चोंचलों की चकाचोंध में चूर चूर होती समाज

चोंचलों की चकाचोंध में चूर चूर होती समाज

मैं तो देख ही रहा हु और आप सभी ने भी देखा ही होंगा की आजकल हर व्यक्ति अपने बच्चो की शादियों में कुछ न कुछ नए चोंचले किये जा रहा है.. समझ रहे है न आप..! चोंचले.. दिखावा.. आडंबर.. जो वो है ही नही उसे प्रस्तुत करने के भाव.. आम भाषा मे कहे तो पगला गए है लोग.. ये वही लोग है जो झूठी शान दिखा कर एक दिन की वाह वाही लूटना चाहते है।

आइए इस पर हम गम्भीर हो कर विस्तृत चर्चा करते है.. गम्भीर शब्द इसलिए इस्तेमाल किया है कि कोई इस विषय को यू ही फिजूल न समझे.. तो बात हो रही है ब्याह की.. ब्याह की बिसात पर मोहरे इस कदर आगे बढ़ रहे है कि हर परिवार पिटा जा रहा है.. लोग भूल गए है वे दिन जब शादियों में असीमित खुशियां होती थी और खर्च इतना अल्प कि कोई चिंता नही.. मगर अब वे जमाने लद गए है.. टीव्ही पर शुरू नोटाँकी को लोग आत्मसात करने लगे है.. ब्याह का दूसरा नाम हल्दी, मेहंदी, संगीत संध्या, प्रिवेडिंग, इंट्री ओर बुफे भोजन हो गया है।

शादियां ब्याह पहले भी होते थे मगर तब यह इतने आडंबर लिए नही थे.. आज तो शादियों में एक साधारण आम आदमी भी इतना खर्च करता है कि उतनो पैसों में कोई उधोग खड़ा हो सकता है.. लोग क्या कहेंगे इस डर से कर्जबजारी हो कर भी वह यह सब दिखावा करना चाहता है।

टीव्ही धारावाहिकों ने उसकी अक्ल की धार को कुंद किया है.. उदाहरण के रूप में हम समझते है कि ब्याह में आजकल हल्दी कार्यक्रम होता है.. अब हल्दी का कार्यक्रम है तो सब लोगो के लिए पीले रंग की ड्रेसेस खरीदी जाती है.. शादी अभी हुई नही है मगर फिर भी लड़का लड़की एक साथ सोफे पर बैठे है और एक एक रिश्तेदार नाचते हुए आगे बढ़ता है और भावी दम्पति के गालों पर हल्दी लगाता है.. बैठने के लिए विशेष रूप से मंच बनाया सजाया जाता है.. डीजे पर गीत बजना जरूरी है.. फिर आये हुए मेहमानों के लिए नाश्ता पानी.. तो यह नई बीमारी घुस आयी है हमारे पारंपरिक रीति रिवाजों में.. अनावश्यक खर्च की पहली सीढ़ी जो कि कतई जरूरी नहीं है।

एक समय ऐसा भी था कि शादी हुए पांच दस साल होने के बाद भी पति पत्नी लोगो के सामने एक दूजे से बोलने से कतराते थे.. शर्माते थे मगर अब हालात दूजे है.. मैं प्रिवेडिंग की बात कर रहा हु.. शादी तय हो गयी है और अभी महीने दो महीने बाकी है फिर भी भावी दम्पति एक दूजे से मिलते है।

मेरी इन बातों से आप मुझे संकुचित मानसिकता वाला मनुष्य मत समझ लेना.. वे मिले, बातचीत करे यहां तक तो ठीक भी है मगर उनकी एकांत में मिलने की फिल्मे बनाई जाती है.. तस्वीरे उतारी जाती है यह थोड़ा अटपटा सा लगता है.. बात यहां भी नही रुकती है और आगे बढ़ती है.. ब्याह वाले दिन बड़े से पर्दे पर वह फिल्मे बताई जाती है.. कुछ अनकहे दायरों में हम स्वतः बंधे रहते आये है मगर अब दायरों से बाहर निकल न जाने किन आसमानों में उछलने लगे है।

