जीने के लिए सोचा

जीने के लिए सोचा ही नही दर्द सम्भालने होंगे

वृद्धाश्रम में मेरी बेटी ने महसूस किए जीवन के नाशुक्रे लम्हे

आज मेरी बेटी कु. गुड़िया विजय तोरावत जैन ने अपने स्कूली सहपाठियों के साथ अकोला के वृद्धाश्रम को भेंट दे कर निराधर.. बेघर.. अपनो के हाथों लुटे गए.. कुचले गए, बुजुर्गों को थोड़े समय के लिए ही सही मगर दुनिया भर की खुशिया दी।

मेरी बेटी ने उनके के साथ गीत गाये.. उनकी दुखो से भरी कहानी को सुना.. उनके गम से रूबरू हुई। उन से पाठ सीखा की जीवन मे माता पिता की क्या अहमियत होती है.. उन से जाना कि दगा कोई दूसरा नही बल्कि अपना ही कोई जाया करता है.. उस ने महसूस किया कि बच्चो के अपने क्या फर्ज होते हैं.. उस ने जाना जीवन के असल स्वरूप को.. उस ने पहचाना कोख के कलंक को।

गुड़िया ने उम्रदराज लोगो से मिल कर जीवन के वो सबक सीखे जो कि उस के भविष्य की दिशा तय करेंगे.. बेगैरत बच्चो की माता पिता के प्रति उदासीनता को देख बुजुर्गों के साथ गुड़िया की भी आंखे नम हो आयी।

गुड़िया ने बुजुर्गों को ढांढस ही नही बल्कि उन्हें गले लगा कर यह अहसास कराया कि कोई भले ही दूध का कर्ज न चुका सका हो मगर दुनिया मे अच्छे लोगों की कोई कमी नही है।

दूध पी कर जहर उगलने वाली संतान के होने से अच्छा है कि कोख बांझ ही रहे। मेरी बेटी ने उन बेसहाराओं के साथ खाना खाया.. उन्हें अपने हाथों से खिलाया.. उन की बहती आँखे पोछि ओर एक मुस्कान के साथ हजारो शब्दो का सार एक ही वाक्य में कहा.. मैं हु न..!

अनाथों को अपनापन का अहसास करा कर.. धुंधलाती आंखों में आशाओं के सपने जगा कर.. घड़ी दो घड़ी में हजारों खुशियों की खनक खनका कर मेरी बेटी जब घर आयी तो मैने देखा उस के चेहरे पर उदासी थी.. मायूसी थी।

जीवन के यथार्थ को महसूस कर वो गमजदा थी.. उस ने जीवन के वह सबक उस समय सिख लिए तब जबकि उसकी उम्र इसकी इजाजत नही देती थी.. अनेक अनेक धन्यवाद।

रमेश तोरावत जैन
अकोला

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