लौटेगी कुछ दिन में
‘लौटेगी कुछ दिन में’
आंखों में खुशी मन में कुंभ की छाया बसी थी।
लौटूंगी कुछ दिन में घर की,की व्यवस्था थी।
निकल पड़ी गंगा मैया का नाम लेकर, आंखों में बस चंचलता थी।
कुंभ नहाने के लिए छोड़ी उसने अपनी गली बस्ती थी।
क्या मालूम था उसे की कुंभ में सांसें बडी सस्ती थी।
आस्था तो सच्ची थी मगर व्यवस्था बड़ी कच्ची थी।
आस्था तो सच्ची थी मगर व्यवस्था बड़ी कच्ची थी।
भगदड़ में ऐसी बिखरी सांसे कुछ अटकी थी।
ढूंढ रही थी आंखें अपनों को हिम्मत उसकी टूट चुकी थी,
ढूंढ रही थी आंखें अपनों को हिम्मत उसकी टूट चुकी थी।
भाग्य के इस खेल में वह पगली हार चुकी थी।
गंगा मैया की गोद में वह समा चुकी थी
आस्था तो सच्ची थी मगर व्यवस्था बड़ी कच्ची थी

लेखिका :- गीता पति (प्रिया)
( दिल्ली )