यह कूद गहरी खाई में खत्म होंगी यह हम भूल चुके है.. भावी पति पत्नी की निजी फिल्मो को भला दुनिया को दिखाने का क्या तुक..? अच्छा कल्पना कीजिये प्रिवेडिंग होने के बाद कही किसी कारणवश रिश्ता टूट गया तो..! लड़के का कुछ न बिगडेगा मगर कन्या की मुसीबत होनी तय है.. ओर फिर फ़िल्म शूट करने वालो के साथ इन दोनों को ( लड़का लड़की ) अकेला कही अन्य शहरों में भेजना क्या उचित होंगा..?

एकांत क्या उन्हें नही ललचाएगा की अब कुछ आगे बढ़ ही जाते है.. लड़की जरूर थोड़ा कुन कुनाएँगी मगर लड़का उसे यकीन दिलाने में जरूर कामयाब हो जायेगा कि अब जब हमारी शादी हो ही रही है तो थोड़ा बहकते है तो कोई हर्ज नही.. ये क्षण भावी दम्पति के जीवन मे जहर घोल सकते है.. लड़की पर पति भविष्य में यह कह कर वार कर सकता है कि ज्यादा मत बोल, मुझे पता है तू कैसी है.. पुरूष आमतौर पर शक्की मिजाज होते है और यही वजह कई घरों के टूटने की वजह भी बनती है।

शादी जैसी गम्भीर रस्म को हमने मजाक बना रखा है.. लड़कियो की कमी की वजह से बेटी वाले आज शेर बने हुए है.. उनकी अपनी कई बेजा शर्त होती है जिन्हें लड़को वालो का मजबूरी मे मानना ही पड़ता है.. मेरे एक करीबी मित्र के बेटे की शादी में ऊपर लिखे सभी प्रसंगों को निभाया गया.. मैने मित्र से पूछा कि यह सब क्यो कर रहे हो तो उन्होंने बताया कि क्या करे.. लड़की वाले मान ही नही रहे थे.. हमारे सारे कार्यक्रम और यहां तक कि भोजन में क्या बनेगा और क्या नही बनेगा यह भी उनकी तरफ से ही तय हुआ है.. बेटे को जीवन साथी मिल जाये इसलिए हमने लड़की वालों की सारी बाते मानी.. मैने पूछा दहेज में क्या मिला तो उन्होंने गहरी सांस ले कर कहा दहेज देने के जमाने अब लद गए।

आजकल तो हम इतने आलसी हो गए हैं की हाथों में रचने वाली मेहंदी के लिए भी लड़के बुलाने लगे.. अनजान लड़के आते हैं और परिवार की महिलाओं, बहुओं ओर बेटियों के हाथों में मेहंदी लगाते हैं.. यह सब कोई मुफ्त में नही करता.. उस के लिए काफी पैसे चुकाने होते हैं।

कभी कभार यह खबरे भी आती है कि मेहंदी रचाने आया लड़का परिवार की किसी बेटी को ही ले उड़ा.. धन गया धर्म गया हमारे पूर्वजों ने यह कथन कुछ सोच समझ कर ही रचा होंगा न..! पहले तो आसपास की, परिवार की, रिश्तेदारों की महिलाएं आती थी.. खूब लोकगीत गाती थी और साथ ही साथ मे एक दूजे की मेहंदी भी रचाती थी.. बचपन मे मैने ऐसे कितने ही दृश्य देखे भी है और उस मे शरीक भी हुआ हूं.. बड़ा ही मजा आता था मगर अब परिपाटी बदली है.. महिलाओं के इस प्यारे से काम को लड़को ने छीन लिया है।

