एक पत्र आप सभी के नाम
आज एक ऐसे विषय पर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ और एक मंच पर आमंत्रित कर रहा हूँ जो की हर समाज और जाति धर्म के लोगों के साथ हो रहा है। आधुनिकता के इस युग में वैसे तो पैसे की कोई भी कीमत नही है और न ही संस्कारों की, कीमत है तो उसके ग्लेमर और रुत्वे आदि की।
मैं आज एक ऐसी नारी की कहानी बताने जा रहा हूँ जिसने पैदा होने से लेकर मरने तक सिर्फ संघर्ष ही किया और फिर भी लोगों के दिलों में सही से जगह नही बना सकी। जब तक उसके हाथ पैर चलते रहे लोगों ने उसे बहुत ही उपयोग किया और बहुत कम पैसे देकर उसकी तारीफ के पुलनदे बांधे परंतु सही ठंग से उसकी मदद कभी भी नही की, न ही समाज और समाज के लोगों ने भी।
कहते लोग की घर में बेटी का जन्म होने पर लोग उसे लक्ष्मी दुर्गा और सरस्वती कहते है और लड़की सही में इसकी हकदार भी है क्योंकि वो घर परिवार को ऐसे जोड़ती है की आपको ये सब रूप उसमें नजर आते है। पढ़ाई लिखाई के साथ अच्छे संसकरो का उसमें भंडार होता है।
माँ-बाप के घर के बाद शादी उपरांत सोचती है की अब शायद उसकी किस्मत बदल जायेगी पर कभी कभी ये भी किसी लड़की के साथ नही होता और उसे वो संघर्ष की जिंदगी फिर से जीना पड़ती है जो वो माँ-बाप के घर में करती आई। सुसराल में और दबना पड़ता है क्योंकि गरीब के घर से आई।
संसार की रीत रिवाजाओं के कारण यहां भी उसका शोषण होता है। जब तक संयुक्त परिवार में रहती है उसे कोलू के बैल की तरह जोते रहते है और अंत में अलग होकर सोचती है की कुछ तो राहत की सांस मिलेगी पर पति भी ज्यादा कुछ नही कमा पाता तो उसे ही काम काज करने का निर्णय लेना पड़ता है।
बच्चों के साथ समाज के लोगों के घरों मे रोटी बनाना, पापड़ बेलना, और भी घरों के छोटे छोटे से काम करके जैसे तैसे घर चलती है और कुछ पैसे बचाकर अपने सुसराल वाला काम अपने बेटे से ठेला लगवाकर उसे रोजगार से लगती है और उसमें उसे अच्छी सफलता मिलती है।
परंतु कहते है की किस्मत में उसके सुख न लिखा हो तो उसे कैसे मिल सकता है। पैसे ज्यादा आवगक होने के कारण बेटे में पीने की आदत लग जाती है जितना पैसा ठेले से कमाता रात को दारू पीना और दोस्तों को पिला देने में उड़ाने लगा। लाख समझाने पर भी वो नही मना और अंत में ठेला भी बंद हो गया कुल मिलाकर जहाँ से चले वही फिर आ गये।
माँ की हालत वो ही की वो रही। समय निकलता गया और माँ ने जैसे तैसे दो बेटियों के विवाह अच्छे बड़े घरों में हो गये क्योंकि बेटी बहुत ही सुंदर दिखती थी तो बड़े घरों से रिश्ते आये और दोनों तरफ का खर्च उठाकर विवाह करके ले गए। इस दौर पति बीमार हो गया और उसकी जो छोटी नौकरी थी वो भी चली गई।
अब पति घर में बीमार, बेटा निकम्मा और पीने वाला। उस नारी का दर्द आप सोचकर देखिये और मेहसूस कर सके तो करके देखे साथ ही उसकी बढ़ती उम्र और घर पूरा उसी पर निर्भर।
समय ने फिर से करवट ली पति का निधन हो गया बेटा ने किसी अलग जाति वाली दो बच्चों की माँ से शादी कर ली जो की समय की मांग थी की कैसे भी मेरा विवाह हो जाये माँ उसे खुशी से बेटी की खुशी के लिए स्वीकार कर लिया। सोच शायद बेटा बहू कर जाने से सुधार जाए। परंतु वो तो माँ से अलग हो गया। आप देखो भाग्य का खेल उम्र बड़ी और घर में अकेली फिर संघर्ष करती उसकी जिंदगी।
एक दिन जीवन का सबसे बुरा दिन भी आया की कोई घाव के कारण उस नारी का पैर काटना पड़ा और तो वह बिल्कुल ही असहाय और लाचार हो गई। कोई नही देखने वाला न ही कोई पैसे की निमित उसकी आमदनी। मोहल्ला पड़ोस के लोग उसे खाना और दवा आदि के के लिए पैसे दे देते परंतु सेवा करने वाला कोई नही साथ में। आज हर समाज बड़े बड़े मंचो के माधयम से अपना नाम कमाने के लिए लाखो रुपए खर्च कर रही है और अपना नाम स्थापित कर रही है। परंतु खुद की समाज और जाति के लोगों की उपेक्षा कर रहे है क्या ये सही है?
इतने मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा और भी संस्थाएँ है जिनकी आमदनी करोड़ों रुपये की है। परंतु इस तरह की महिला पुरुषों के लिए उनके पास कोई व्यवस्था नही और न ही उनकी जगह समाज में है। कहते की भारत भावनाओं पर आधारित देश है जहाँ लोगों की भावनाओं से खेल कर नेता अभिनेता कुछ भी करवा लेते है।
मैं समस्त मानव जाति से एक अपील करना चाहता हूँ की दान दे तो सार्थक लोगों को जिनको बहुत जरूरत है वो असहाय है। बड़े बड़े जलसों की जगह अपना दान छोटे छोटे इस तरह के लोगों को दे। धर्म-कर्म करना जीवन में बहुत जरूरी है परंतु भरे पेट वाले की जगह खाली पेट वाले को दे जिससे खाली पेट वाले की भूख मिट सके।
आज हर समाज स्वंय में बहुत ही संपन्न है बस कमी है तो सकारात्मक सोच और कार्य को करने की। आप अपना दान उसे दे जो खुद की जाति धर्म और समाज के लिए सही कर रहा हो न की सिर्फ दिखावे वाली संस्थाओं को।
यह लेख आप सभी लोगों के प्रति में समर्पित कर रहा हूँ शायद हमारे इस लेख से समाज में सुधार हो सके। यह घटना सत्य पर आधारित है जो की सागर जिले की बीना तहसील मध्यप्रदेश की है। वैसे तो बीना हर चीज में बहुत आगे है परंतु इस तरह की सेवा भाव में बहुत ही पीछे है।
मेरा लेख किसी भी समाज जाति धर्म वालों की भावनाओं को आहत करने के लिए नही है फिर यदि किसी के दिल को ठेस लगी हो तो क्षमा करे मुझे अपना समझकर। यह कहानी जिस पर मैंने लिखी है उसे मैंने करीब से देखा और जाना है। आज मुझे उसका अंत समय सुनकर बहुत ही दर्द हुआ है इसलिए यह लेख लिखा ताकि आगे इस तरह की घटानाएँ समाज में फिर से न हो।

जय जिनेंद्र
संजय जैन “बीना” मुंबई







