Kahani Kahan Tak

कहाँ तक | Kahani Kahan Tak

”  हलो ..भाई साहब , आप मेजर गौरव शर्मा बोल रहे है न ? ओके , मैं लाहौर से मरियम रहमान बोल रही हूँ । भाई  साहब शायद मेरे शौहर आपके साथ भारत- पाक , जंग में आपके साथ थे । उन्ही के विषय मे मैं आपसे बात करना चाहती हूँ। क्या आप मेरी दस मिनट दे कर बात सुनेंगे ?”

” बहन जी , फोन पर इतनी लंबी बात नही हो सकती । आप मुझे पत्र लिखें, उसके उत्तर में मैं सब कुछ बताने की पूरी कोशिश करूँगा ”

मेजर शर्मा ने फोन काटा और किसी गहरे सोच में पड़ गए । उन्होंने मरियम का न तो फोन  नोट किया और न ही पता पूछा । और तो और उसके शौहर का नाम तक नही पूछा । कौन था ? कहाँ था ? किस समय था ? अब तो वह समय भी गुजरे एक अरसा हो गया था । किस की बात कर रही थी यह महिला ?

कहीं को लफड़ा तो नही ? आदि आदि  प्रश्नों का उसके दिमाग में ढेर लग गया और भेजर शर्मा परेशान हो उठे । उन्होंने अपने जूते उतारे और बाहर बैत के सोफे पर बैठ चाय की चुस्की लेने लगे । किंतु प्रश्न जैसे पीछा छोड़ने को तैयार ही नही थे । कौन थी यह लेडी? कौन था इसका शौहर? किसके  साथ  मैं जंग में ?

मुझसे क्या  जनना चाहती थी यह ? मुझे कैसे जानती है ? इससे दुबारा कैसे बात की जाए ? आदि प्रश्नों ने उन्हें घेर लिया । मेजर शर्मा ने चाय का प्याला उठाया और लॉन में  टहलते हुए अनमने मन से चाय पीने लगे की तभी उनकी पत्नी  की आवाज ने उनका ध्यान भंग किया । वह कह रही थी –

” अरे ,आज अकेले ही चाय पी जा रही है । मुझे बुलाया तक नही ”
” क्या बताऊँ सुलभ ! आज एक बड़ी ही अजीब सी बात हुई । मैं जबसे क्लब से आया हूँ ,बहुत परेशान हूँ ”
भेजर शर्मा के माथे पर दिल की परेशानी साफ झलक रही थी । उनका चेहरा देख सुलभ भी परेशान हो गयी । वह तपाक स कह बैठी –

” अरे, तो अपनी परेशानी मुझसे बाटो न । मन हल्का हो जाएगा । बताओ क्या बात है ? ”
सुलभ का आग्रह इतना प्रभावक था कि मेजर  ने उसकी कमर में हाथ डाल अपने पास खींचा और सोफे पर बैठ बतियाने लगे तो सुलभ बोल उठी –

“आप एक्सचेंज में बात करके नम्बर क्यो नही पता कर लेते? शायद पता चल ही जाए । ”
सुलभ की बात सुन मेजर साहब भीतर गए और एक्सचेंज का फोन घुमा कर बोले –
” आधे घण्टे पहले जो लाहौर से ट्रंकाल आई थी मुझे उसका नम्बर चाहिए । क्या आप इतनी मदद कर सकते है ?”

” जरूर साहब । लेकिन बीस मिनट लगेंगे ”
” ओके । ठीक है । मैं इंतजार करूँगा ”

मेजर शर्मा बेसब्री से फोन का इंतजार कर रहे थे । बीस मिनट गुजर भी गए लेकिन फोन नही आया । मेजर साहब खीज उठे । वह चहल कदमी करते हुए हाथ पैर पटकने लगे कि अचानक घर के गेटमैन ने आ कर सलाम किया और एक पर्ची थमाते हुए बोला –

” साहब ! एक आदमी ने यह पर्ची आपको देने को बोला ” फिर सेल्यूट किया और वापस चला गया । उसके मुड़ते ही मेजर साहब ने पर्ची खोल नम्बर डायल किया तो उधर से ‘हलो’ शब्द सुनते ही मेजर बोले –