शादी में अब बुफे या बफे का चलन बहुत बढ़ गया है.. यह नॉर्वे की संस्कृति है हमारी नही.. हा कई जगह भिखारियों को जरूर खड़े खड़े भोजन दे कर रुखसत किया जाता है.. बफे में नाना प्रकार के व्यजंन बनाये जाते है.. मेहमान जूते चप्पल सहित अपनी थाली उठाये यहाँ वहा भटकते रहता है.. जूठे हाथ से ही मनचाही वस्तु उठाता है।

बफे करने वाले कई लोग आरोप लगाते है कि इतने सारे मेहमानों को पंगत में बैठा कर भोजन देना सम्भव नही है सो बफे रखा गया है.. मगर मैं इन बातों से सहमत नही हु.. बैठकर ओर पूरे मान सम्मान के साथ मेहमानों को भोजन कराया जा सकता है।

भोजन परोसने के लिए लड़को को काम पर रखा जा सकता है और बफे की अपेक्षाकृत यह कम खर्चीला भी होता है और मेहमानों को भी भोजन की पूरी तृप्ति मिलती है.. बफे में पानी पूरी ओर दोसा के स्टॉल पर भारी भीड़ रहती है ओर लोग खड़े रहते है कि कब उनका नम्बर आयेगा।

मुझे यह इंतजार बड़ा ही अपमानजनक लगता है और ऊपर से थाली के वजन से हाथ की कलाई दुःखती है वह दर्द तो मैं ही जानता हूं.. तो बचना चाहिए इस बफे से या बुफे से.. इस से आप की शान जरा भी नही बढ़ती बल्कि लोगो की रुसवाई ही नजर आती है हालिका सौजन्य वश कोई मुँह पर बोलता नही।

हम ऐसे दौर में आ गए है जहाँ हमारी अपनी बुध्दि ताक पर रख दी गयी है और भेड़चाल को मंजूरी.. टीव्ही धारावाहिकों में देख हम भी उस के पिछलग्गू बन रहे है.. सदियों पुराने हमारे रीति रिवाजों को तिलांजलि दी जा रही है यह बोलकर की अब जमाना बदल गया है।

बदलते जमाने के साथ तार्किक रूप से बदलने में कोई हर्ज नही मगर जो चीजे परिवार को तोड़ती है.. जो बातें समाज को अखरती है उसे अपनाने में कोई अक्लमंदी नही है..तो जागरूक बने.. ब्याह को ब्याह ही रहने दे.. इसे अपने जीवन का स्टेटस न बनाये।

आप ने शादी में कितने प्रकार के व्यंजन बनाये, किस होटल या लॉन में शादी की, कौन से बैंड बजाया या कैसे दूल्हा दुल्हन की एंट्री कराई दूसरे दिन कोई याद नही रखता.. हम स्वयं की शादी का सोचे कि क्या क्या मेहमानों को खिलाया था तो भी मैं दावा करता हु की अधिकांश लोगों यह पता नही होंगा.. तो फिर हमें यह सब चोंचलेबाजी क्यो करनी है..?

ब्याह के नाम पर फालतू के खर्च करना और फिर कर्ज के ब्याज में ही जिंदगी को धोना यह निरी मूर्खता है.. कोई धनी या अत्यधिक सक्षम ये सब करता है तो उस से प्रभावित नही होना है।

अपने धन का कई लोग बेजा प्रदर्शन करते है मगर हमे इस से बचना है.. शादी कम से कम खर्च में हो.. भारतीय संस्कृति की उस मे झलक हो यह प्रयत्न हमे करना है.. एक दिन के दिखावे के लिए उम्र भर उसका हर्जाना भरना यह कभी भी सही नही हो सकता.. अनेक अनेक धन्यवाद.

