मां की ममता मां का प्यार

माँ: त्याग की मूर्ति या शोषण की शिकार?

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखी, जिसमें लिखा था — “अगर घर में चार रोटियाँ हों और खाने वाले पाँच, तो एक ही शख्स होगा जो कह देगा कि मुझे भूख नहीं है — और वो है माँ।”

यह वाक्य दिल को छू गया, लेकिन इसके साथ एक गहरा सवाल भी मन में छोड़ गया।काश यह केवल माँ की ममता का उदाहरण होता, मगर अफ़सोस, यह एक गहरी और सच्ची सामाजिक सच्चाई बन चुकी है। हमने माँ को त्याग की मूर्ति बना दिया है — उसकी भावनाओं को ‘महानता’ की चादर से ढक दिया है, और उसके हर त्याग को ‘स्वाभाविक’ मान लिया है।

हम बचपन से माँ को भगवान के रूप में पूजते आए हैं। माँ का संघर्ष, उसका त्याग, उसकी चुप्पियाँ — ये सब कहानियों, कविताओं, फिल्मों, त्योहारों और यहाँ तक कि विज्ञापनों तक में महिमामंडित कर दिए गए हैं।

लेकिन क्या हम माँ की महानता का इतना महिमामंडन कर बैठे हैं कि अब उसके शोषण को भी उचित ठहराने लगे हैं?चार रोटियों वाली उस कहानी में क्या यह संभव नहीं था कि सभी थोड़ा-थोड़ा बाँट लेते?

क्या माँ के हिस्से की रोटी सिर्फ उसके ‘त्याग’ के कारण कम होनी चाहिए? या हमने यह मान लिया है कि माँ की भूख, उसका आराम, उसकी इच्छाएँ और सपने दूसरों से कम महत्त्वपूर्ण हैं?त्याग तब तक ही सुंदर है, जब वह व्यक्ति की अपनी पसंद से किया गया हो।

लेकिन जब समाज एक महिला से — खासकर माँ से — यह अपेक्षा करता है कि वह अपनी हर आवश्यकता को स्वाभाविक रूप से दूसरों के पीछे रखे, तो यह त्याग नहीं, अन्याय बन जाता है।हम माँ को यह कहकर ‘महान’ बना देते हैं कि वह कभी थकती नहीं, कभी शिकायत नहीं करती, और उसे केवल परिवार की खुशियाँ चाहिए होती हैं।

मगर सच्चाई यह है कि वह भी थकती है, कभी-कभी चुपचाप रोती है। उसका भी मन करता है कि कोई बिना कहे उसे पानी का गिलास पकड़ा दे। उसे भी आराम चाहिए होता है — पर उसकी ये भावनाएँ माँ की ‘महानता’ के पर्दे के पीछे छुप जाती हैं।

मदर्स डे के दिन माँ को फूल, उपहार, मिठाइयाँ देना और सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट करना — क्या यह सब बस एक दिन की औपचारिकता है? या क्या हम सचमुच माँ को एक इंसान की तरह देख पा रहे हैं, जिसकी अपनी सीमाएँ, इच्छाएँ और ज़रूरतें हैं?हम माँ को ‘घर की धुरी’ कहते हैं।

लेकिन क्या इस धुरी को कभी घूमने की आज़ादी दी गई? क्या कभी उससे पूछा गया कि वह क्या चाहती है? क्या कभी माँ को अपने अधूरे सपनों की ओर लौटते देखा गया — जैसे पेंटिंग, संगीत, शिक्षा, नौकरी या दोबारा कॉलेज जाने की चाह?हमने “माँ के हाथ का खाना चाहिए” जैसी बातें कहकर उसे अपने सपनों और करियर से समझौता करने पर मजबूर कर दिया।अगर माँ त्याग करती है तो उसका सम्मान करें — पर इस त्याग को उसकी ज़िम्मेदारी न बनाएं।

उसे आदर दें, पर यह अपेक्षा न रखें कि वह हमेशा समर्पित ही रहे। माँ को भगवान न बनाएं, क्योंकि वह भी एक इंसान है — और इंसान को थकने, चाहने और अपनी ज़िंदगी जीने का पूरा हक़ है।माँ के हिस्से की रोटी, उसका समय, उसका व्यक्तिगत स्थान और उसका आत्मसम्मान — ये सब उतने ही ज़रूरी हैं, जितना किसी और सदस्य के लिए।

मदर्स डे पर माँ के लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा यही होगा — कि हम माँ को भगवान मानना बंद करें, और उसे हमारे बीच एक बराबरी के इंसान की जगह दें।माँ त्याग की मूर्ति ज़रूर हो सकती है, लेकिन उसे हमेशा त्याग करते रहने पर मजबूर क्यों किया जाए?हमें एक नई शुरुआत करनी होगी —
जहाँ माँ के लिए भी वो पाँचवी रोटी रखी जाए।
जहाँ वह बिना अपराधबोध के कह सके — “हाँ, मुझे भी भूख लगी है!”

गरिमा भाटी “गौरी”
सहायक आचार्या, रावल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन,
फ़रीदाबाद, हरियाणा।

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