बच्चों को यांत्रिक मानव न बनाएं

वर्तमान समय में अभिभावक बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के नाम पर उन्हें महंगे स्कूलों में भर्ती कराना, कोचिंग क्लास लगा देना मात्र अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लिया है। उनको गप्पे लड़ाना तास खेलना , पार्टियों में मौज मस्ती करने का तो समय होता है परंतु बच्चों के साथ बैठकर प्रेम से दो शब्द कहने का वक्त नहीं है।

एकल परिवारों में स्थित तो और दयनीय होती जा रही है। हमारे बुजुर्ग अनुभवों के पिटारा हुआ करते थे जो हमें एमबीए आदि कोर्स करने के पश्चात भी नहीं मिल पाता वह सारा ज्ञान बच्चे बड़े बुजुर्गों के संरक्षण में सीख लेते थे । बुजुर्ग एक प्रकार से घर के चौकीदार हैं ।

जब हमारा पैर फिसलने लगता है तो वह हमें सजग करते हैं । युवा पीढ़ी यदि उन बड़े बुजुर्गों का सहयोग ले तो छोटे बच्चों को सुधारा जा सकता है । जिन परिवारों में पति-पत्नी दोनों नौकरी पेसा होते हैं उनके बच्चों की तो जैसे सहमत ही आ जाती है।

नौकरानी या दाईं के द्वारा वह प्रेम नहीं मिल पाता जो एक मां अपने बच्चों को दे सकती है । अधिकांश दाइयां कभी-कभी बच्चों के साथ दुष्कर्म करने से भी बाज नहीं आती। भयभीत बच्चा धीरे-धीरे जिंदगी के हर मोड़ पर फिसलने लगता है । उसकी जिंदगी किसी नरक से कम नहीं होती ।

डर भय की प्रवृत्ति स्कूलों में भी पाई जाती है। यदि बच्चा होमवर्क या अन्य कोई कार्य नहीं कर पाया है तो उन्हें प्रेम से समझाने की अपेक्षा डराया धमकाया , डंडे से पीटना, मुर्गा बनाने की दादागिरी स्कूलों में आज भी व्याप्त है । कभी-कभी तो बच्चों के टट्टी पेशाब तक डर के मारे उतर जाती है । घर में भी हालत वही है । लड़ाई-झगड़ा , मारपीट उनके दिनचर्या में शामिल हो जाता है ।

आज बच्चों को घोड़ा समझ लिया गया है जो सोटा खाकर अपनी चाल बढ़ा देता है । ऐसे घुटन भरे वातावरण में बच्चों को सुनने वाला कोई नहीं मिलता ।उसे लगने लगता है कि जब माता-पिता एवं गुरु जी ही हमारे दुःख दर्द को समझ नहीं पा रहे हैं तो कौन समझेगा ? उसका व्यक्तित्व विखंडित हो जाता है।

धीरे-धीरे समाज से उसे घृणा उत्पन्न हो जाती है। एक सर्वेक्षण में भी देखा गया है कि जिन बच्चों को बचपन कुचला जाता है वही भविष्य में कुख्यात हत्यारे बनते हैं । जब ऐसे क्रिमिनल बच्चों के बचपन पर शोध किया गया जिन्होंने खेलने खानें की उम्र में कई कई जगह में हत्याएं की थी । उसका सार यही निकला कि इनका बचपन में मातृ पितृ सुख से वंचित रहना पड़ा।

आज समाज में पारिवारिक विघटन की समस्या भी विकराल बनती जा रही है । जिसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों को झेलना पड़ता है । नन्हे मुन्ने बच्चे यह नहीं समझ पाते की मम्मी पापा क्यों अलग-अलग रहते हैं । तलाक का प्रभाव बड़ी होती बेटियों पर और ज्यादा पड़ता है।

ऐसे में कभी-कभी बच्चे गलत मार्ग की ओर भटक जाते हैं। दिन-रात साथ-साथ मरने जीने की कसमें खाने वाला इन आधुनिक समाज के परिवारों का प्रेम न जाने क्षण भर में कैसे समाप्त हो जाता है । जिस प्रकार से हम वस्तुओं को बदलते हैं वैसे ही आज पति-पत्नी बदले जा रहे हैं । अपने लिए ना सही कम से कम अपने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए हम तलाक से बचें।

घर-घर में बात बात में होती तू तू, मैं मैं की किच-किच से भी कभी-कभी बच्चा तंग आ जाता है । अतः किच-किच से बचें। करियर चुनने में बच्चों की रुचि का ध्यान रखें । मात्र अपनी अपेक्षा ना लादे । बच्चों के ज्यादा अंकों में सफल होने के अपेक्षा उसकी सृजनात्मक क्षमता को प्रोत्साहन दें ।

यदि आप चाहते हैं कि बच्चे आपका सम्मान करें तो आप भी अपने माता-पिता का सम्मान करें ।क्योंकि बच्चे नीति गत बातों के पैसा व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।

शिक्षकों को भी केवल पाठ्य पुस्तक को ही नहीं पढ़नी चाहिए उसे सीखाना है , पढ़ाना नहीं। शिक्षकों को जीवन्त उदाहरण बनना होगा । बच्चों को विज्ञान, इतिहास, अंक गणित आदि पढ़ाने के बजाय शिक्षक की उन्हें नैतिक आचरण की शिक्षा अधिक देनी चाहिए । उसका चरित्र ऐसा विकसित करने का प्रयास करना चाहिए कि समाज का बुरे से बुरा प्रभाव भी उसे डिगा न सके।

पिता – माता एवं गुरु बच्चे के नेक आचरण के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं। ज्ञान से परिपूर्ण बच्चा पूरी तरह खिले हुए फूलों की तरह शोभायमान होता है । जिसकी मधुर गंध दूर-दूर तक फैल जाती है । सुगंध से आकर्षित होकर मधुमक्खियां के झुंड के झुंड उसके ज्ञान रूपी मधु का आनंद लेने के लिए इकट्ठे हो जाते हैं । ऐसे ज्ञान से परिपूर्ण बच्चा सदा सदा के लिए पूजा एवं याद किया जाता है।

अतः माताओं-बहनों ! सोचो ऐसी सैकड़ो गुतहीन बच्चे पैदा करें तो आपको खुशी नहीं होंगी और बच्चे भी खुश नहीं रहेंगे। गांधारी के सौ पुत्र थे । कुंती ने तीन पुत्रों को जन्म दिया । मां कौशल्या ने केवल एक पुत्र को। आप क्या बनना चाहेंगी ? गांधारी या कौशल्या ? निर्णय आपको करना है।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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