रमेश तोरावत जैन
अकोला
मोब 9028371436

“चोंचलों की चकाचौंध में चूर-चूर होती समाज” – रमेश तोरावत जैन द्वारा लिखित इस समीक्षा में भारतीय विवाह समारोहों में बढ़ते दिखावे और अनावश्यक खर्च पर चिंता व्यक्त की गई है। लेखक ने 24 मई 2018 को अकोला से यह समीक्षा लिखी थी।

लेखक का मानना है कि आजकल शादियाँ दिखावे का साधन बन गई हैं, जहाँ लोग झूठी शान और एक दिन की वाहवाही के लिए पागलों की तरह खर्च कर रहे हैं। वे शादियों में हल्दी, मेहंदी, संगीत संध्या, प्री-वेडिंग शूट, भव्य एंट्री और बुफे भोजन जैसे नए ‘चोंचलों’ के बढ़ते चलन की कड़ी आलोचना करते हैं।
लेखक के मुख्य बिंदु:

  • बढ़ता दिखावा और आडंबर: शादियों में अनावश्यक खर्च और दिखावा इतना बढ़ गया है कि एक साधारण आदमी भी कर्ज़ लेकर इन आयोजनों में शामिल होता है।
  • परंपराओं का क्षरण: पारंपरिक रीति-रिवाजों में नए और अनावश्यक खर्चों को जोड़ा जा रहा है, जैसे हल्दी के लिए पीले कपड़े खरीदना और डीजे पर नाचना।
  • प्री-वेडिंग शूट की आलोचना: लेखक प्री-वेडिंग शूट को “अटपटा” मानते हैं, क्योंकि यह भावी पति-पत्नी की निजी पलों को सार्वजनिक करता है। वे इसके संभावित नकारात्मक परिणामों पर भी प्रकाश डालते हैं, जैसे रिश्ता टूटने पर लड़की को होने वाली परेशानी और पति के शक्की स्वभाव का बढ़ना।
  • दहेज प्रथा का बदला रूप: लेखक बताते हैं कि दहेज का जमाना भले ही लद गया हो, लेकिन लड़कियों की कमी के कारण अब लड़की वाले शेर बन गए हैं और उनकी बेजा शर्तें लड़के वालों को माननी पड़ती हैं, जिसमें शादी का पूरा खर्च और भोजन तक लड़की वालों की मर्ज़ी से तय होता है।
  • मेहंदी लगाने वालों का चलन: पहले महिलाएं खुद मेहंदी लगाती थीं और लोकगीत गाती थीं, लेकिन अब अनजान लड़के आकर मेहंदी लगाते हैं, जिससे खर्च बढ़ता है और कभी-कभी सुरक्षा संबंधी समस्याएं भी पैदा होती हैं।
  • बुफे भोजन की आलोचना: लेखक बुफे को “नॉर्वे की संस्कृति” बताते हुए उसकी आलोचना करते हैं। वे इसे अपमानजनक और अव्यवस्थित मानते हैं, जिससे मेहमानों को असुविधा होती है। उनका मानना है कि बैठकर भोजन कराना अधिक सम्मानजनक और कम खर्चीला है।
  • टीवी धारावाहिकों का प्रभाव: लेखक का तर्क है कि लोग टीवी धारावाहिकों से प्रभावित होकर भेड़चाल चल रहे हैं और सदियों पुराने रीति-रिवाजों को “जमाना बदल गया है” कहकर तिलांजलि दे रहे हैं।
  • जागरूकता का आह्वान: लेखक समाज से अपील करते हैं कि वे जागरूक बनें और शादी को “स्टेटस” न बनाएं। वे कहते हैं कि शादी में किए गए खर्च और दिखावा अगले दिन कोई याद नहीं रखता, इसलिए फालतू के खर्च करके कर्ज में डूबना मूर्खता है।
    रमेश तोरावत जैन का यह लेख समाज को एक आईना दिखाता है और विवाह समारोहों में बढ़ती फिजूलखर्ची पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करता है। वे भारतीय संस्कृति की सादगी और कम खर्च में शादी करने के महत्व पर ज़ोर देते हैं।

अमरेश सिंह भदौरिया
प्रवक्ता हिंदी
त्रिवेणी काशी इ० कॉ० बिहार, उन्नाव

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