख़ुदा भूल गए हैं।

जिस रोज़ से झांका है फ़राज़ अपना गिरेबां।
उस रोज़ से हम सबकी ख़ता भूल गए हैं।

ह़सीं रुख़ से चिलमन हटा दीजिए अब।

ह़सीं रुख़ से चिलमन हटा दीजिए अब।
उजालों को रस्ता भुला दीजिए अब।

पता इनको मेरा बता दीजिए अब।
अंधेरों को दीपक दिखा दीजिए अब।

बड़े दिन से ह़ालात बिगड़े हुए हैं।
मुक़द्दर मिरा भी बना दीजिए अब।

रुलाते-रुलाते हुई एक मुद्दत।
दिल-ए-मुज़्तरिब को हंसा दीजिए अब।

न दीजे नई कोई तारीख़ लिल्लाह।
जो देनी है दिलबर सज़ा दीजिए अब।

ये है काम का वक़्त ऐ मेरे यारो।
जो सोए हैं उनको जगा दीजिए अब।

जो करता रहे दूसरे दीप रोशन।
फ़राज़ ऐसा दीपक जला दीजिए अब।

दर पे रहती हैं हर पहर आंखें।

दर पे रहती हैं हर पहर आंखें।
आप से कब हैं बे-ख़बर आंखें।

क्या बताऊं के आप की ख़ातिर।
रोज़ रोती हैं किस-क़दर आंखें।

आप जाते हैं जिस तरफ़ दिलबर।
घूम जाती हैं ख़ुद उधर आंखें।

भूल जाएंगी ख़्वाबे-जन्नत को।
आप को देख लें अगर आंखें।

कौन है आप के सिवा मेरा।
यूं चुराओ न हम-सफ़र आंखें।

इब्न जब तक पलट नहीं आते।
मां की रहती हैं दुआर पर आंखें।

इ़ल्म हो जाए कुछ मिरा शायद।
कीजिए तो ज़रा इधर आंखें।

जिस्म कहता है सो लिया जाए।
बन्द होतीं नहीं मगर आंखें।

आप की ऐ फ़राज़ अब मेरी।
राह देखेंगी उम्र-भर आंखें।

जब भी वो रास्ता बदलते हैं।

जब भी वो रास्ता बदलते हैं।
दिल के अरमान हाथ मलते हैं।

देख कर बे-वफ़ाई सावन की।
ख़ुश्क आंखों से अश्क ढलते हैं।

राह तकती हैं मन्ज़िलें उनकी।
जो तिरा नाम ले के चलते हैं।

शम्अ़ जलती है रात भर जैसे।
हम तिरे ग़म में ऐसे जलते हैं।

क्या करूं हाय अपने नैनों का।
ये तुझे देख कर बहलते हैं।

ह़ुस्न दिल खींचता है तेरा,पर।
तेरे अन्दाज़ हम को खलते हैं।

जब भी चलती है मस्त पुरवाई।
तेरी यादों के ज़ख़्म फलते हैं।

जितने मिटते हैं फ़ासले अपने।
हम फ़राज उतने ही मचलते हैं।

आप की ही क्या है हर अहल-ए-नज़र की सोच है

आप की ही क्या है हर अहल-ए-नज़र की सोच है।
वो ही ऊंचा है यहां पर जिसकी ऊंची सोच है।

हर बशर हो शादमां,हर आदमी हो बा-हुनर।
क़ाबिल-ए-तह़सीन है वो जिसकी ऐसी सोच है।

लाख कोशिश करले कोई उसकी रिफ़अ़त के तईं।
कैसे वो ऊंचा बनेगा जिस की नीची सोच है।

यह किताबी बात भी है तजरिबा भी है मिरा।
वो यहां बनता है वैसा जैसी जिसकी सोच है।

किस तरह़ कर पाओगे आख़िर तरक़्क़ी ऐ दोस्तो।
इस स़दी में आप की पिछली स़दी सी सोच है।

यह ही सुनते आए हैं दानिशवरों से हम सदा।
आदमी कुछ भी नहीं वो जिसकी उथली सोच है।

दुश्मनों को दर-गुज़र करना ही बेहतर है फ़राज़।
आप की जैसी भी हो मेरी तो यह ही सोच है।

ऐजाज़े-ह़ुस्न दिल की नज़र से न देखना।

ऐजाज़े-ह़ुस्न दिल की नज़र से न देखना।
रख देगा वरना तुम को बना कर ये बावरा।

लिल्लाह ऐसे देखो न क़ातिल निगाह से।
बे-वज्हा जां से जाएगा बीमार आप का।

फंसना न इसकी चाल में भूले से भी कभी।
दुनिया के रंग-ढंग पे सौ बार सोचना।

बेदार हो चुके हैं मुह़िब्बाने-अम्न सब।
बस हो चुकी अब आपके ज़ुल्मों की इन्तेहा।

दरकार जिनकी है वो सभी काग़ज़ात हैं।
मन्जूर होनी चाहिए अब अपनी इल्तिजा।

मिलते तो हैं वो मुझको मगर बोलते नहीं।
क्या जाने किस ख़याल में रहते हैं मुब्तिला।

तेरे सिवाय कोई भी आता नहीं नज़र।
किससे कहूं मैं जाके भला दिल का मुद्दआ़।

कुछ तो फ़राज़ लाज वो रखता मेआ़र की।
जो बोलना था बोलता पर हंस के बोलता।

कहानी ग़म की दोहराता रहूंगा।

कहानी ग़म की दोहराता रहूंगा।
दिल-ए-नादां को बहलाता रहूंगा।

लगा कर दिल से तेरे रंजो-ग़म को।
ग़म-ए-दुनिया को ह़िर्स़ाता रहूंगा।

वफ़ाएं क्या हैं जान-ए-जां मैं तेरी।
जफ़ाओं पर भी मुस्काता रहूंगा।

नताइज इ़श्क़ के निकले हैं ऐसे।
के अब ख़ुद पर ही झुंझलाता रहूंगा।

जबीन-ए-शौक़ तेरे दर पे रख कर।
मुक़द्दर अपना चमकाता रहूंगा।

करूंगा ऐसा कुछ ऐ जाने-जानां।
तिरा शैदाई कहलाता रहूंगा।

बला से बे-असर हो आह तुझपर।
जो फ़रमाना है फ़रमाता रहूंगा।

मह़ल सपनों के जो बिखरे हैं मेरे।
फ़राज़ अब उनको बनवाता रहूंगा।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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