धन्यवाद ओ सूखे दरख़्त
राजस्थान का जो इलाका आज चमन बना हुआ है आधी शताब्दी के पहले अत्यधिक पिछड़ा हुआ क्षैत्र हुआ करता था.. मेवाड़ की भूमि पर अकाल का साया रहा करता था और लोगबाग रोजी रोटी के लिए महाराष्ट्र की और पलायन करने लगे थे।
बाबूजी भी जन्म भूमि छोड़ अकोला पहुँचे और वहीँ रम गए.. अकोला की माटी मे जीवन बिताया और उसी माटी मे वे समां गए.. सलूम्बर हमारा गांव था मगर पास मे करीब 15 की. मी. दूर इमनिया पाडला मे भी हमारा घर बार और खेती हुआ करती थी.. दादाजी अपने बैल ( जिसे की आम भाषा मे वहा पोटी कहा जाता था ) पर जरूरी सामान लाद कर गाव गाव जाते और बेपार् किया करते थे।
जैनत्व इतना कूट कूट के भरा हुआ था की दादाजी जौ का आटा पिसा कर उसे सेंक लेते थे और राह मे रात होने के पहले उसे सेंके हुए आटे मे पानी घोल कर उसी से अपना पेट भर लेते थे मगर कही अशुद्ध या रात को नही खाते थे.. रोज न जाने कितने की. मी. वे पैदल चलते और कोशिश यही होती की रात भले ही हो जाये मगर घर पंहुचा जाये।
आज मै पाडला गया तो राह मे एक तीराहा नजर आया.. तीराहे के ठीक बिच मे एक बुढा बरगद का पेड़ अपने तन पर कुछ् जवां पत्तियो को लपेटे खड़ा था.. बरगद को देख अहसास हुआ की शायद यह अपने जीवन के अंतिम दिनों से गुजर रहा है।
वह लगभग कंगाली की अवस्था मे था और चन्द पत्तो के आलावा उस के पास कोई दौलत न थी.. वह निर्धन प्रतीत हो रहा था.. मेरे कदम वहीँ ठिठक गए.. मै एक टक उसे निहारने लगा.. लग रहा था जैसे उस के और मेरे बिच मे कोई रिश्ता है।
मै विचारो मे उतरने डूबने लगा.. कैसा होंगा भूतकाल मे इस पेड़ का वैभव..? कैसे रहे होंगे सौ दोसो साल पुराने वे दिन..? क्या इस ने दादाजी और बाबूजी को देखा होंगा..?
क्या इसकी घनी छाव मे दादाजी ने कभी विश्राम किया होंगा..? मेरे अवचेतन मन मे काल करवटे बदलने लगा.. जिन पलो मे मेरा वजूद नही हुआ करता था वे पल वे क्षण सामने से दौड़ने लगे.. मै हैरान था मन की इस अजीबो गरीब दशा को देख।
लाखो साल बीत गए है मगर मानव मन के इस अदभूत स्वरूप को विज्ञान अब तक समज नही पाया है.. ये जीवन का वो लम्हा था जिस से हम सभी कभी न कभी दो चार होते ही है.. तभी मेरे कानो मे कोई फुसफुसाया.. बेटा क्या सोच रहे हो..?
मै चौक गया.. कोई भी तो नही था वहा.. फिर यह बोला कौन..? तभी मेरी नजर उस पेड़ पर पड़ी.. लगा की वह मुस्करा रहा है.. मै प्रश्नवाचक रूप मे उसे देखने लगा.. तभी और आवाज आयीं हाँ तुम्हारा अनुमान सही है.. मै ही बोल रहा हु।
तुम.. बूढ़े बरगद के पेड़ तुम बोल रहे हो मेरे मुह से कुछ शब्द फूटे.. मेरी अपनी कल्पना शक्ति मुज पर हावी हुई जा रही थी.. तभी और आवाज गूंजी अपने दादाजी के बारे मे सोच रहे हो..?
हाँ मै मन्त्र मुग्ध हो बड़बड़ाया।
मै जानता हु तुम्हारे दादाजी को.. पेड़ की और से फिर सरसराहट हुई.. तो बताओ न कुछ उन के बारे मे.. उन दिनों के बारे मे.. मै सम्मोहित सा बोला.. और फिर लगा की सारी पत्तिया.. डालियाँ एक साथ बोल पड़ी हो.. दादाजी बड़े मेहनती थे।
खूब मेहनत करते थे.. अपने बैल पर सामान रख गाँव गाँव जाते और व्यापार किया करते थे.. उन दिनों इक्का दुक्का गाड़िया चलने लगी थी मगर वे शहरों तक ही सिमित थी.. ग्रामीण अंचलो मे बैलगाड़ियां ही आवागमन का साधन थी.. दादाजी अलसभोर ही चल दिया करते थे.. जब भी यहाँ से गुजरते तो मेरे पास सुस्ताते जरूर थे।
अपने बैल को चारा पानी देते और खुद भी कुछ खा कर थोड़ी देर मेरी छाँव मे बैठते.. आते जाते राहगीरों की कुशलक्षेम पूछते.. तो किसी को भूखा देख अपने साथ खाने की मनुहार करते।
वे दिन इंसानी तरक्की के शुरूआती दिन थे और मशीनों की खटपट खटपट आवाजो से मानव का धीरे धीरे परिचय होने लगा था मगर यहाँ शांति थी.. बड़ी बड़ी बिल्डिंगे नही थी मगर खपरैल के घरो में चूल्हे से निकलता हुआ धुँआ बड़ा ही भला सा प्रतीत होता था।
शाम के समय यही से दुधारू जानवर रंभाते हुए अपने अपने ठिकानो पर जाते थे.. उन के गले मे बंधी घँटीयो से गूंजते सुर दिन भर की थकान को पल भर मे दूर कर देते थे.. तुम्हारे पिता भी कभी कभी दादाजी के साथ आते जाते थे.. तुम्हारे पिता की उम्र तो बच्चों सी थी मगर वे हमेशा शांत रहते थे।
आम बच्चों की शरारतो से रहित तुम्हारे पिता मुझे हमेशा कुछ मनन से करते हुए ही प्रतीत हुए.. तभी किसी ने मुझे पीछे से छुआ और बोला क्या बात है साहेब..? मेरी तन्द्रा भंग हुई.. मैने देखा एक व्यक्ति मुझे हैरानी से देख रहा था.. वह बोला क्या देख रहे हो इस पेड़ मे..?
मै कुछ न बोला और उसे यू ही हैरान छोड़ गाड़ी शुरू कर आगे बढ़ गया.. कुछ देर बाद मैने मुड कर देखा वह व्यक्ति वही खड़ा मुझे घूरे जा रहा था.. फिर मेरी नजर उस पेड़ पर पड़ी.. लगा मुझे देख मुस्करा रहा है.. तभी एक सरसराहट उस पेड़ की और से आयीं.. फिर आओगे न..!
मैने हजारो माँओ की ममता उस मे महसूस की.. मै मुस्कराया और बुदबुदाया हाँ.. आऊंगा.. जरूर आऊंगा.. बार बार आऊंगा.. और फिर मेरी गाड़ी हवा से बात करने लगी।

रमेश तोरावत जैन
अकोला
यह भी पढ़ें:-







