चरित्रहीन | Charitraheen
चरित्रहीन
( Charitraheen )
“घर आकर बताता हूँ”
जब जब उसने कुछ पूछना चाहा
हमेशा यही उत्तर मिला
और फिर कभी ना वो समय आया
ना ही उसे कुछ बताया गया।
उसे कभी नहीं लगा कि
वह भी किसी की ज़िंदगी का हिस्सा है।
दोनों कभी नहीं बन पाये
एक दूसरे के सहभागी,
बस एक दूसरे को ज़िम्मेदारी बन
ढोते रहे।
बिना ये सोचे कि
एक समय बाद ये बहुत बोझिल हो जाएगा
और अब वह ख़ुद को इतना मज़बूत नहीं पाती
कि और ज़्यादा उठा पाये इस बोझ को अकेले
हाँ! अकेले,
तुम शायद चौंक जाओगे इस पर
मगर इस सबमें दूसरा पक्ष कहीं था ही नहीं,
जब जब तुम्हें वहाँ होना चाहिए था
तुम कभी वहाँ हुए ही नहीं
तुमने उसे हमेशा अकेला छोड़ दिया
अपने युद्ध अकेले लड़ने के लिए
जब जब उसे चाहिए था तुम्हारा साथ
पलट कर देखने पर तुम कहीं नहीं थे
तुम खोये हुए थे अपनी व्यस्तताओं में
अपनी मजबूरियों में
जो असल में कभी थीं ही नहीं
हमेशा अपनी आज़ादी को मजबूरियों का नाम देते रहे
और स्त्री की आज़ादी को चरित्रहीनता का।
जब जब उसने अपने हक़ की बात की
तब तब तुमने बता दी उसकी हदें
जब जब उसने जीना चाहा अपने लिए
तब तब तुमने लगा दिये ना जाने कितने ही लांछन।
कितना आसान था ना
स्त्री के किरदार को नापना
जब जब वह ढल गई तुम्हारी रज़ा में
तब तब वह बन गई तुम्हारी जीवनसंगिनी
और जब जब उसने प्रश्न किए अपने हक़ के लिए
तब तब वह बन गई चरित्रहीन।
-गरिमा भाटी “गौरी”
फ़रीदाबाद, हरियाणा।

©️गरिमा भाटी “गौरी”