“बहन जी , आप मरियम रहमान बोल रहीं हैं न । बताओ क्या पूछना था आपको ”

” वीर जी ! मैं आज से ठीक दस दिन बाद आपके पास पहुँच जाऊँगी ” फिर बिना किसी उत्तर की इंतजार किये बिना फोन रख दिया। सुन कर मेजर का मुँह लटक गया । उन्होंने रिसीवर तो रख दिया पर मरियम की ओर से किया गया सम्बोधन उनके कानों में गूंज रहा था ।

उस दिन के बाद वह बेहद चिंतित और परेशान रहने लगे थे । घर के बाहर लॉन में बैठ वह अक्सर अपनी पत्नी से अपनी चिंता बताया करते तो सुलभ कह बैठती –

” चिंता न करो । यह इन्तजार भी खत्म हो जायेगा । फिर सबकुछ मालूम हो जाएगा ।” और बड़ी सरलता से उनका ध्यान अपनी तरफ खींच के दूसरी बात में उलझा दिया ।।

रविवार का दिन था । दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे होंगे कि घर के समाने एक थ्री व्हीलर आ कर रुका । गेट पे खड़े गेटमैन से मेजर शर्मा को सूचित करने के लिए कह थ्रीव्हीलर से उतर एक महिला गेट पर आ कर खड़ी हो गयी । गेटमैन अंदर गया और –

” साहब , गेट। पर एक मेमसाब खड़ी हैं । आपको बुला रही है ।”

कहा तो सुलभ गेट की ओर लपकी । सुलभ ने गेट पर खड़ी महिला का हाथ पकड़ खींचते हुए बोली –

” आइए , मेजर साहब आपका ही बेसब्री से इंतजार कर रहे है “.

और कॉरिडोर में पड़े सोफे पर बैठा स्वयं पानी लेने चली गयी । जैसे ही पानी के गिलास को ट्रे लेकर सुलभ आयी कि मेजर शर्मा ने शयन कक्ष से आते दिखाई दिए और उस महिला की ओर बढ़ते हुए बोले –

” गुड़ इवनिंग मैडम ! कैसी है आप ?”

” मैं ठीक हूँ वीर जी ! आइए बैठिए ”

सोफे की तरफ इशारा करते हुए बोली तो मेजर सोफे पर बैठ उसकी ओर मुखातिब हो उतावले से पूछ बैठे –
” पूछिये मैडम , क्या पूछना चाहती थी आप ?”

सुनते ही महिला का मुँह लटक गया और हिचकिचाते हुए बोली –

” भाई साहब , बात तो पुरानी है पर 9719260777 मेरी उम्मीद बहुत नई है । इसलिए वीर जी ! सब सच्ची सच्ची बताना । भारत पाक के जंग के दौरान मेजर मुहम्मद रफीक आपके साथ ही थे न ?

अभी उन्हें कितने दिन और रहना पड़ेगा भारत का कैदी बन कर । उनके साथ के सात कैदियों को रिहा कर दिया गया , पर उन्हें नही । क्या उनका कसूर छोड़ने वालों से ज्यादा था ? मुझे उनके विषय मे बताइये न सबकुछ ”

कहते हुए मरियम की हिचकियाँ बन्ध गई । उसने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया । किन्तु मेजर शर्मा पर कोई असर नही हो रहा था । वह बुत बन कर रह गए थे । समझ नही आ रहा था कि उससे क्या और कैसे कहा जाय । कहाँ से शुरू की जाय उसकी कहानी । मेजर के तनाव का प्रभाव उनके चेहरे पर स्पष्ट देखा जा सकता था ।

अचानक मरियम की हिचकी थम गई । वह मेजर शर्मा की ओर पलटी और कंधों से पकड़ झिंझोड़ते हुए चीख कर बोली –

” बताओ न वीरजी ! सत्रह साल हो गए उनकी राह तकते । बच्चो की शादियाँ भी कर दी उनके बिना ही । पर अब तो बिल्कुल अकेली रह गयी हूँ तन्हाई काटे से नही कटती । कैसे आएँगे वे ? कोई रास्ता सुझाइए । कुछ तो बताइए “–
कहते हुए मेजर शर्मा के कन्धे पर सिर रख कर सिसक उठी । सुलभ ने मरियम को अपनी ओर खींच गले से लगा मेजर से बोली-

” देखो गौरव , तुम जो कुछ भी जानते हो , इसे बता दो । इनका मन एक तरफ ही जायेगा ।”
और मेजर ने मरियम को कंधे से पकड़ अपनी ओर खीचते हुए कहा –
” देखो मरियम , मुझे अब भी समझ नही आ रहा कि तुम किसके विषय मे बात कर रही हो ? क्या तुम्हारे पास उनका को चित्र है ?”

सुन कर मरियम ने पर्स में से एक चित्र निकाल कर मेजर के सामने रख दिया । चित्र देखते ही मेजर का साँस ऊपर का ऊपर और नीचे का नीचे रह गया । वह आवक मरियम की तरफ देख रहे थे । मुँह चलाने का पूरा प्रयास कर रहे थे पर आवाज निकल नही रही थी ।

शब्द कहीं अटक कर रह गए थे । वे सहसा उठे और अपने शयन कक्ष में जा बैड पर धम्म से जा पड़े । पीछे पीछे सुलभ भी मरियम को लिए पहुँच गयी । तब मरियम ने एक बार फिर चीख कर कहा –

” वीर जी , बताओ न । मैं हेडऑफिस से पता करके आई हूं । वे जंग में आप ही के साथ थे । अब कहाँ है वह ? मुझे अपने लापता शौहर की राह तकते एक अरसा हो गया । बताओ ,वीर जी बाताओ “,।

मरियम की बातों पर मेजर पर गहरा असर हुआ । वह अपनी जगह से उठ चीखते हुए से बोले ,,-
” क्या बताऊँ लाडो ! रहमान को उसके ही साथियों की गोली लगी थी । मैं वहाँ से बच कर निकल रहा था कि “भाई साहब मेरे पास कुछ गोलियाँ है , इन्हें ले लो , आपके काम आएगी ।

आपके पास पानी है क्या “? ये शब्द उसने बड़ी मुश्किल से कहे । मैंने उसे पानी पिलाया और पीने से पहले ही उसने मेरी ही बाहों में दम तोड़ दिया था । मैं उसे कंधे पर उठा कर कुछ दूर चला भी लेकिन मैं खुद घायल था इसलिए सीमा तक नही ला सका । फिर भी मैंने उसे उस सड़क के किनारे लिटा दिया जहाँ से आर्म्स के ट्रक गुजरते थे”

अभी मेजर की बात पूरी भी नही हुई थी कि ‘ “धम्म ‘ की आवाज ने उनका ध्यान तोड़ा । पलट कर जो देखा तो मरियम जमीन पर चित लेटी थी । सुलभ और मेजर दोनों उसकी ओर लपके और स्टूल पर रखे पानी का जग ले कर मुँह पर छीटे मारे तो मरियम ने आँख खोल दी । फिर एक ही झटके में सुलभ से लिपट फूट फूट कर रो कर कहने लगी –

” आज मेरी आशा भी बूढ़ी हो गयी । मेरी उम्मीद मर गयी । अच्छा होता मैं यहाँ न आती । अपनी उम्मीद के सहारे जीती तो रहती । अब कहाँ जाऊं ? कोई भी नही है वहाँ । “।

मेजर शर्मा और सुलभ की भी हिचकियाँ बन्ध गयी । तीनो मिल कर बहुत देर तक रोते रहे । सुलभ ने मरियम को देख कर कहा –
” मरियम , सम्हालो अपने आप को । तुम्हारे वीर जी और भाभी सुलभ तुम्हारे सामने हैं । तुम्हारे साथ है । रहमान को तो हम नही ला सकते लेकिन हम तीनों एक साथ अवश्य रह सकते हैं । आज से तुम यहीं रहोगी हमारे पास । तुम अकेली नही हो । ”
सुलभ की बात सुन कर मरियम की हिचकी रुक गयी और वह आँखे फाड़ कर उसकी ओर देखने लगी ।।

Sushila Joshi

सुशीला जोशी

विद्योत्तमा, मुजफ्फरनगर उप्र

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